Wednesday, January 25, 2017

ओरछा महामिलन भाग -3 पंचमढ़िया ( Orchha part-3 , panchmadhiya )






पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा कि 24 दिसंबर को हम राजाराम मंदिर और चतुर्भुज मंदिर देखने के बाद शाम को बेतवा किनारे गए और रात को लाईट एंड साउँड शो देखा ।  अब आगे -


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अगले दिन सुबह जल्दी उठकर हम तीनों ( मैं , सचिन और सहगल साब ) नहा लिए थे ये सोचकर की सुबह जल्दी  निकलेंगे और एक कारण ये भी था कि पास वाले कमरे में गीज़र नहीं चल रहा तो उस कमरे वाले भी यहीं नहाऐंगे । नहा धोकर सब बैठे थे कि विनोद कमरे में आया लड्डू और चकली लेकर । सबसे पहले भोग मैने ही लगाया लड्डूओं का फिर बाकी लोगों को दिया पर फिर भी वो उसी तरह पूरे ग्रुप को नहीं मिल पाया जिस तरह बाकियों द्वारा लाई गई चीजें हम तक नहीं पहुँच पाई थी । वैसे पता नहीं कैसे पर लड्डुओं की खुशबू दो एडमिनों को खींच लाई थी हमारे कमरे में ।  बाकी सुबह जैसा मैं चाहता था कि बस निकल लें कैमरा उठाकर , वैसा ना हुआ सबने बहुत लेट किया । नाश्ते तक मैं बोर होने लगा था । और फिर एक बार तो नाश्ते में पोहा देख फिर माथा ठनका । पर ठनके माथे को रसभरी गुजिया ने ठीक कर दिया और फिर जैसा मैं आम तौर पर करता नहीं हूँ गुजिया और पेठा खाकर मैने पोहा फेंक दिया । काफी भूख लगी होने के बावजूद नहीं खाया गया वो मुझसे । मुझे बुरा भी लगा उसे बर्बाद करना । नाश्ते के बाद भी सबने बहुत समय लगा दिया ।
                                                                  रोमेश शर्माजी उधमपुर वाले सुबह ही निकल गए थे बेतवा की तरफ सुशांत जी के साथ । वो दोनों ही ठीक रहे सुबह का पूरा आनंद उठाया । हालांकी दोनो अलग अलग कारणों से निकले थे । रमेश जी शांति के लिए और सुशांत जी निकले थे कैमरा लेकर फोटोग्राफी के लिए । सुबह नाश्ते के बाद सबको बेतवा की ओर ही जाना था तो रोमेश जी वहीं रह गए । पर सुशांत जी होटल आ गए अब आ तो गए पर कमरे की चाबी रोमेश जी के पास थी । भई ये तो दिक्कत हो गई  क्योंकि इनको कपड़े चेंज करने थे । और उससे बड़ी दिक्कत ये की कैमरे के लैंस कमरे में बंद । अब लैंसो के बगैर सुशांत जी इस तरह मानो पानी बिना मछली । इसका हल पांडेय जी ने कमरे की दूसरी चाबी लेकर  निकाला । समय बहुत हो चुका था पर कुछ लोग निकल ही नहीं रहे थे कमरों से । मुंबई वाले आज ही जा रहे थे सुबह ही । पर विनोद का मन नहीं था जाने का । मन तो बुआ का भी नहीं था पर ट्रेन में सीट मिलने ना मिलने के संशय में उन्होने भी चलने की सोच ली  पर विनोद ने साफ मना कर दिया था जाने को अभी और वो गया भी नहीं । अब ये लोग कल दोपहर तो आए ही थे और आज सुबह को चल पड़े । सचिन त्यागी भाई भी निकल पड़े थे ।  फिर हम कुछ लोग बाकियों से पहले ही पांडेय जी से जगह पूछकर निकल पड़े पर हमें क्या पता था कि जो लोग अभी जल्दी नहीं दिखा रहे वो गाड़ियों में हमसे भी पहले पहुँच जाऐंगे ? खैर मुझे तो वैसे भी पैदल चलना पसंद है और ऊपर से सुशांत जी साथ में चल रहे थे । रस्ते भर कैमरों की खचाखच होती रही । सुशांत जी भी रस्ते भर फोटो लेते रहे लैंस बदलते रहे । उन्होने तीन चार फोटो मेरे भी लिए।



नाश्ता 

खचाखच 

 जब सब ओरछा सेंचुरी पहुँच गए तो युवराज ( संजय कौशिक जी के सुपुत्र ) सेंटा क्लॉज के रूप में सबको ग्रुप के नाम वाला बैज और पेन देते हुए आए । क्रिसमस का दिन था तो सेंटा तो आना ही था बस रात की जगह दिन में आ गया था ।  बैज और पैन और साथ में ग्रुप के लोगो वाली टोपी सबको चार चांद लगा रही थी । फिर वहाँ हमारा एक ग्रुप फोटो हुआ । इस फोटो में तकरीबन सभी ग्रुप मेंबर्स थे । पर्यावरण के नाम ग्रुप की ओर से पौधारोपण भी किया गया । विनोद ने कोठारी जी जो जयपुर से हैं और नहीं आ पाए थे उनके नाम का भी पेड़ लगाया । विनोद को सभी हल्के में ले जाते हैं पर ये बंदा दिल से बहुत ही अच्छा है । मैं  इस पौधारोपण के समय पता नहीं कहाँ चला गया था । सब फोटो खिंचवा गए मैं रह गया । पौधारोपण के बाद सब फिर जुट गए छतरियों को अपने कैमरों में समेटने । बेतवा के किनारे बैठ छतरियाँ निहारते हुए आप बिना बोर हुए कितना भी समय निकाल सकते हैं 


क्रिसमस का दिन और संता न आये 

घुमक्कड़ी दिल से 

 वहाँ कुछ समय निकाल कर हमें पंचमढ़िया जाना था पर किसी को चलता ना देख पाँडेय जी से रस्ता पूछकर मैं और आर डी भाई उर्फ डोलरिया बाबा चल पड़े पैदल ही । पंचमढ़िया यहाँ से ढ़ाई किमी है । करीब आधा किलो मीटर के बाद हमारी गाड़ी आई और आरडी भाई उससे चले गए । गाड़ी आई भी बिल्कुल सही समय पर क्योंकि वहाँ से मुड़ना था अगर गाड़ी ना आती तो हो सकता था कि हम आगे निकल जाते । अब मैं अकेला चल रहा था जंगल से । बड़ा मजा आ रहा था क्योंकि मुझे अकेले में ही अच्छा लगता है ज्यादा । रस्ते भर फोटो खींचता गया । अभी ओरछा सेंचुरी में बंदरों को छोड़कर कोई जानवर नहीं दिखे । शायद आने वाले समय में यहाँ जानवरो को लाया जाएगा। अपने फोटो लेने के लिए टाईम भर कर कहीं पेड़ पर अटका देता कैमरा कभी पत्थर पर रख लेता । कुछ लोग गाड़ियों से आए पर फिर भी मैं लगभग उन्ही के साथ पंचमढ़िया पहुँचा ।


चल अकेला 

वो दूर जा रही गाड़ी 

बस थोड़ा और 


यू कैमरा रखो 

और यू फोटो खींच लो 

हर पेड़ में दीमक राजनीती की तरह 

शायद कुछ बनेगा यहाँ 



मेरा बस एक फोटो और 

पहुँच गया 

 बच्चे पानी में कूद चुके थे । बेतवा की सवच्छ धारा देखकर किसका मन ना मचलेगा ? बस मेरे जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर । सुशांत जी , प्रकाश जी और पंकज शर्मा जी नटवर जी भी कैमरों को उठाकर चल पड़े थे बाकी हम जैसे शौकिया क्लिकर्स भी जुट चुके थे । कुछ लोग थोड़ी दूर नहाने चले गए उस जगह का नाम शायद शिकारगाह था। मैं भी उठा , धारा पार की और कुछ दूर पेड़ों के झुंड तले बिल्कुल पानी के साथ एक पेड़ के तले कुछ पत्ते वगैरह बिछाए और लेट गया । बड़ी बढ़िया जगह थी पानी की आवाज आ रही थी बढ़िया ठंडक थी और सबसे मेन बात मुझे नींद भी आ रही थी । कौशिक जी को फोन कर दिया था कि खाने के समय मुझे उठा लिजिएगा । वहाँ पर बड़ी बड़ी चीटियां थी बिल्कुल पीले रंग की साईज में भी काफी बड़ी । कुछ तो मेरे उपर भी चढ़ गई थी । एक बार सोचा की कहीं ये काट काट कर सूजा ना दे । फिर एक को हाथ पर चढ़ाया उसने ना काटा फिर सोचा की जब तक मौका नहीं दूंगा तब तक पता कैसे चलेगा कि काटती है या नहीं । फिर बस आँख लग गई । मेरी आँख ना तो चीटियों के काटने से खुली ना ही कौशिक जी के फोन से , आँख खुली जब एक गऊ माता मुझे ये देखने आई की ये जिंदा है या मर चुका है । शुक्र था कि बस मुँह मार के चेक किया , कहीं पैर रख के चैक करती तो गड़बड़ हो जाती । और यकीन मानिए एक बार तो मुझे लगा पता नहीं क्या जानवर आ गया । एक बार तो झटका सा लगा था । बस फिर कहाँ नींद आनी थी । मैं भी चल पड़ा आवाजों का पीछा करते हुए जहाँ पर घुमक्कड़ नहा रहे थे ।


ये भी बेतवा की ही धार है 

हमसे पहले आकर कब्ज़ा 

चल अब तू भी साइड में 

जे बड़ी बड़ी पिली चीटियाँ 

अब काटेंगी तो देखी जाएगी 

मेरी नींद हरने वाली 

 वहाँ कुछ देर बाद कौशिक जी के फोन पर फोन आया किसन जी का वो झांसी रेलवे स्टेशन पहुँच चुके थे । पाँडेय जी ने कहा कि किसन जी को पहचानते हो ? मैने कहा हाँ तो वे बोले कि तुम जाओ ड्राईवर के साथ और उनको ले आओ । गाड़ी के पास गया तो आर डी बोला की मैं जाता हूँ वे आ जाऐंगे मैं वहीं रह जाऊँगा । उसे ट्रेन पकड़नी थी खजुराहो की । मैने कहाँ ठीक है आप जाओ । तभी वहाँ गाड़ी आई पुलिस की । उसमें से उतरे कौन ? SP साहब ! अब कोई भी हो हम कोई क्रिमीनल थोड़े है जो पुलीस से घबराऐंगे । चाहे एस पी आओ या डीजीपी दरअसल वो भी अपने किसी परिचित को पंचमढ़िया घुमाने लाए थे जैसे पांडेय जी हमें लाए थे । तब मैं भी जाने लगा स्नान करने वालों के पास शिकारगाह की तरफ पर वो खुद सामने से चले आ रहे थे । उसके बाद भोजन की बारी आई । सब नीचे बैठ गए गोल घेरे में । पत्तल में भोजन परोसा गया । दो तीन प्रकार के लड्डू भी आए प्रकाश जी के सौजन्य से। हाथ से बधाई गई मोटी रोटी ( टिक्कड़ ) बाटी ( लोई की लोई सेंकी हुई ) दाल , बैंगन का भर्ता और सलाद । आह ! पेट के साथ आत्मा भी तृप्त हो गई । बाटी वाले भाई साब सबसे पूछते की रख दूं ? पर जैसे ही हमारे मिश्रा जी के पास पहुँचते बिना पूछे ही रख देते और कहते कि आप तो लेंगे ही ! भोजनोपरांत बच्चों द्वारा कविता , चुटकुले सुनाए गए । बड़ा बढ़िया लगा । पुरस्कार स्वरूप उन्हे घड़ी मिलती देख हमारे विनोद बाबू का मन भी मचल गया । पर उन्हे घड़ी ना मिली । फिर अपना अपना बुद्धि प्रदर्शन करने की बारी आई बड़ों की , प्रकाश यादव जी की अर्धांगिनी जी ( मुझे नाम नहीं पता ) ने सबको प्रश्नपत्र बांट दिए । सबसे पहले सवाल का जवाब उन्ही नें दिया उदाहरण के तौर पर । बस पच्चीस में से एक यही सवाल का जवाब हमारे विनोद बाबू ने दिया । और वो इतने भारी अंकों से नाचे से प्रथम आए । हरियाणे वालों का प्रदर्शन बढ़िया रहा । टॉप किया पाँडेय जी ने । कुछ लोगों ने दिलचस्प  जवाब दिए जैसे कि मिश्रा जी ने गांधारी का बनाया धांधारी । और इससे भी मजे की बात की ये उत्तर भी उन्होने किसी और का कॉपी किया । इसी बीच किसन जी भी पहुँच गए थे तूफान की तरह और जाते ही सबसे मिले बड़े ही जोश में । थके हारों को फिर से रिचार्ज कर दिया उन्होने । शाम को जब सब लोग वापस जा रहे थे शहर की तरफ तो एक एक दो दो कर के जा रहे थे मुझे पता नहीं चल पाया कि अब जाना कहाँ है । मैने सचिन से फोन पे पूछा की कहाँ है तो वो बोला कि होटल में हूँ । मैं होटल पहुँच गया । वहाँ देखा तो सिर्फ वही था वहाँ । फिर बाकी लोगों का फोन ट्राई किया तो पता चला की बाकी लोग तो ओरछा रिजॉर्ट में है चाय पकौड़ों पर हाथ साफ किया जा रहा है । हे भगवान इतनी दूर ? मैने एक बार तो मना किया पर सचिन के फिर पूछने पर मैने हामी भर दी और दोनों चल पड़े । पर किस्मत देखिए हम वहाँ गेट पर पहुँचे की बाकी निकलने शुरू हो गए । बड़ा अफसोस हुआ ! पकौड़ों का नहीं बल्कि इस बात का कि जांगड़ा सारे रस्ते पैदल खिंचाई को कोसता गया और उसका फल भी नहीं मिला । रात हो चुकी थी । कुछ लोग निकल चुके थे कुछ रूकने वाले थे । हमारी गाड़ी भी रात को ही थी । तो हम भी रात को निकलने वाले थे । अब गाड़ी वहाँ एक थी और लोग ज्यादा ! एक गाड़ी किसन जी को छोड़ने गई थी । किसन जी सबसे कम रूके वहाँ शायद कुछ ही घंटे ।पर कुछ घंटों में ही वो काफी समय बिता गए । तो एक ऑटो किया गया और एक गाड़ी हो गई । झाँसी स्टेशन पर पहुँच कर  भोजन लिया गया । सुबह तक हम हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पर थे और जो लोग हमसे पहले निकले थे । झाँसी से वो अभी तक नहीं पहुँचे थे ।वहाँ पहुँच कर अपना किराया चुकाया गया ।  मैने कौशिक जी से टिकट के पैसे पूछे तो वे बोले की पाँच सौ । यार इतनी महंगी तो जाने की नहीं थी । कुछ देर बाद जब वे गाड़ी हटने लगी तो मैने पूछा कौशिक जी से कि ये कौन सी गाड़ी थी ? ताकी भविष्य मे ध्यान रखा जा सके इसका । तो उन्होने बताया तो मैं बोला की बबुत महंगी थी । तो वे बोले की तेरी तो बस आने की टिकट थी ना ? मैं बोला हाँ । फिर मुझे कुछ धन वापस मिला । अब ये गाड़ी ब्लैकलिस्ट से बाहर  निकाली मैने । बस फिर निकल पड़े अपने अपने गाँवो शहरों की तरफ । ये मिलन एक शानदार आयोजन रहा । विनोद भाई की भूमिका रही सूत्रधार की । आयोजन को सफल बनाया पाँडेय जी ने । प्रतीक भाई ने भी काफी मन से सहायता की लोगों की  । बाकी सबका योगदान रहा जो आए उनका भी और जो ना आ पाए उनका भी । सब लोगों से मिलना क्या पता कब तक हो पाता ? पर ये एक ऐसा मौका रहा जो बार बार शायद नहीं आएगा । मैं ग्रुप के कारण ओरछा को तो नहीं देख पाया पूरा परंतु कोई शिकवा नहीं है । आज जब मैं ये बाते लिख रहा हूँ करीब बीस दिन बीत चुके हैं पर फेसबुक टाईमलाईन , व्हाट्सएप पर अभी भी ओरछा ही ओरछा नजर आ रहा है । ये महामिलन संभवत: ओरछा के लिए भी फायदेमंद रहेगा । इस मिलन से पहले और बाद में लोगों के लिए ओरछा के मायने बदले हैं । पहले शायद कुछ लोग ओरछा को जानते भी ना हों पर अब ओरछा घुमक्कड़ों की हिट लिस्ट में शामिल हो गया है । ओरछा में सबके लिए कुछ ना कुछ है चाहे वे बच्चे हो बूढ़े हो । भक्त हो या वास्तुप्रेमी । बस इतना ही कहूँगा अंत मैं कि ओरछा - दिल अभी भरा नहीं ।


इस पूरी यात्रा जिसमें खजुराहो यात्रा भी शामिल है ओरछा के साथ , जिसमें मैं पाँचवे दिन घर आया और इसका कुल खर्चा आया करीब पच्चीस सौ रूपये घर से घर तक ।  अब मिलते हैं जल्द ही खजुराहो यात्रा वाली पोस्ट के साथ । धन्यवाद ।

कुछ और चित्र 


विनोद का गहन वार्तालाप 





इनके साथ बियर की बोतले भी रखी  थी 

उम्र का असर 
अहा जिन्दगी 



बच्चों को हँसाने आया है या डराने 

कैमरे के उस्ताज लोग 

जे हमारे सहगल साब 

बीएसएनएल की रेंज ढूंढते हुए 

मिलेंगे फिर से घुमक्कड़ी दिल से 


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Wednesday, January 4, 2017

ओरछा महामिलन भाग -2 , रामराजा और चतुर्भुज मंदिर ( Ramraja and chaturbhuj temple ,orchha )




पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा मैं खजुराहो घूमकर रामराजा की नगरी ओरछा पहुँचा था और साथ थे करीब 14 राज्यों से आए घुमक्कड़ मित्र । पिछली पोस्ट में आपने हरदौल के बारे में पढ़ा था  तो अबकी बार हम पढ़ेंगे रामराजा मंदिर , चतुर्भुज मंदिर के बारे में -

महामिलन के पहले भाग के लिए यहाँ क्लिक करें

हरदौल मंदिर के बाद हम पहुँचे रामराजा मंदिर में और इसी के साथ लगते चतुर्भुज मंदिर में । यहाँ फूलबाग में दो काफी ऊँची मीनारें हैं । इनका नाम है सावन भादों और कहते हैं सावन भादो के महिनों में ये आपस में मिल जाती हैं , जो कि असंभव है ये तभी संभव होगा जब और कई सौ साल बाद ये जर्जर होकर धरती माता से मिलने आऐंगी नीचे और ऐसी मिलेंगी के कोई  अलग ना कर पाएगा। दरअसल इन के नीचे राजपरिवार के लिए कक्ष बने थे जिनमे इनसे होकर शीतल हवा जाती था या फिर जैसा पाँडेय जी ने बताया कि ऊपर गाने बजाने वालों को बैठाया और नीचे कक्ष में  संगीत का आनंद लिया । राजाराम मंदिर और चतुर्भुज मंदिर  दोनों मंदिरों की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है ।
सावन भादों मीनार 




ये मीनारे फूल बाग में है 

   कहते हैं राजा मधुकरशाह कृष्ण भक्त थे । एक बार उन्होने रानी गणेश कुँवरी को कृष्ण उपासना के लिए वृंदावन चलने को कहा । अब मधुकर शाह तो कृष्ण भक्त थे परंतु उनकी रानी गणेश कुंवरी तो रामभक्त थी । रानी ने मना करते हुए राम उपासना के लिए अयोध्या जाने की बात कही । इस पर मधुकरशाह गुस्सा हो गए और रानी को महल छोड़ने का आदेश दिया और साथ ही कहा कि वे वापस तभी आएँ जब राम उनके साथ आना चाहें । इस पर रानी गणेश कुँवरी अयोध्या चली जाती हैं और सरयू के किनारे श्रीराम उपासना करने लगती हैं । काफी समय तपस्या के बाद भी इच्छा पूरी ना होते देख रानी सरयू की मंझधार में छलांग लगा देती हैं । रानी को प्रभु राम डूबने से बचाते हैं तो रानी गणेश कुँवरी कहती है कि प्रभु मेरी लाज रखने के लिए मेरे साथ ओरछा चलिए । श्रीराम रानी जूँ ( जूँ शायद बुंदेलखंडी में जी के लिए प्रयुक्त होता है ) को साथ चलने की सहमति प्रदान करते हैं परंतु रानी के समक्ष शर्तें रखते हैं । पहली ये कि उन्हें पैदल ओरछा पहुँचना है और दूसरी ये कि वो जहाँ एक बार स्थापित हो जाऐंगे फिर अपने स्थान से नहीं हिलेंगे ।
        रानी सहर्ष बात मान लेती हैं और ओरछा पहुँचती है । रानी के वासप पहुँचने पर महाराज मधुकरशाह बहुत प्रसन्न होते हैं और कहते है कि श्रीराम जी के लिए ओरछा में भव्य मंदिर का निर्माण करवाया जाएगा । और दोस्तों ये मंदिर था चतुर्भुज मंदिर । चतुर्भुज मंदिर का निर्माण शुरू हो जाता है तब तक श्रीराम जी की मूर्ति को रानी अपने महल में रखती हैं । कहा जाता है जब चतुर्भुज मंदिर में स्थापना के लिए भगवान राम की मूर्ति को उठाया जाने लगा तो कोई उसे हिला नहीं पाया तब सबको राम जी की शर्त याद आती है कि वो जब एक जगह विराजमान जाऐंगे तो वो फिर वो वहीं रहेंगे ।  तब चतुर्भज मंदिर की जगह महल को ही मंदिर का रूप दे दिया गया । महल में होने के कारण भगवान को राजा कहा गया और महल को रामराजा मंदिर ।  कुछ समय पश्चात चतुर्भुज मंदिर में भगवान विष्णु जी की मूर्ति को स्थापित किया गया ।  चार भुजाओं वाले विष्णु को समर्पित होने के कारण इसे चतुर्भुज मंदिर कहा जाता है । 

लेकिन जब हम इस मंदिर के गर्भगृह में पहुँचे तो मुझे यहाँ भगवान चतुर्भुज की जगह राम दरबार दिखाई दिया । वहाँ कुछ लोग फोटो ले रहे थे और जब मैं फोटो लेने के लिए पास गया तो पंडित जी ने पर्दा लगा दिया । अब कितने भी पर्दे लगा लो भई । फोटो तो मैं ले चुका था और उपासना के लिए मन ही मंदिर होता है । मंदिर बिल्कुल ओरछा महल के सामने है और काफी ऊँचे ( यहाँ मुझे शब्द याद नहीं आ रहा😐 शायद अधिष्ठान ) पर बनाया गया है । शायद इसलिए की महल से सीधे दर्शन हो सकें । फिर हम सब ऊपर गए । काफी तंग सीढ़ीयाँ और वो भी काफी ऊँची ऊँची । ये भी सुरक्षा का बढ़िया इंतजाम था । कोई खाली हाथ ही बमुश्किल चढ़ पा रहा था लड़ते हुए तो सोचिए भी मत । कुछ लोग तो चढ़े ही नहीं । चतुर्भुज मंदिर शायद ओरछा में सबसे ऊँची संरचना है । पूरा शहर ऊपर से नजर आता है ।


रामराजा मंदिर के सामने 




चतुर्भुज मंदिर का विहंगम दृश्य


चतुर्भुज मंदिर के अंदर 




बाएँ से कौशिक जी , नरेश जी , मैं ओर सचिन जांगड़ा
एक दम खड़ी सीढियां 




छत पर 


कौशिक जी के चश्मे में चतुर्भुज 


राम दरबार 


चतुर्भुज मंदिर के झरोखे से दिखता महल 






महल के पार दिखती बेतवा नदी 








पालकी महल 
 ऊपर कुछ समय बिताकर सब नीचे आए और होटल पहुँच गए । होटल में खाना लग चुका था । खाना खाने के बाद कुछ समय का विश्राम और सब फिर निकल पड़े अब हम जा रहे थे माँ बेतवा की ओर । जब हम बेतवा के किनारे पहुँचे तो मन प्रसन्न हो गया । बेतवा का पानी भी काफी स्वच्छ था । बेतवा के पार था छतरियों का शानदार नजारा । कैमरे धड़ाधड़ निकल पड़े । कुछ दूर ही था कैटरीना ट्री । अब कैटरीना ट्री क्या है ? तो जी बॉलीवुड संदरी कैटरीना का एक एड आया था स्लाईस का । वो यहीं पर फिल्माया गया था और जिस पेड़ के नीचे वो बैठी उसका नाम हो गया कैटरीना ट्री । तो कुछ आम के दिवाने पहुँच गए पेड़ के नीचे पोज देने । दिन वहीं ढल गया तो सब रवाना हुए राजा राम जी के दर्शन करने । क्योंकि दोपहर मे तो मंदिर बंद था । भई राजा है तो समय के हिसाब से चलना होगा ! और राजा है इसलिए ही पुलीस के जवान सुबह शाम सशस्त्र सलामी देते हैं । जब हम मंदिर गए तो प्रवेश से पहले जूतों के साथ साथ बेल्ट भी उतारनी पड़ी और वो इसलिए क्योंकी राजा के दरबार में कमर कस के जाने का मतलब होता है राजा को चुनौती । सिर्फ सुरक्षा बलों को ही कमर कसने की आज्ञा है । लाईन से तो हम दर्शन नहीं कर पाए तो वैसे ही बाहर से कर लिए थे। और दर्शन से याद आया कि जब दर्शन बुआ दोपहर में पहुँची थी तो लोग खाना छोड़ छोड़ के उनके दर्शन को खड़े हुए थे । मंदिर के बाद हम पहुँचे सीधे ओरछा महल में लाईट एँड साऊँड शो में जहाँ ओरछा के इतिहास को बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया गया ।  वहाँ से न्कलते निकलते रात हो चुकी थी तो सीधे होटल में पहुँचे । खाना तैयार था पर पहले सबका इंट्रोडक्शन हुआ , सबका नहीं आधों का हुआ था कि सब खाने में जुट गए । खाना लेने के बाद बाकी सब का हुआ । फिर सब अपनी अपनी कथा सुना कर दूसरों की सुन कर पहुँच गए अपने अपने कमरों में। आगे का किस्सा अगली पोस्ट में । धन्यवाद
ग्रुप रामराजा मंदिर में 


इन दोनों के वजन से बुलेट की आवाज भी बदल गयी थी 


प्लेट खाली तो फ़ोन ही उठा लो 


भोजन 


बम्बइया विनोद कानून के हाथों में 


दो एडमिन है और एक तगड़ा ज्यादा है तो टोकता कैसे ?


खच खचाखच 








बेतवा के किनारे बाबा जी 


आम के , नहीं कटरीना के दीवाने 




दिन ढल गया अब आगे की कहानी अगली पोस्ट में 
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