Wednesday, July 29, 2020

भगवान जगन्नाथ मंदिर और समुद्र दर्शन उड़ीसा - 4 Jagannath temple Puri Odisha


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जैसा की आपने पिछली पोस्ट में पढ़ा कि हम भुवनेश्वर से नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क घूमकर रात को पुरी आ गए थे । अब आगे -






सुबह नींद से मुक्त होकर उठा। हम रात को अंधेरे में आए थे तो ध्यान नहीं दिया था तो सुबह उठकर मैने कमरे से बाहर निकल कर आस पास नजर दौड़ाई । हमारा होटल अच्छी जगह पर था । पीछे खाली जगह थी किसी ने सब्जियां ऊगा रखी थी । नारियल के पेड़ थे । साईड में भी खाली जगह थी । मतलब हरियाली थी कुल मिलाकर और सबसे अच्छी बात ये थी के सामने जो एक ईमारत थी पुरानी सी बंगला टाईप , उसके ठीक पीछे था पुरी का गोल्डन बीच । पुरी का जो मेन बीच है , गोल्डन बीच उससे करीब एक किमी दूर है । संदीप अभी नींद में था तो मैं अकेला सुबह सुबह वहाँ पहुँच गया ।

भाई साब ! क्या बताऊँ पहली बार समुद्र देखने पर मेरा मुँह कुछ देर खुला का खुला रह गया । जीडीएस के समूह नियंत्रक संजय कौशिक जी ने तो मुझसे पहले ही कह दिया था की जब सामने देखेगा ना तो मुंह खुला का खुला रह जाएगा । कुछ समय तो दूर से ही बस देखता ही रह गया मैं । ये मेरे जीवन की यादगार घटनाओं वाले फोल्डर में सेव हो गया ।


जैसे-जैसे मैं समुंदर की तरफ बढ़ता चला गया वैसे वैसे वह मुझे और भी आकर्षित करता चला गया । लोग बाग कुछ ज्यादा नहीं थे इस समय । हमारे वहां के मुकाबले रोशनी जल्दी हो जाती है देश के इस तरफ । आप पहली बार समुद्र देखे ओर सुबह सुबह का समय हो वे भीड़ भी न हो । और क्या चाहिए ? कुछ देर बाद मैं वापस होटल की तरफ जाने लगा संदीप को बुलाने के लिए । समुद्र आज से पहले देखा संदीप ने भी नहीं था । वापस कमरे पर पहुंचा तो संदीप भी उठ चुका था। उसने कहा कि चाय बनवा लेते हैं पहले । मैने कहा चाय को छौड़ और चल मेरे साथ । संदीप को भी पता नहीं था कि हम बीच के इसने पास हैं । मैं संदीप के चेहरे पर वही भाव देखना चाहता था जो मेरे चेहरे पर आए थे । ज्यों ही हम बीच पर पहुंचे मैं संदीप के चेहरे की तरफ देखने लगा । उसका मुंह तो नहीं खुला पर भाव उसके भी देखने लायक ही थे । बस थोड़ी देर में हम बीच पर थे और पानी हमारे पैरों को भिगो रहा था । बड़ा ही सुखद आनंद मिल रहा था ।
कुछ समय बाद एक बंदा आता है एक लाठी पर दोनों तरफ चार चार पतीले लटकाए हुए । हम आवाज लगाकर उसे रुकवाते हैं । वो पतीलों में अलग अलग तरह के रसगुल्ले लिए था । पहले हमने रसगुल्ले लिए । मीठा खाने के बाद थोड़ा चटपटा खाने का मन किया तो उससे पूछा कि कुछ है नमकीन ? सबसे नीचे वाले बड़े पतीले में वह समोसे रखे हुए था ₹20 के पांच छोटे छोटे समोसे खा कर मजा आ गया ।




अब बारी थी समुद्र में नहाने की । मुझे तो तैरना आता नहीं था , तो मैं तो जाने वाला था नहीं । जब तक मैं यह सोच रहा था तब तक संदीप पानी में जा चुका था। मैं बाहर बैठा उसे देखता रहा और संदीप नहाता रहा , मैं काफी देर और उसे देखता रहा वह फिर भी नहाता रहा । कमाल का बंदा है डेढ़ घंटे से ज्यादा हो चुका है और वह बाहर निकलने का नाम ही नहीं ले रहा । भाई इतनी देर में तो भैंस भी नहा कर निकल आती है जोहड़ में से । थोड़ी देर बाद वो पानी में थोड़ा अंदर तक चला गया । वह बाहर की तरफ आता और लहर उसे थोड़ा अंदर खींच ले जाती । मेरे मन में आया कि पता नहीं ये निकलेगा कि नहीं मैंने फोन निकाला और वीडियो बनानी शुरू कर दी । भाई यह निकले नहीं गा तो कम से कम मेरे पास सबूत तो होगा । 😁😁
एक किन्नर वहां पैसे मांग रहा था उसने मुझसे पैसे मांगे पर मैंने नहीं दिए । संदीप बच कर कुछ देर तक लहरों से लड़ने के बाद बाहर आ गया । बाहर आते ही मैंने उंगली होटल की तरफ कर दी । बीच पर ही बाथरूम बने हुए हैं मैंने कहा कि जा मीठे पानी में नहा ले । ₹10 देकर वह नहाने अंदर चला गया । अब मन तो मेरा भी नहाने को हो रहा था पर मैंने कमरे पर जाकर नहाने का फैसला किया । धूप तेज हो गई थी और वह नहा कर निकल ही नहीं रहा था मतलब बंदे से अक्वा मैन भी शर्मा जाए । गर्मी बढ़ रही थी इसलिए एक चिल्ड पानी की बोतल ले कर एक गाड़ी की छांव में बैठ गया । मालिक थोड़ी देर बाद बाहर आते हैं और बालों में लगाने वाला तेल पूछते हैं । क्यों भाई मैं कोई मालिश वाला हूं क्या जो हर वक्त अपने साथ तेल रखूंगा । थोड़ी दूर एक खोखे वाला था । वहां पर जाकर तेल के पाउच लिए और उनके साथ ही ठंडे और कुरकुरे की भी फरमाइश हो गई । ठंडा पीकर हम कमरे पर पहुंचते हैं । मैं नहा धोकर मोबाइल और कैमरा चार्ज लगा लेता हूं ।
एक डेढ़ घंटा आराम करने के बाद हम अब जाने वाले थे भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन करने के लिए । मंदिर होटल से करीब ढाई किलोमीटर दूर है । गूगल मैप की मदद से हम गलियों में से निकलते हैं । किसी भी अंजान जगह की गलियां ही वहाँ की असली जिंदगी के नजारे दिखाती हैं । बाजार तो हर जगह के एक से ही होते हैं । जब हम गलियों से निकल कर मंदिर वाली सड़क पर पहँचे तो बहुत चौड़ी सड़क मिली । बहुत लोग होने पर भी भीड़ महसूस नहीं हो रही थी । रथ यात्रा इसी रोड़ पर होती है । ये रोड़ भगवान जगन्नाथ के मंदिर से सीधा गुंडिचा मंदिर तक जाता है । रथ यात्रा के बाद शायद दस दिन तक भगवान यहीं पर वास करते हैं । भगवान जगन्नाथ का मंदिर बहुत ही भव्य है । बहुत ऊंचा मंदिर है । यहां आने से पहले काफि बातें पढ़ी थी मंदिर के बारे में की इस पर से कोई पक्षी ना उड़ता , अंदर समुद्र की आवाज ना आती । पहले मैं ये सब देखना चाहता था लेकिन जब मैं वहां था तो इनमे से कोई भी बात ध्यान ना रही । फिलहाल रथयात्रा के रथ भी वहीँ खड़े थे । रथयात्रा थोड़े दिनों पहले ही हुई थी । कभी रथयात्रा के टाइम आने का भी मन है मेरा । कांवड़ों का सीजन चल रहा था । कांवड़ लोग नाचते हुए भी ला रहे थे । कोई कोई तो ढोल वाले को भी साथ लिए हुए था । हमारे वहां तो कावड़ सिर्फ शिवरात्रि के दिन ही चढ़ाई जाती है जबकि यहां पर पूरा सावन कावड़ चढ़ती है । मंदिर के बाहर बहुत सारी दुकानों पर खाजा मिठाई सजा कर रखी गई थी । जैसे हमारे हरियाणा में सुवाली मिठाई होती है यह भी वैसी ही होती है । सुवाली में तह नहीं होती वह गोल होती है जबकि ख्वाजा में तह होती है और आकार में लंबूतरी । बाकी सुवाली में चासनी थोड़ी तेज रखते हैं और ख्वाजा में चाशनी थोड़ी नरम रखते हैं । हमने दोनों ने ₹20 के दो पीस ले लिए , अच्छा स्वाद था । मंदिर के हर तरफ यही मिठाई बहुतायत में दिखती है शायद लोग भगवान के प्रसाद के तौर पर उसे अपने घर ले जाते हैं । संदीप ने कहा कि हम भी जाते वक्त घर लेकर चलेंगे । मैंने कहा अपने वहां सुवालियों की कोई कमी है क्या ? अगर लेकर चलना ही है तो छेनापोड़ा लेकर चलेंगे ।






भगवान जगन्नाथ के दर्शनों के लिए बहुत अधिक मात्रा में भक्त यहां आते हैं और यह संख्या इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि भगवान जगन्नाथ का मंदिर चार धामों में से एक है । हर हिंदू की यह एक कामना तो होती ही है कि वह अपने जीवन काल में चार धाम की यात्रा करें हम भी अपने बैग जूते चप्पल कैमरा वगैरह सब कुछ एक दुकान पर जमा करा कर लाइन में लग गए । जैसे ही आप अंदर घुसते हैं वहीं से ही आप को दान करने के लिए तो टोका जाने लगता है । मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अलावा भी छोटे और भी मंदिर हैं मुख्य मंदिर में जाने के लिए अंदर ही लाइन लगी हुई थी । कुछ समय बाद हम इस जगत के स्वामी के सामने खड़े हुए थे । लोगों में धक्का मुक्की लगी हुई थी शायद ही किसी को एक झलक से अधिक कुछ दिखता हो । मुझे नहीं पता की मैं वहां कितनी देर रुका या रुका भी की नही । पर जैसा मुझे महसूस हुआ वो ये था की मुझे लगा की मैं काफी समय वहाँ रुका रहा । किसी ने मुझे धक्का नहीं दिया किसी ने मुझे हटाया नहीं। मेरा जो अनुभव वहां रहा मैं उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकता । इस प्रकार का अनुभव मुझे आज तक किसी भी भगवन के दरबार में नहीं हुआ । मैं कोई भक्त टाईप का इंसान नहीं हूँ पर लगता है भगवान जगन्नाथ के इस दर्शनों ने मेरे मन में उनके प्रति आस्था का बीज बो दिया । दर्शन के बाद हम निकल जाते हैं । परिसर में और भी मंदिर थे छोटे तो संदीप एक मंदिर में दर्शन के लिए घुस गया । मंदिर में उससे आगे जो आदमी था उससे पुजारी ने नाम पूछा , तिलक लगाया और ₹200 मांग लिए । संदीप झट वहीं से प्रणाम करके वापस मुड़ गया ।
हम मंदिर से बाहर निकलने लगते हैं तो बाहर निकलने के रास्ते में कुछ लोग खाना खिलाते हैं । उसको महाप्रसाद बोलते हैं । हमें भी वो लोग टोकते हैं पर मैं मना कर देता हूँ । फिर दूसरा

ब्राह्मण ( मुझे वेशभूषा से ब्राह्मण ही लगा ) - “ महाप्रसाद ले लीजिये ”

मैं - “नहीं ”

संदीप - “ ले ले नै ”

“फ्री मैं कोन्या देता , पीसे ले है ”

“ मंदिरां मैं परसाद के पीसे लिया करै कोए ”

“ डट ज्या ”

मैं ब्राह्मण से पूछता हूँ ओर वो पैसे लेने की पुष्टि करता है । फिर संदीप भी कुछ नहीं बोलता । हम बाहर निकल जाते हैं । अपना सामान लेते हैं और रोड पर चलने लगते हैं ।



























संदीप “ औरां पे तो घने रपे मांगे थे पर अपणे पै तो किसे नै ना इतना वो करया ?”

“ रै सादे लत्या मैं तो हम ऊँ हैं दोनूं , ऊपर तै काले- काले । किसे लहाज तै लग्गे हैं हम अक बाहर तै आ रे हैं ?”

इतने में चलते चलते गोलगप्पे की रेहड़ी आ जाती है । गोलगप्पे छोड़ने की चीज तो ना है । लड़कियां तो वैसे ही बदनाम है गोलगप्पों के लिए , लड़के भी खूब खाते हैं । गोलगप्पे वाले ने पानी में तड़का भी लगा रखा था । मजा आ गया । कुछ दूर डोसे वाला भी था तो हमने सोचा चलो शाम तो होने वाली है डिनर के नाम का डोसा भी अभी खा के चलते हैं । डोसा लेने के बाद पेट फुल हो जाता हैं । हम होटल की तरफ चल पड़ते हैं । करीब एक डेढ़ किलोमीटर जाने के बाद संदीप कहता है

“पैर दूखण लाग्गे ”

“पां तो मेरे भी दुखै है पर डोस्से आले धौरे उल्टा चालणा पड़ेगा । स्टील आली पाणी की बोत्तल छोड़ाए ।”

“ईब तो पाणी मुश्किल है बोत्तल ”

“ देख कै तो आणा पड़ेगा ”

पैरों का दुखना बंद हो जाता है और हम वापस डोसे वाले के पहुंचते हैं । डोसे वाला दूर से देखकर ही मुस्कुराता है । पास पहुंचने पर वो हमें हमारी बोतल वापस कर देता है । हम उसे धन्यवाद देते हुए वापस हो लेते हैं । मुझे तो सच में इसकी उम्मीद नहीं थी । अबकी बार हम बीच से जाएंगे । हम पुरी के मेन बीच से होते हुए गोल्डन बीच पर जाएंगे और वहां से होटल । पुरी के मेन बीच यानी स्वर्गद्वार बीच पर सुबह वाला किन्नर हमें फिर मिलता है । वो मुझे पहचान जाता है पर इस बार भी उसे निराशा ही हाथ लगती है । ये हमें अगले दिन भी मिलने वाला है कोणार्क में । हम धीरे धीरे होटल पहुंचते हैं तब तक अंधेरा हो चुका होता है । मैं कमरे पर पहुंच कर नहाने की तैयारी करता हूँ ओर संदीप बाहर टहलने निकल जाता है । कुछ समय बाद वो मोमोस लेकर लौटता है । और इस तरह हमारा ये दिन भी समाप्त होता है । कल हम कोणार्क ओर चिल्का लेक जाने वाले हैं । अगली पोस्ट तक अलविदा ।






















क्रमशः

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Tuesday, April 28, 2020

नंदनकानन चिड़ियाघर , भुवनेश्वर - 3 , उड़ीसा ( Nandan kanan zoological park bhuvaneshvar , Odisha )

ये है भीगी बिल्ली 
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पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि हम भुवनेश्वर में कुछ जगह घूमकर शाम को 'नीमापारा स्वीट्स' पर होकर और 'जुगाड़ जंकशन' से खाना खाकर सो गए थे । अब आगे -

सुबह हम जल्दी ही नहा-धोकर , होटल वाले लड़के के पास गए चाबी देने। जब चलने लगे तो वो टिप माँगने लगा ।भाई टिप काहे की ? जब किराया दे रखा । अंत में उसको पचास रूपये दिए पर चाय पीकर । वानी विहार रेलवे स्टेशन होटल से ढाई किमी दूर था तो हम सीधे वहीं जाने लगे भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन की बजाय । क्योंकि भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन वानी विहार स्टेशन से ज्यादा दूर पड़ रहा था और वानी विहार पर भीड़ भी कम होगी । गूगल बाबा रस्ता बताते चले गए और हम उनके नक्शे कदम पर होते-होते वानी विहार रेलवे स्टेशन पहुँच गए । छोटा सा स्टेशन था । हमने टिकट लिया ( टिकट पुराने वाला था गत्ते वाला ) और ट्रेन का समय पूछा तो पता चला कि कुछ समय है । टिकट थी 10 रूपये की। हम स्टेशन के बाहर आ गए । बाहर स्टेशन के सामने ही दुकान पर ठंडे की दो बोतलें और नमकीन ले ली । वो खाकर थोड़ा रिफ्रैश सा महसूस होने लगा । हम फिर अंदर जाकर बैठ गए हॉल में । वहाँ किसी की भी बातें समझ में नहीं आ रही थी इसलिए हम फिर से बाहर आ गए । बाहर आकर ज्यों ही बैठे कानों में मिश्री सी घुली । पीछे एक बंदा अपने फोन में ' तेरी आंक्ख्याँ का यो काजल ' बजाता हुआ आ रहा था । मन में बहुत खुशी हुई । ऐसी ही खुशी तब मिली थी जब पुराने खजुराहो की गलियों में चलते हुए सपना चौधरी की के गाने बजते सुने थे ।
थोड़ी देर में लौहपथगामिनी आ गई और हम दोनों उसमें सवार हो गए । हमारी मंजिल थी बारंग ( Barang ) जंक्शन । यहाँ उतरकर हम नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क जाने वाले थे जो यहाँ से डेढ़ किमी था । स्टेशन से बाहर निकले तो खेत थे सामने रोड़ के किनारे नारियल के पेड़ खड़े थे । ऑटो कोई ना तो था और ना ही हमें चाहिए था ।
कुछ समय बाद हम चिड़ियाघर के सामने खड़े थे । टिकटें पड़ी 100 रू की । हमने बैग जमा कराए तो मैने गाँव से लाई हुई मट्ठियाँ निकाल ली खाने के लिए । अन्दर जब एन्ट्री हुई तो वहाँ खाने की चीजें फेंकने को कहा गया । मट्ठियों को ना चाहते हुए भी फेंकना पड़ा । नंदनकानन बहुत बड़ा है । हमें कई घंटे लग गए पूरा देखने में । मेरा पसंदीदा जीव किंग कोबरा हमेशा की तरह मुझे मंत्रमुग्ध करने में कामयाब रहा । वहाँ से हटने का मन ही नहीं कर रहा था । अन्दर ही जलपान गृह भी है । वहाँ हमने डोसा लिया और दही बड़ा भी लिया । दही बड़ा कुछ अलग टाईप का था । दही बहुत ही पतली थी और उसमें तड़का लगाया था । बड़ा भी साईज में भी बड़ा था । पर स्वाद बहुत अच्छा लगा । बाद में आईसक्रीम भी खाई गई गर्मी के प्रकोप को देखते हुए । कुल बिल बना एक सौ सत्तर रूपये । ज्यादा नहीं है , हैं ना ?








दिल्ली चिड़ियाघर में भी दो तीन बार जाने के बावजूद कभी किसी गोरिल्ले के दर्शन हमें ना हुए तो यहाँ भी कैसे होते ? जब दो चार बाड़े बचे थे तो मौसम खराब होने लगा । हमने निकल कर रेलवे स्टेशन की और चलना बेहतर समझा । लेकिन आधे रस्ते में ही बारिश शुरू हो गई । एक जदह पॉलीथीन पड़ी थी तो हमने वो उठा कर अपने उपर डाल ली पर कुछ देर में ही हारिश बहुत तेज हो गई । आसपास एक वेल्डिंग वर्कशॉप दिखी तो उसी में घुस गए । कुछ समय तक बहुत तेज बारिश होती रही । यहाँ की मिट्टी बहुत मोटी और लाल रंग की है । कीचड़ नहीं होता । हमारे वहाँ की तरह चिकनी और चिपकने वाली नहीं । बारिश का पानी भी मिट्टी की वजह से नारंगी रंग का हो गया था । बारिश रूकते ही हम निकल पड़े पैंट को नीचे से थोड़ा मोड़कर । सड़क के गड्ढों में भरे पानी में छप- छप करते हुए क्योंकि जूते हमने पहने नहीं थे और दिल तो बच्चा है जी । स्टेशन पहुँचकर हमने भुवनेश्वर की बजाय सीधे पुरी की टिकट ली । टिकटें पड़ी 40 रूपये की । जब हम ट्रेन का इंतजार कर रहे थे तो एक प्रेमी युगल हमारे पीछे खड़ा था । सब कुछ ठीक था फिर बाद में पता नहीं क्या हुआ कि लड़की उलहाने देने लगी । भाषा समझ नही आ रही थी लेकिन उसके लहजे से और चुपचाप खड़े लड़के के चेहरे से सब पता लग रहा था । कुछ समय बाद लड़के की आँखों से आँसू लुढक गया । ये देखते ही पता नहीं क्यूँ संदीप नें फोन में बेवफाई के गाने बजा दिए और वॉल्यूम बढ़ा दी । ये काम करने के बाद हमने उनके रिएक्शन देखना उचित ना समझा । समय पर हमारी ट्रेन आ गई और हमें खिड़की वाली साईड वाली आमने सामने वाली सीट भी मिल गई । अगले स्टेशन पर दस रूपये में दो चाय ले ली गई या ये कहिए की गर्म पानी ले लिया । साईड में एक फैमली बैठी थी । बहुत ही बातूनी । उनका कोई शब्द समझ नहीं आ रहा था लेकिन उनको सुनकर टाईमपास जरूर हुआ । पुरी पहुँचते पहुँचते रात हो चुकी थी । होटल हमारा बुक था पहले ही 150 रू में । हमने ल्टेशन से बाहर निकलकर होटल में फोन करके खाने की उप्लब्भता के बारे मों पूछा तो जवाब मिला की आप ज्यादा लेट हैं खाना नहीं हो पाएगा । हमने इसलिए रस्ते में ही एक भोजनालय से रोटी- सब्जी , दही , सलाद पैक करवा लिया । गूगल मैप की मदद से हम होटल खोजने लगे । गूगल मैप के बताए ठिकाने पर पहुँचने से एन वक्त पहले फोन बंद हो गया । संदीप के पास कीपैड वाला फोन था । ना होटल की लोकेशन थी अब हमारे पास और ना ही उनका नं० । हमारे थोड़ी दूर एक लड़का खड़ा था । एक बार तो सोचा उससे पूछ लें फिर लगा यार खुद ही ढूँढ लेंगे । कुछ समय तक वहीं खड़े रहे तो उस लड़के ने ही पूछ लिया कि "थोड़ी देर पहले आप ही पूछ रहे थे खाने के बारे में फोन पर ?" हमने कहा कि "हाँ हम ही पूछ रहे थे ! तुम होटल से हो ? " "हाँ सर ! आपके इंतजार में ही खड़ा हूँ काफी देर से " धत्त तेरी ! पहले ही इससे पूछ लेते तो ! खैर होटल में जाकर सबसे पहले स्नान हुआ । तब तक रोटियाँ ठंडी हो चुकी थी । मैदा मिक्स आटे के रोटियाँ ठंडी होकर मानो रबड़ का रूप धारण कर चुकी थी । अग्नि हर चीज को जिस तरह खाक कर देती हैं उसी तरह इस रबड़ की रोटियों को भी हमारी उदराग्नि ने लपेट दिया । अब पूरा दिन पैदल नापने के बाद कैसी नींद आती है वो तो आपको भी पता है । इसलिए अब ये दिन खत्म हुआ और अगले दिन की कहानी हम सुनाऐंगे अगली पोस्ट में । तब तक ये चिड़ियाघर के थोड़े और चित्र देखिए ।