Friday, March 24, 2017

खजुराहो , मध्य प्रदेश ( khajuraho , madhya pradesh -1 )



खजुराहो केवल भारत ही नहीं पूरे विश्व में विख्यात है । अपने बेहतरीन कारीगरी शिल्प स्थापत्य की वजह से कम और मंदिरों पर उकेरी गई मिथुन प्रतिमाओं की वजह से ज्यादा । परंतु खजुराहो के मंदिरों पर दर्शाई गई इन मूर्तियों में कहीं भी अश्लीलता नहीं झलकती । ये मंदिर और इन पर उकेरी गई ये कामुक मूर्तियाँ भारतीय स्थापत्य और कला की अमूल्य धरोहर है । बहुत से विदेशी सैलानी भारत आते हैं ताजमहल देखने और उसके बाद नं० होता है खजुराहो का । इसीलिए खजुराहो को विश्व धरोहरों में शामिल किया गया है । यहाँ बने सभी मंदिर अलग अलग समय के बने हुए हैं पर निर्माण शैली एक जैसी ही है । दिसम्बर में मुझे भी यहाँ जाने का मौका मिला । मुझे ओरछा जाना था जहाँ कई राज्यों के घुमक्कड़ों का मिलन होना था । ओरछा मिलन के बारे में आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं । मैं पहले खजुराहो जा रहा था और फिर अगले दिन ओरछा । तो 22 दिसंबर को मैं पहुँच गया हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर । मेरा आरक्षण यूपी संपर्क क्रांति में था । गाड़ी सही समय पर आई और मैने अपवी सीट पकड़ ली । कुछ समय बाद एक भाई सहाब आए और बोले -
-आप अपनी सीट हमारी औरत को दो और ऊपर वाली सीट पर जाओ ।
-कहाँ है तेरी औरत ?
-वो रही !
-बीमार है ?
-ना !
-लंगड़ी है ?
-ना ।
-तो क्यूँ जाऊँ ऊपर ? भली चंगी है जवान है ऊपर चढ़ सकती है । इस साईड लोअर के चक्कर में तो इतने दिन पहले बुक कराता हूँ । अब तुझे देदूँ ?

फिर वो नहीं बोला । गाड़ी ने हॉरन मार दिया और चल पड़ी । रात हो चुकी थी । आस पास वाले खाना खाने लगे थे तो मुझे भी भूख लग आई तो घर से साथ लाए परांठे मरोड़ दिए ठंडे के साथ । कुछ बच गए तो वो सुबह के लिए रख लिए सर्दी का मौसम है कोई खराब तो होंगे नहीं सुबह तक । क्षुधा शांत करके कम्बल तान लेट गया । रात को झांसी से एक अंग्रेज चढ़ा । उसके कूपे में एक लड़की अंग्रेजी जबान जानती थी तो उससे तेज तेज अवाज में बातें कर रहा था । मैं मुँह ढंक कर सो गया । सुबह उठा महोबा पहुँच कर । वो लड़की महोबा उतर गई । अंग्रेज सबसे पूछता फिर रहा कि आप अंग्रेजी बोलते हैं । मेरे से पूछा तो मैं बोला कि नहीं बोलता । वो बोला की नहीं आप बोल लेते हैं । मैने कहा कि मेरी अंग्रेजी ऐसी है कि जैसे आप अंग्रेजी की बेईज्जती कर रहे हों । वो बोला की चलेगी । बस फिर बार बार पूछता रहा खजुराहो कब आएगा ? खजुराहो कब आएगा ? जब कई बार उसने दिमाग की दही बनाई तो उससे कहा कि लास्ट बार बता रहा हूँ ये ट्रेन खजुराहो तक ही जाएगी अब मत पूछना । मैं उतरूँ तो साथ उतर लेना । तब उसने पीछा छोड़ा और मैंने कामना की कि भगवान फिर कभी अंग्रेजी ना बोलनी पड़े । महोबा में 12447 यूपी सम्पर्क क्रांति जो निजामुद्दीन से चलती है यूपी में मानिकपुर तक जाती है । महोबा में इसके आधे डब्बे कटकर खजुराहो की तरफ हो लेते हैं । महोबा से खजुराहो तक ट्रेन का नं० हो जाता है 22447 । जबकी आगे वाले आधे डब्बे  12447 नं० से मानिकपुर चले जाते हैं ।

महोबा 

चल पड़े खजुराहो की ओर 

सुबह हुयी ही है 

जब हमारी गाड़ी महोबा से खजुराहो के लिए चली तो तीन चार लड़के हमारे डब्बे में आकर बैठ गए । एक सारे डब्बे को देखकर आया और किसी के पास फोन मिलाया और कहा कि एक अंग्रेज अकेला है और एक जोड़ा है , मालदार लग रहे हैं । मुझे लगा कहीं ये चोर वगैरह ना हों । मैने वैसे ही पूछ लिया कि क्यों भाई लूटने का ईरादा है क्या ? उनमें से एक ने हँसकर कहा कि नहीं भाई । हमारा एक दोस्त वहाँ ऑटो चलाता है । अंग्रेज लोग पैसा ज्यादा दे देते हैं ना । आठ नो बजे ट्रेन खजुराहो पहुँच गई । महोबा से खजुराहो के बीच ट्रेन कहीं नहीं रूकी । खजुराहो का प्लेटफॉर्म बढ़िया बना हैं । स्टेशन को भी मंदिरों की तरह ही रूप दिया गया है । मैं स्टेशन से बाहर निकला तो देखा कि ऑटो वालों का जमावड़ा सा लगा है । स्टेशन शहर से सात आठ  किमी दूर है । अब ऑटो वालों को भी पता है कि जिकनी सवारी ट्रेन में आनी है वो सब जाऐंगे शहर तो भीड़ भी ऑटो वालो पर टूट पड़ी । दड़ादड़ ऑटो भर भर के चलने लगे । ये जल्दबाजी का काम मेरे बस का नहीं है । मैं जाकर साईड में बैठ गया  और भीड़ कम होने का इंतजार करने लगा ।


स्टेशन मंदिर की तरह ही बनाया है 

 कुछ ही देर में भीड़ खत्म !  एक खाली ऑटो आया तो ड्राईवर बोला -

- खजुराहो चलना है भाईसाब ?
- हाँ चलना है ।
- बैठो ।
- बैठने से पहले बता कि पैसे कितने लेगा ?
- जितने सब देते हैं !
- अपने मुँह से बोल कर बता कितने । क्या पता तू तो जाकर कह देगा दौ सौ दो स्पेशल लाया हूँ ।
- नहीं भाईसाब । दस रूपए ही लूंगा ।

ये बाते मैने की किसलिए ? भोपाल में जब सचिन भाई और कौशिक जी के साथ गया था तो ये पहले पैसे ना पूछना महंगा पड़ा था । तब से आदत बदल ली है ।
कुछ ही देर में खजुराहो में था । बसअड्डे के पास मैने कहा कि भाई बस यहीं उतार दे । बस अड्डे में गया कुछ चाय शाय के चक्कर में । दो बस खड़ी थी प्राईवेट ट्रांसपोर्ट । सरकारी बस तो वहाँ चलती ही नहीं । चाय बनवायी ( बिना रेट पूछे ) । चाय के साथ बचे परांठे खाए ( दो खाए , दो कुत्तों को खिलाए ) । चाय पीकर चाय वाले को दस रूपये पकड़ा चलने लगा तो उसने आवाज दी । मैने सोचा की भाई ये तो गोल्डन चाय बोलकर और रूपये तो नहीं माँगेगा । पर ये क्या ? बंदा मुझे ही पाँच रूपये लौटा रहा है । नहीं लगा था कि टूरिस्ट प्लेस और वर्ल्ड फेमस ! इतना सस्ता होगा । उसी चाय वाले से पूछा -

- ताऊ मंदिर कौणसी तरफ है ?
- हरियाणा से आए हो ?
- हाँ !
- उस तरफ निकल जाओ कुछ आगे चलकर है ।

अब देखिए ना लोग हमारी हिंदी सुनकर भी उसमें से हरियाणवी सूँघ लेते है । चलो ठीक ही है ( आई प्राउड टू बींग ए हरियाणवी ) । मैं मंदिरों की तरफ चल निकला । परांठों वाली पोलीथीन एलुमिनियम फॉईल फेंकना चाहता था पर सफाई ज्यादा थी वहाँ फेंक ना पाया । तो डस्टबीन ढूँढा और उसमें डाला कूड़ा । अब सीधा चल पड़ा मंदिरों की ओर । मंदिरों का पश्चिमी समूह एक जगह ही है । इनका रखरखाव भी बढ़िया है और चारों तरफ बागड़ बनाई गई है । पूरी जगह में घास - फूल लगाए गए हैं । इस समूह को देखने के लिए टिकट लगती है शायद तीस रूपए की थी । मैं टिकट लेकर घुस गया । ज्यादा भीड़ नहीं थी बस दस पंद्रह लोग और आए थे । सबसे पहले पहुँचा लक्ष्मण मंदिर के सामने बने लक्ष्मी मंदिर और वराह मंदिर में । ये दोनो ही आकार में बाकी मंदिरों सें छोटे हैं ।  वराह मंदिर में भगवान विष्णु की वराह रूप में काफी उँची प्रतिमा है । पूरे शरीर पर देवी देवताओं की छोटी छोटी मूर्तियाँ उकेरी गई हैं । थूथन पर लक्ष्मी की मूर्ति बनी है , पैरों के नीचे शेषनाग की प्रतिमा खंडित अवस्था में है । वराह मंदिर में गृभगृह बंद नहीं है ! दीवारों की जगह बारह स्तंभ बनाए गए हैं । वराह की मूर्ति बार बार छुए जाने के कारण बिल्कुल ही चिकनी हो चुकी है । ये मूर्ति भी खजुराहो में मेरे मुख्य आकर्षणों में से एक थी । यहाँ से मैं बढ़ा लक्षमण मंदिर की तरफ ।







लक्षमण मंदिर का निर्माण 930 से 950 ई० के मध्य में चंदेल राजा यशोवर्मन द्वारा कराया गया । राजा यशोवर्मन का एक और नाम लक्षवर्मा था । ये मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है पर राजा यशोवर्मन के नाम लक्षवर्मा के कारण इस मंदिर का नाम लक्ष्मण मंदिर पड़ा । ऊँचे चबूतरे पे बना ये मंदिर काफी विशाल है  और जैसा इसके बाहर लगे शिलालेख से पता चलता है ये शिल्प की दृष्टि से भी ये सर्वोत्कृष्ठ है । उंचे चबूतरे पर बने इस मंदिर के चारों ओर चबूतरे के कोनों पर चार छोटे मंदिर भी बनाए गए हैं । इस मंदिर में अर्धमंडप फिर मंडप  उसके बाद महामंडप और फिर गृभगृह है । गृभगृह में भगवान विष्णु की तीनमुखी और चतुर्भुजी प्रतिमा है ( हाँलांकी चारो हाथों को मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा खंडित किया गया है ) ।  मंदिर के अंदर एक समतल फर्श नहीं है । अर्धमंडप , मंडप तक ऊँचा फिर महामंडप में डेढ़ दो फुट गहरा । फिर गृभगृह में प्रवेश के लिए तीन चार फुट उँची  सीढ़ियाँ पर दरवाजा और फिर गृभगृह भी मंहामंडप की ही तरह गहरा । अंदर भी सारा मंदिर मूर्तियों से सुसज्जित है कोई भी दीवार खाली नहीं है । और बाहर तो कुछ इंच भी खाली नहीं छोड़ा गया है । अंदर कुछ तस्वीरें लेकर मैं बाहर आ गया । बाहर आया तो नजरें उन जानी पहचानी मूर्तियों को ढूँढने लगी जिनकी खजुराहो के नाम से  तस्वीरें भरी पड़ी है अन्तर्जाल पर । जब तक वे मिथुन मूर्तियाँ मुझे नहीं दिखी तब तक किसी और मूर्ति पर मेरा ध्यान नहीं गया । जब तक इन्हे साक्षात नहीं देखते तब तक सुनने में तस्वीरें देखने में अजीब लगता है कि ऐसी ऐसी मूर्तियाँ ? पर जब आप स्वयं इन्हे देखते हैं तो यकीन मानिये रत्ती भर भी अश्लीलता इनमें नजर नहीं आती । जब भी खजुराहो का जिक्र होता है सिर्फ इन्ही की बात होती है जबकी मंदिरों पर इनकी अपेक्षा दूसरी जैसे गंधर्व अप्सरा , सैनिक , भगवानों की मूर्तियाँ बहुत अधिक है । हर एक मूर्ति इतनी सुंदर है लगता है मानों अभी सजीव हो उठेंगी । मैं इन्हें ही देख रहा था की दूसरी तरफ कोई गाईड बता रहा था देखिए उस मूर्ती को ! वो औरत नहा रही है वस्त्र शरीर पर चिपक गया है और वो दूसरी औरत उसे दूरबीन से देख रही है । मैं कुछ देर बाद उधर गया तो उसी मूर्ति को ढूंढने लगा । कोने पे मुझे वो दिखाई दी स्नान करती महिला और दूसरी महिला उसे दूरबीन से देख रही थी ।  हर एक मूर्ती मानों एक कहानी कह रही हो । चबूतरे के चारों और भी छोटी छोटी मूर्तियाँ दिवार पर बनी है । जैसे हाथी घोड़ों पर सवार सैनिक जा रहे हैं । एक अन्य में एक मोटा सा धनवान व्यक्ति जा रहा है सेवक उसे उठाए हैं । उसके साथ महिलाएँ भी चल रही है महिलाओं के आगे ढोल वाले चल रहे हैं । और इसी पट्टी पर एक और बनी थी कुछ मिथुन प्रतिमाएँ जो कि बिल्कुल अलग थी । पशु - मैथुन भी यहाँ दर्शाया गया है जो बाकी प्रतिमाओं में नजर नहीं आता है या शायद दूसरे किसी मंदिर पर भी नहीं था । लक्ष्मण मंदिर में कुछ समय बिताने के बाद मैं चल पड़ा कंदारिया महादेव मंदिर की तरफ । पर आगे की कहानी आगे की पोस्ट में ।

लक्ष्मण मंदिर 

लक्ष्मण मंदिर 

मैं 

गणेश जी 

ये लक्ष्मी जी 

ये मुझे पक्का नहीं पता पर शायद ब्रह्मा जी हैं 

वराह अवतार 

ये शायद विष्णु जी 

ये रही वो गीले वस्त्रों वाली महिला और उसे दूरबीन से देखती महिला 





कुछ तुम कहो कुछ हम कहें 


ये अंदर से खोखली है शायद ये पानी की निकासी के लिए होगी 

लक्ष्मण मंदिर के सामने लक्ष्मी मंदिर 


Wednesday, January 25, 2017

ओरछा महामिलन भाग -3 पंचमढ़िया ( Orchha part-3 , panchmadhiya )






पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा कि 24 दिसंबर को हम राजाराम मंदिर और चतुर्भुज मंदिर देखने के बाद शाम को बेतवा किनारे गए और रात को लाईट एंड साउँड शो देखा ।  अब आगे -


इस वृत्तांत को यहाँ क्लिक करके शुरू से पढ़े ।


अगले दिन सुबह जल्दी उठकर हम तीनों ( मैं , सचिन और सहगल साब ) नहा लिए थे ये सोचकर की सुबह जल्दी  निकलेंगे और एक कारण ये भी था कि पास वाले कमरे में गीज़र नहीं चल रहा तो उस कमरे वाले भी यहीं नहाऐंगे । नहा धोकर सब बैठे थे कि विनोद कमरे में आया लड्डू और चकली लेकर । सबसे पहले भोग मैने ही लगाया लड्डूओं का फिर बाकी लोगों को दिया पर फिर भी वो उसी तरह पूरे ग्रुप को नहीं मिल पाया जिस तरह बाकियों द्वारा लाई गई चीजें हम तक नहीं पहुँच पाई थी । वैसे पता नहीं कैसे पर लड्डुओं की खुशबू दो एडमिनों को खींच लाई थी हमारे कमरे में ।  बाकी सुबह जैसा मैं चाहता था कि बस निकल लें कैमरा उठाकर , वैसा ना हुआ सबने बहुत लेट किया । नाश्ते तक मैं बोर होने लगा था । और फिर एक बार तो नाश्ते में पोहा देख फिर माथा ठनका । पर ठनके माथे को रसभरी गुजिया ने ठीक कर दिया और फिर जैसा मैं आम तौर पर करता नहीं हूँ गुजिया और पेठा खाकर मैने पोहा फेंक दिया । काफी भूख लगी होने के बावजूद नहीं खाया गया वो मुझसे । मुझे बुरा भी लगा उसे बर्बाद करना । नाश्ते के बाद भी सबने बहुत समय लगा दिया ।
                                                                  रोमेश शर्माजी उधमपुर वाले सुबह ही निकल गए थे बेतवा की तरफ सुशांत जी के साथ । वो दोनों ही ठीक रहे सुबह का पूरा आनंद उठाया । हालांकी दोनो अलग अलग कारणों से निकले थे । रमेश जी शांति के लिए और सुशांत जी निकले थे कैमरा लेकर फोटोग्राफी के लिए । सुबह नाश्ते के बाद सबको बेतवा की ओर ही जाना था तो रोमेश जी वहीं रह गए । पर सुशांत जी होटल आ गए अब आ तो गए पर कमरे की चाबी रोमेश जी के पास थी । भई ये तो दिक्कत हो गई  क्योंकि इनको कपड़े चेंज करने थे । और उससे बड़ी दिक्कत ये की कैमरे के लैंस कमरे में बंद । अब लैंसो के बगैर सुशांत जी इस तरह मानो पानी बिना मछली । इसका हल पांडेय जी ने कमरे की दूसरी चाबी लेकर  निकाला । समय बहुत हो चुका था पर कुछ लोग निकल ही नहीं रहे थे कमरों से । मुंबई वाले आज ही जा रहे थे सुबह ही । पर विनोद का मन नहीं था जाने का । मन तो बुआ का भी नहीं था पर ट्रेन में सीट मिलने ना मिलने के संशय में उन्होने भी चलने की सोच ली  पर विनोद ने साफ मना कर दिया था जाने को अभी और वो गया भी नहीं । अब ये लोग कल दोपहर तो आए ही थे और आज सुबह को चल पड़े । सचिन त्यागी भाई भी निकल पड़े थे ।  फिर हम कुछ लोग बाकियों से पहले ही पांडेय जी से जगह पूछकर निकल पड़े पर हमें क्या पता था कि जो लोग अभी जल्दी नहीं दिखा रहे वो गाड़ियों में हमसे भी पहले पहुँच जाऐंगे ? खैर मुझे तो वैसे भी पैदल चलना पसंद है और ऊपर से सुशांत जी साथ में चल रहे थे । रस्ते भर कैमरों की खचाखच होती रही । सुशांत जी भी रस्ते भर फोटो लेते रहे लैंस बदलते रहे । उन्होने तीन चार फोटो मेरे भी लिए।



नाश्ता 

खचाखच 

 जब सब ओरछा सेंचुरी पहुँच गए तो युवराज ( संजय कौशिक जी के सुपुत्र ) सेंटा क्लॉज के रूप में सबको ग्रुप के नाम वाला बैज और पेन देते हुए आए । क्रिसमस का दिन था तो सेंटा तो आना ही था बस रात की जगह दिन में आ गया था ।  बैज और पैन और साथ में ग्रुप के लोगो वाली टोपी सबको चार चांद लगा रही थी । फिर वहाँ हमारा एक ग्रुप फोटो हुआ । इस फोटो में तकरीबन सभी ग्रुप मेंबर्स थे । पर्यावरण के नाम ग्रुप की ओर से पौधारोपण भी किया गया । विनोद ने कोठारी जी जो जयपुर से हैं और नहीं आ पाए थे उनके नाम का भी पेड़ लगाया । विनोद को सभी हल्के में ले जाते हैं पर ये बंदा दिल से बहुत ही अच्छा है । मैं  इस पौधारोपण के समय पता नहीं कहाँ चला गया था । सब फोटो खिंचवा गए मैं रह गया । पौधारोपण के बाद सब फिर जुट गए छतरियों को अपने कैमरों में समेटने । बेतवा के किनारे बैठ छतरियाँ निहारते हुए आप बिना बोर हुए कितना भी समय निकाल सकते हैं 


क्रिसमस का दिन और संता न आये 

घुमक्कड़ी दिल से 

 वहाँ कुछ समय निकाल कर हमें पंचमढ़िया जाना था पर किसी को चलता ना देख पाँडेय जी से रस्ता पूछकर मैं और आर डी भाई उर्फ डोलरिया बाबा चल पड़े पैदल ही । पंचमढ़िया यहाँ से ढ़ाई किमी है । करीब आधा किलो मीटर के बाद हमारी गाड़ी आई और आरडी भाई उससे चले गए । गाड़ी आई भी बिल्कुल सही समय पर क्योंकि वहाँ से मुड़ना था अगर गाड़ी ना आती तो हो सकता था कि हम आगे निकल जाते । अब मैं अकेला चल रहा था जंगल से । बड़ा मजा आ रहा था क्योंकि मुझे अकेले में ही अच्छा लगता है ज्यादा । रस्ते भर फोटो खींचता गया । अभी ओरछा सेंचुरी में बंदरों को छोड़कर कोई जानवर नहीं दिखे । शायद आने वाले समय में यहाँ जानवरो को लाया जाएगा। अपने फोटो लेने के लिए टाईम भर कर कहीं पेड़ पर अटका देता कैमरा कभी पत्थर पर रख लेता । कुछ लोग गाड़ियों से आए पर फिर भी मैं लगभग उन्ही के साथ पंचमढ़िया पहुँचा ।


चल अकेला 

वो दूर जा रही गाड़ी 

बस थोड़ा और 


यू कैमरा रखो 

और यू फोटो खींच लो 

हर पेड़ में दीमक राजनीती की तरह 

शायद कुछ बनेगा यहाँ 



मेरा बस एक फोटो और 

पहुँच गया 

 बच्चे पानी में कूद चुके थे । बेतवा की सवच्छ धारा देखकर किसका मन ना मचलेगा ? बस मेरे जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर । सुशांत जी , प्रकाश जी और पंकज शर्मा जी नटवर जी भी कैमरों को उठाकर चल पड़े थे बाकी हम जैसे शौकिया क्लिकर्स भी जुट चुके थे । कुछ लोग थोड़ी दूर नहाने चले गए उस जगह का नाम शायद शिकारगाह था। मैं भी उठा , धारा पार की और कुछ दूर पेड़ों के झुंड तले बिल्कुल पानी के साथ एक पेड़ के तले कुछ पत्ते वगैरह बिछाए और लेट गया । बड़ी बढ़िया जगह थी पानी की आवाज आ रही थी बढ़िया ठंडक थी और सबसे मेन बात मुझे नींद भी आ रही थी । कौशिक जी को फोन कर दिया था कि खाने के समय मुझे उठा लिजिएगा । वहाँ पर बड़ी बड़ी चीटियां थी बिल्कुल पीले रंग की साईज में भी काफी बड़ी । कुछ तो मेरे उपर भी चढ़ गई थी । एक बार सोचा की कहीं ये काट काट कर सूजा ना दे । फिर एक को हाथ पर चढ़ाया उसने ना काटा फिर सोचा की जब तक मौका नहीं दूंगा तब तक पता कैसे चलेगा कि काटती है या नहीं । फिर बस आँख लग गई । मेरी आँख ना तो चीटियों के काटने से खुली ना ही कौशिक जी के फोन से , आँख खुली जब एक गऊ माता मुझे ये देखने आई की ये जिंदा है या मर चुका है । शुक्र था कि बस मुँह मार के चेक किया , कहीं पैर रख के चैक करती तो गड़बड़ हो जाती । और यकीन मानिए एक बार तो मुझे लगा पता नहीं क्या जानवर आ गया । एक बार तो झटका सा लगा था । बस फिर कहाँ नींद आनी थी । मैं भी चल पड़ा आवाजों का पीछा करते हुए जहाँ पर घुमक्कड़ नहा रहे थे ।


ये भी बेतवा की ही धार है 

हमसे पहले आकर कब्ज़ा 

चल अब तू भी साइड में 

जे बड़ी बड़ी पिली चीटियाँ 

अब काटेंगी तो देखी जाएगी 

मेरी नींद हरने वाली 

 वहाँ कुछ देर बाद कौशिक जी के फोन पर फोन आया किसन जी का वो झांसी रेलवे स्टेशन पहुँच चुके थे । पाँडेय जी ने कहा कि किसन जी को पहचानते हो ? मैने कहा हाँ तो वे बोले कि तुम जाओ ड्राईवर के साथ और उनको ले आओ । गाड़ी के पास गया तो आर डी बोला की मैं जाता हूँ वे आ जाऐंगे मैं वहीं रह जाऊँगा । उसे ट्रेन पकड़नी थी खजुराहो की । मैने कहाँ ठीक है आप जाओ । तभी वहाँ गाड़ी आई पुलिस की । उसमें से उतरे कौन ? SP साहब ! अब कोई भी हो हम कोई क्रिमीनल थोड़े है जो पुलीस से घबराऐंगे । चाहे एस पी आओ या डीजीपी दरअसल वो भी अपने किसी परिचित को पंचमढ़िया घुमाने लाए थे जैसे पांडेय जी हमें लाए थे । तब मैं भी जाने लगा स्नान करने वालों के पास शिकारगाह की तरफ पर वो खुद सामने से चले आ रहे थे । उसके बाद भोजन की बारी आई । सब नीचे बैठ गए गोल घेरे में । पत्तल में भोजन परोसा गया । दो तीन प्रकार के लड्डू भी आए प्रकाश जी के सौजन्य से। हाथ से बधाई गई मोटी रोटी ( टिक्कड़ ) बाटी ( लोई की लोई सेंकी हुई ) दाल , बैंगन का भर्ता और सलाद । आह ! पेट के साथ आत्मा भी तृप्त हो गई । बाटी वाले भाई साब सबसे पूछते की रख दूं ? पर जैसे ही हमारे मिश्रा जी के पास पहुँचते बिना पूछे ही रख देते और कहते कि आप तो लेंगे ही ! भोजनोपरांत बच्चों द्वारा कविता , चुटकुले सुनाए गए । बड़ा बढ़िया लगा । पुरस्कार स्वरूप उन्हे घड़ी मिलती देख हमारे विनोद बाबू का मन भी मचल गया । पर उन्हे घड़ी ना मिली । फिर अपना अपना बुद्धि प्रदर्शन करने की बारी आई बड़ों की , प्रकाश यादव जी की अर्धांगिनी जी ( मुझे नाम नहीं पता ) ने सबको प्रश्नपत्र बांट दिए । सबसे पहले सवाल का जवाब उन्ही नें दिया उदाहरण के तौर पर । बस पच्चीस में से एक यही सवाल का जवाब हमारे विनोद बाबू ने दिया । और वो इतने भारी अंकों से नाचे से प्रथम आए । हरियाणे वालों का प्रदर्शन बढ़िया रहा । टॉप किया पाँडेय जी ने । कुछ लोगों ने दिलचस्प  जवाब दिए जैसे कि मिश्रा जी ने गांधारी का बनाया धांधारी । और इससे भी मजे की बात की ये उत्तर भी उन्होने किसी और का कॉपी किया । इसी बीच किसन जी भी पहुँच गए थे तूफान की तरह और जाते ही सबसे मिले बड़े ही जोश में । थके हारों को फिर से रिचार्ज कर दिया उन्होने । शाम को जब सब लोग वापस जा रहे थे शहर की तरफ तो एक एक दो दो कर के जा रहे थे मुझे पता नहीं चल पाया कि अब जाना कहाँ है । मैने सचिन से फोन पे पूछा की कहाँ है तो वो बोला कि होटल में हूँ । मैं होटल पहुँच गया । वहाँ देखा तो सिर्फ वही था वहाँ । फिर बाकी लोगों का फोन ट्राई किया तो पता चला की बाकी लोग तो ओरछा रिजॉर्ट में है चाय पकौड़ों पर हाथ साफ किया जा रहा है । हे भगवान इतनी दूर ? मैने एक बार तो मना किया पर सचिन के फिर पूछने पर मैने हामी भर दी और दोनों चल पड़े । पर किस्मत देखिए हम वहाँ गेट पर पहुँचे की बाकी निकलने शुरू हो गए । बड़ा अफसोस हुआ ! पकौड़ों का नहीं बल्कि इस बात का कि जांगड़ा सारे रस्ते पैदल खिंचाई को कोसता गया और उसका फल भी नहीं मिला । रात हो चुकी थी । कुछ लोग निकल चुके थे कुछ रूकने वाले थे । हमारी गाड़ी भी रात को ही थी । तो हम भी रात को निकलने वाले थे । अब गाड़ी वहाँ एक थी और लोग ज्यादा ! एक गाड़ी किसन जी को छोड़ने गई थी । किसन जी सबसे कम रूके वहाँ शायद कुछ ही घंटे ।पर कुछ घंटों में ही वो काफी समय बिता गए । तो एक ऑटो किया गया और एक गाड़ी हो गई । झाँसी स्टेशन पर पहुँच कर  भोजन लिया गया । सुबह तक हम हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पर थे और जो लोग हमसे पहले निकले थे । झाँसी से वो अभी तक नहीं पहुँचे थे ।वहाँ पहुँच कर अपना किराया चुकाया गया ।  मैने कौशिक जी से टिकट के पैसे पूछे तो वे बोले की पाँच सौ । यार इतनी महंगी तो जाने की नहीं थी । कुछ देर बाद जब वे गाड़ी हटने लगी तो मैने पूछा कौशिक जी से कि ये कौन सी गाड़ी थी ? ताकी भविष्य मे ध्यान रखा जा सके इसका । तो उन्होने बताया तो मैं बोला की बबुत महंगी थी । तो वे बोले की तेरी तो बस आने की टिकट थी ना ? मैं बोला हाँ । फिर मुझे कुछ धन वापस मिला । अब ये गाड़ी ब्लैकलिस्ट से बाहर  निकाली मैने । बस फिर निकल पड़े अपने अपने गाँवो शहरों की तरफ । ये मिलन एक शानदार आयोजन रहा । विनोद भाई की भूमिका रही सूत्रधार की । आयोजन को सफल बनाया पाँडेय जी ने । प्रतीक भाई ने भी काफी मन से सहायता की लोगों की  । बाकी सबका योगदान रहा जो आए उनका भी और जो ना आ पाए उनका भी । सब लोगों से मिलना क्या पता कब तक हो पाता ? पर ये एक ऐसा मौका रहा जो बार बार शायद नहीं आएगा । मैं ग्रुप के कारण ओरछा को तो नहीं देख पाया पूरा परंतु कोई शिकवा नहीं है । आज जब मैं ये बाते लिख रहा हूँ करीब बीस दिन बीत चुके हैं पर फेसबुक टाईमलाईन , व्हाट्सएप पर अभी भी ओरछा ही ओरछा नजर आ रहा है । ये महामिलन संभवत: ओरछा के लिए भी फायदेमंद रहेगा । इस मिलन से पहले और बाद में लोगों के लिए ओरछा के मायने बदले हैं । पहले शायद कुछ लोग ओरछा को जानते भी ना हों पर अब ओरछा घुमक्कड़ों की हिट लिस्ट में शामिल हो गया है । ओरछा में सबके लिए कुछ ना कुछ है चाहे वे बच्चे हो बूढ़े हो । भक्त हो या वास्तुप्रेमी । बस इतना ही कहूँगा अंत मैं कि ओरछा - दिल अभी भरा नहीं ।


इस पूरी यात्रा जिसमें खजुराहो यात्रा भी शामिल है ओरछा के साथ , जिसमें मैं पाँचवे दिन घर आया और इसका कुल खर्चा आया करीब पच्चीस सौ रूपये घर से घर तक ।  अब मिलते हैं जल्द ही खजुराहो यात्रा वाली पोस्ट के साथ । धन्यवाद ।

कुछ और चित्र 


विनोद का गहन वार्तालाप 





इनके साथ बियर की बोतले भी रखी  थी 

उम्र का असर 
अहा जिन्दगी 



बच्चों को हँसाने आया है या डराने 

कैमरे के उस्ताज लोग 

जे हमारे सहगल साब 

बीएसएनएल की रेंज ढूंढते हुए 

मिलेंगे फिर से घुमक्कड़ी दिल से 


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