Wednesday, January 25, 2017

ओरछा महामिलन भाग -3 पंचमढ़िया ( Orchha part-3 , panchmadhiya )






पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा कि 24 दिसंबर को हम राजाराम मंदिर और चतुर्भुज मंदिर देखने के बाद शाम को बेतवा किनारे गए और रात को लाईट एंड साउँड शो देखा ।  अब आगे -


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अगले दिन सुबह जल्दी उठकर हम तीनों ( मैं , सचिन और सहगल साब ) नहा लिए थे ये सोचकर की सुबह जल्दी  निकलेंगे और एक कारण ये भी था कि पास वाले कमरे में गीज़र नहीं चल रहा तो उस कमरे वाले भी यहीं नहाऐंगे । नहा धोकर सब बैठे थे कि विनोद कमरे में आया लड्डू और चकली लेकर । सबसे पहले भोग मैने ही लगाया लड्डूओं का फिर बाकी लोगों को दिया पर फिर भी वो उसी तरह पूरे ग्रुप को नहीं मिल पाया जिस तरह बाकियों द्वारा लाई गई चीजें हम तक नहीं पहुँच पाई थी । वैसे पता नहीं कैसे पर लड्डुओं की खुशबू दो एडमिनों को खींच लाई थी हमारे कमरे में ।  बाकी सुबह जैसा मैं चाहता था कि बस निकल लें कैमरा उठाकर , वैसा ना हुआ सबने बहुत लेट किया । नाश्ते तक मैं बोर होने लगा था । और फिर एक बार तो नाश्ते में पोहा देख फिर माथा ठनका । पर ठनके माथे को रसभरी गुजिया ने ठीक कर दिया और फिर जैसा मैं आम तौर पर करता नहीं हूँ गुजिया और पेठा खाकर मैने पोहा फेंक दिया । काफी भूख लगी होने के बावजूद नहीं खाया गया वो मुझसे । मुझे बुरा भी लगा उसे बर्बाद करना । नाश्ते के बाद भी सबने बहुत समय लगा दिया ।
                                                                  रोमेश शर्माजी उधमपुर वाले सुबह ही निकल गए थे बेतवा की तरफ सुशांत जी के साथ । वो दोनों ही ठीक रहे सुबह का पूरा आनंद उठाया । हालांकी दोनो अलग अलग कारणों से निकले थे । रमेश जी शांति के लिए और सुशांत जी निकले थे कैमरा लेकर फोटोग्राफी के लिए । सुबह नाश्ते के बाद सबको बेतवा की ओर ही जाना था तो रोमेश जी वहीं रह गए । पर सुशांत जी होटल आ गए अब आ तो गए पर कमरे की चाबी रोमेश जी के पास थी । भई ये तो दिक्कत हो गई  क्योंकि इनको कपड़े चेंज करने थे । और उससे बड़ी दिक्कत ये की कैमरे के लैंस कमरे में बंद । अब लैंसो के बगैर सुशांत जी इस तरह मानो पानी बिना मछली । इसका हल पांडेय जी ने कमरे की दूसरी चाबी लेकर  निकाला । समय बहुत हो चुका था पर कुछ लोग निकल ही नहीं रहे थे कमरों से । मुंबई वाले आज ही जा रहे थे सुबह ही । पर विनोद का मन नहीं था जाने का । मन तो बुआ का भी नहीं था पर ट्रेन में सीट मिलने ना मिलने के संशय में उन्होने भी चलने की सोच ली  पर विनोद ने साफ मना कर दिया था जाने को अभी और वो गया भी नहीं । अब ये लोग कल दोपहर तो आए ही थे और आज सुबह को चल पड़े । सचिन त्यागी भाई भी निकल पड़े थे ।  फिर हम कुछ लोग बाकियों से पहले ही पांडेय जी से जगह पूछकर निकल पड़े पर हमें क्या पता था कि जो लोग अभी जल्दी नहीं दिखा रहे वो गाड़ियों में हमसे भी पहले पहुँच जाऐंगे ? खैर मुझे तो वैसे भी पैदल चलना पसंद है और ऊपर से सुशांत जी साथ में चल रहे थे । रस्ते भर कैमरों की खचाखच होती रही । सुशांत जी भी रस्ते भर फोटो लेते रहे लैंस बदलते रहे । उन्होने तीन चार फोटो मेरे भी लिए।



नाश्ता 

खचाखच 

 जब सब ओरछा सेंचुरी पहुँच गए तो युवराज ( संजय कौशिक जी के सुपुत्र ) सेंटा क्लॉज के रूप में सबको ग्रुप के नाम वाला बैज और पेन देते हुए आए । क्रिसमस का दिन था तो सेंटा तो आना ही था बस रात की जगह दिन में आ गया था ।  बैज और पैन और साथ में ग्रुप के लोगो वाली टोपी सबको चार चांद लगा रही थी । फिर वहाँ हमारा एक ग्रुप फोटो हुआ । इस फोटो में तकरीबन सभी ग्रुप मेंबर्स थे । पर्यावरण के नाम ग्रुप की ओर से पौधारोपण भी किया गया । विनोद ने कोठारी जी जो जयपुर से हैं और नहीं आ पाए थे उनके नाम का भी पेड़ लगाया । विनोद को सभी हल्के में ले जाते हैं पर ये बंदा दिल से बहुत ही अच्छा है । मैं  इस पौधारोपण के समय पता नहीं कहाँ चला गया था । सब फोटो खिंचवा गए मैं रह गया । पौधारोपण के बाद सब फिर जुट गए छतरियों को अपने कैमरों में समेटने । बेतवा के किनारे बैठ छतरियाँ निहारते हुए आप बिना बोर हुए कितना भी समय निकाल सकते हैं 


क्रिसमस का दिन और संता न आये 

घुमक्कड़ी दिल से 

 वहाँ कुछ समय निकाल कर हमें पंचमढ़िया जाना था पर किसी को चलता ना देख पाँडेय जी से रस्ता पूछकर मैं और आर डी भाई उर्फ डोलरिया बाबा चल पड़े पैदल ही । पंचमढ़िया यहाँ से ढ़ाई किमी है । करीब आधा किलो मीटर के बाद हमारी गाड़ी आई और आरडी भाई उससे चले गए । गाड़ी आई भी बिल्कुल सही समय पर क्योंकि वहाँ से मुड़ना था अगर गाड़ी ना आती तो हो सकता था कि हम आगे निकल जाते । अब मैं अकेला चल रहा था जंगल से । बड़ा मजा आ रहा था क्योंकि मुझे अकेले में ही अच्छा लगता है ज्यादा । रस्ते भर फोटो खींचता गया । अभी ओरछा सेंचुरी में बंदरों को छोड़कर कोई जानवर नहीं दिखे । शायद आने वाले समय में यहाँ जानवरो को लाया जाएगा। अपने फोटो लेने के लिए टाईम भर कर कहीं पेड़ पर अटका देता कैमरा कभी पत्थर पर रख लेता । कुछ लोग गाड़ियों से आए पर फिर भी मैं लगभग उन्ही के साथ पंचमढ़िया पहुँचा ।


चल अकेला 

वो दूर जा रही गाड़ी 

बस थोड़ा और 


यू कैमरा रखो 

और यू फोटो खींच लो 

हर पेड़ में दीमक राजनीती की तरह 

शायद कुछ बनेगा यहाँ 



मेरा बस एक फोटो और 

पहुँच गया 

 बच्चे पानी में कूद चुके थे । बेतवा की सवच्छ धारा देखकर किसका मन ना मचलेगा ? बस मेरे जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर । सुशांत जी , प्रकाश जी और पंकज शर्मा जी नटवर जी भी कैमरों को उठाकर चल पड़े थे बाकी हम जैसे शौकिया क्लिकर्स भी जुट चुके थे । कुछ लोग थोड़ी दूर नहाने चले गए उस जगह का नाम शायद शिकारगाह था। मैं भी उठा , धारा पार की और कुछ दूर पेड़ों के झुंड तले बिल्कुल पानी के साथ एक पेड़ के तले कुछ पत्ते वगैरह बिछाए और लेट गया । बड़ी बढ़िया जगह थी पानी की आवाज आ रही थी बढ़िया ठंडक थी और सबसे मेन बात मुझे नींद भी आ रही थी । कौशिक जी को फोन कर दिया था कि खाने के समय मुझे उठा लिजिएगा । वहाँ पर बड़ी बड़ी चीटियां थी बिल्कुल पीले रंग की साईज में भी काफी बड़ी । कुछ तो मेरे उपर भी चढ़ गई थी । एक बार सोचा की कहीं ये काट काट कर सूजा ना दे । फिर एक को हाथ पर चढ़ाया उसने ना काटा फिर सोचा की जब तक मौका नहीं दूंगा तब तक पता कैसे चलेगा कि काटती है या नहीं । फिर बस आँख लग गई । मेरी आँख ना तो चीटियों के काटने से खुली ना ही कौशिक जी के फोन से , आँख खुली जब एक गऊ माता मुझे ये देखने आई की ये जिंदा है या मर चुका है । शुक्र था कि बस मुँह मार के चेक किया , कहीं पैर रख के चैक करती तो गड़बड़ हो जाती । और यकीन मानिए एक बार तो मुझे लगा पता नहीं क्या जानवर आ गया । एक बार तो झटका सा लगा था । बस फिर कहाँ नींद आनी थी । मैं भी चल पड़ा आवाजों का पीछा करते हुए जहाँ पर घुमक्कड़ नहा रहे थे ।


ये भी बेतवा की ही धार है 

हमसे पहले आकर कब्ज़ा 

चल अब तू भी साइड में 

जे बड़ी बड़ी पिली चीटियाँ 

अब काटेंगी तो देखी जाएगी 

मेरी नींद हरने वाली 

 वहाँ कुछ देर बाद कौशिक जी के फोन पर फोन आया किसन जी का वो झांसी रेलवे स्टेशन पहुँच चुके थे । पाँडेय जी ने कहा कि किसन जी को पहचानते हो ? मैने कहा हाँ तो वे बोले कि तुम जाओ ड्राईवर के साथ और उनको ले आओ । गाड़ी के पास गया तो आर डी बोला की मैं जाता हूँ वे आ जाऐंगे मैं वहीं रह जाऊँगा । उसे ट्रेन पकड़नी थी खजुराहो की । मैने कहाँ ठीक है आप जाओ । तभी वहाँ गाड़ी आई पुलिस की । उसमें से उतरे कौन ? SP साहब ! अब कोई भी हो हम कोई क्रिमीनल थोड़े है जो पुलीस से घबराऐंगे । चाहे एस पी आओ या डीजीपी दरअसल वो भी अपने किसी परिचित को पंचमढ़िया घुमाने लाए थे जैसे पांडेय जी हमें लाए थे । तब मैं भी जाने लगा स्नान करने वालों के पास शिकारगाह की तरफ पर वो खुद सामने से चले आ रहे थे । उसके बाद भोजन की बारी आई । सब नीचे बैठ गए गोल घेरे में । पत्तल में भोजन परोसा गया । दो तीन प्रकार के लड्डू भी आए प्रकाश जी के सौजन्य से। हाथ से बधाई गई मोटी रोटी ( टिक्कड़ ) बाटी ( लोई की लोई सेंकी हुई ) दाल , बैंगन का भर्ता और सलाद । आह ! पेट के साथ आत्मा भी तृप्त हो गई । बाटी वाले भाई साब सबसे पूछते की रख दूं ? पर जैसे ही हमारे मिश्रा जी के पास पहुँचते बिना पूछे ही रख देते और कहते कि आप तो लेंगे ही ! भोजनोपरांत बच्चों द्वारा कविता , चुटकुले सुनाए गए । बड़ा बढ़िया लगा । पुरस्कार स्वरूप उन्हे घड़ी मिलती देख हमारे विनोद बाबू का मन भी मचल गया । पर उन्हे घड़ी ना मिली । फिर अपना अपना बुद्धि प्रदर्शन करने की बारी आई बड़ों की , प्रकाश यादव जी की अर्धांगिनी जी ( मुझे नाम नहीं पता ) ने सबको प्रश्नपत्र बांट दिए । सबसे पहले सवाल का जवाब उन्ही नें दिया उदाहरण के तौर पर । बस पच्चीस में से एक यही सवाल का जवाब हमारे विनोद बाबू ने दिया । और वो इतने भारी अंकों से नाचे से प्रथम आए । हरियाणे वालों का प्रदर्शन बढ़िया रहा । टॉप किया पाँडेय जी ने । कुछ लोगों ने दिलचस्प  जवाब दिए जैसे कि मिश्रा जी ने गांधारी का बनाया धांधारी । और इससे भी मजे की बात की ये उत्तर भी उन्होने किसी और का कॉपी किया । इसी बीच किसन जी भी पहुँच गए थे तूफान की तरह और जाते ही सबसे मिले बड़े ही जोश में । थके हारों को फिर से रिचार्ज कर दिया उन्होने । शाम को जब सब लोग वापस जा रहे थे शहर की तरफ तो एक एक दो दो कर के जा रहे थे मुझे पता नहीं चल पाया कि अब जाना कहाँ है । मैने सचिन से फोन पे पूछा की कहाँ है तो वो बोला कि होटल में हूँ । मैं होटल पहुँच गया । वहाँ देखा तो सिर्फ वही था वहाँ । फिर बाकी लोगों का फोन ट्राई किया तो पता चला की बाकी लोग तो ओरछा रिजॉर्ट में है चाय पकौड़ों पर हाथ साफ किया जा रहा है । हे भगवान इतनी दूर ? मैने एक बार तो मना किया पर सचिन के फिर पूछने पर मैने हामी भर दी और दोनों चल पड़े । पर किस्मत देखिए हम वहाँ गेट पर पहुँचे की बाकी निकलने शुरू हो गए । बड़ा अफसोस हुआ ! पकौड़ों का नहीं बल्कि इस बात का कि जांगड़ा सारे रस्ते पैदल खिंचाई को कोसता गया और उसका फल भी नहीं मिला । रात हो चुकी थी । कुछ लोग निकल चुके थे कुछ रूकने वाले थे । हमारी गाड़ी भी रात को ही थी । तो हम भी रात को निकलने वाले थे । अब गाड़ी वहाँ एक थी और लोग ज्यादा ! एक गाड़ी किसन जी को छोड़ने गई थी । किसन जी सबसे कम रूके वहाँ शायद कुछ ही घंटे ।पर कुछ घंटों में ही वो काफी समय बिता गए । तो एक ऑटो किया गया और एक गाड़ी हो गई । झाँसी स्टेशन पर पहुँच कर  भोजन लिया गया । सुबह तक हम हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पर थे और जो लोग हमसे पहले निकले थे । झाँसी से वो अभी तक नहीं पहुँचे थे ।वहाँ पहुँच कर अपना किराया चुकाया गया ।  मैने कौशिक जी से टिकट के पैसे पूछे तो वे बोले की पाँच सौ । यार इतनी महंगी तो जाने की नहीं थी । कुछ देर बाद जब वे गाड़ी हटने लगी तो मैने पूछा कौशिक जी से कि ये कौन सी गाड़ी थी ? ताकी भविष्य मे ध्यान रखा जा सके इसका । तो उन्होने बताया तो मैं बोला की बबुत महंगी थी । तो वे बोले की तेरी तो बस आने की टिकट थी ना ? मैं बोला हाँ । फिर मुझे कुछ धन वापस मिला । अब ये गाड़ी ब्लैकलिस्ट से बाहर  निकाली मैने । बस फिर निकल पड़े अपने अपने गाँवो शहरों की तरफ । ये मिलन एक शानदार आयोजन रहा । विनोद भाई की भूमिका रही सूत्रधार की । आयोजन को सफल बनाया पाँडेय जी ने । प्रतीक भाई ने भी काफी मन से सहायता की लोगों की  । बाकी सबका योगदान रहा जो आए उनका भी और जो ना आ पाए उनका भी । सब लोगों से मिलना क्या पता कब तक हो पाता ? पर ये एक ऐसा मौका रहा जो बार बार शायद नहीं आएगा । मैं ग्रुप के कारण ओरछा को तो नहीं देख पाया पूरा परंतु कोई शिकवा नहीं है । आज जब मैं ये बाते लिख रहा हूँ करीब बीस दिन बीत चुके हैं पर फेसबुक टाईमलाईन , व्हाट्सएप पर अभी भी ओरछा ही ओरछा नजर आ रहा है । ये महामिलन संभवत: ओरछा के लिए भी फायदेमंद रहेगा । इस मिलन से पहले और बाद में लोगों के लिए ओरछा के मायने बदले हैं । पहले शायद कुछ लोग ओरछा को जानते भी ना हों पर अब ओरछा घुमक्कड़ों की हिट लिस्ट में शामिल हो गया है । ओरछा में सबके लिए कुछ ना कुछ है चाहे वे बच्चे हो बूढ़े हो । भक्त हो या वास्तुप्रेमी । बस इतना ही कहूँगा अंत मैं कि ओरछा - दिल अभी भरा नहीं ।


इस पूरी यात्रा जिसमें खजुराहो यात्रा भी शामिल है ओरछा के साथ , जिसमें मैं पाँचवे दिन घर आया और इसका कुल खर्चा आया करीब पच्चीस सौ रूपये घर से घर तक ।  अब मिलते हैं जल्द ही खजुराहो यात्रा वाली पोस्ट के साथ । धन्यवाद ।

कुछ और चित्र 


विनोद का गहन वार्तालाप 





इनके साथ बियर की बोतले भी रखी  थी 

उम्र का असर 
अहा जिन्दगी 



बच्चों को हँसाने आया है या डराने 

कैमरे के उस्ताज लोग 

जे हमारे सहगल साब 

बीएसएनएल की रेंज ढूंढते हुए 

मिलेंगे फिर से घुमक्कड़ी दिल से 


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22 comments:

  1. हरेंद्र भाई , आपको पोहा अच्छा नही लगा, तो बताना था,कुछ और व्यवस्था करते । हमने तो सबको स्थानीय स्वाद से परिचित कराने के उद्देश्य से उसे मेनू में जोड़ा था । वैसे ये आपने सही कहा कि ये महामिलन ओरछा के लिए भी फायदेमंद रहा । कुछ बड़े घुमक्कड़ तो ओरछा आ चुके , कुछ आने का प्लान बना चुके है । और बड़े बड़े ब्लॉगर ओरछा पर लिख भी रहे है । आभार मित्र

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    1. हमारे इन छोटे छोटे प्रयासों से यदि ओरछा का कुछ फायदा होता है तो ग्रुप अवश्य ही बधाई का पात्र है ।

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  2. बहुत बढ़िया लिखा है हरेंद्र भाई ।पोहा तो मुझे भी पसंद नहीं बड़ा सूखा लगता है गले को ,लेकिन चुपचाप खा लिया । तसवीरें सभी सुन्दर हैं ।

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    1. धन्यवाद । बस यही दिक्कत है कि पोहा के साथ दाल वगैरह नहीं होती ।

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  3. वाह भाई दिल जीत लिया तूने

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    1. तू कम थोड़े है भाई ।

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  4. वाह भाई दिल जीत लिया तूने

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  5. भला हो गुझिया का जिसने मूड ठीक कर दिया वर्ना पोहा तो मुझे भी पसंद नहीं।बढ़िया खाने के स्वाद से सजी पोस्ट है। क्रिसमस के दिन सांता ना आये तो सच में अधूरा रह जाता

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    1. जिंदगी में खाना ही है जो है ।

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  6. बहुत बढ़िया पोस्ट हरेन्द्र जी। ओरछा फिर से घूम लिये।
    खाने सबकी अपनी पसन्द अलग होती है ।

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    1. सही कहा रितेश जी । सबकी पसंद अलग अलग होती है ।

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  7. अरे वाह, तुम्हारी इस पोस्ट से बहुत सारी नयी नयी बातें पता चलीं। जैसे कि तुम अकेले ही अपनी फोटुएं खींचते खींचते pachmadhiya पहुंचे थे, नदी तट पर चींटियों के साथ सोये भी थे। कुल मिलाकर ये मिलन हर किसी के लिए यादगार रहा और सबको कुछ न कुछ देकर ही गया है।

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    1. वाकई मिलन यादगार रहा सर ।

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  8. वाह... धाराप्रवाह बेलाग कमेंट्री बहुत अच्छी लगी। 😊

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    1. धन्यवाद कोठारी जी ।

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  9. वाह भाई जी सा आ गया पढ कर

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    1. शुक्रिया भाई जी ।

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