Thursday, December 29, 2016

ओरछा महामिलन ( Orchha Meet 2016 ) भाग -1


२४ और २५ दिसम्बर २०१६ दो अविस्मरणीय दिन थे । करीब एक महिने पहले घुमक्कड़ी दिल से ग्रुप में मुंबई वाले विनोद गुप्ता ने सुझाव दिया की ग्रुप की मीटिंग होनी चाहिए । पूछा कहाँ ? तो उसने कहा कि ओरछा ! विनोद मजाक के मूड में ज्यादा रहता है पर ये बात सब सीरीयसली ले गए । और ना ही किसी ने आपत्ती जताई ओरछा के नाम पे !सब राजी । तो तारीख तय कर ली गई । 24 - 25 दिसम्बर 2016 !
मेरा जाने का कतई मन नहीं था ( वैसे मैं पैसों की कमी के कारण भी हिचक रहा था ) । और मुझे विनोद के आने का भी यकीन नहीं था । मैने भी लिस्ट में अपना नाम कुछ यू जोड़ दिया -
  हरेन्द्र धर्रा ( अगर विनोद ने टिकट दिखा दी तो )
  पर विनोद ने सच में टिकट करा ली । मैं भी एक बार तो घिर गया । फिर भी मना कर दिया मैने । मुझे ज्यादा इकट्ठे लोग पसंद नहीं होते ( अब धारणा कुछ बदल चुकी है ) । एक दिन कौशिक जी को बोला कि दादा मेरा तो मन विचलित हो रहा है ! एक कोना हाँ बोल रहा एक ना बोल रहा है । दादा बोले की करा दूँ टिकट ? मैं बोला करा दियो ।
  बस उसी समय मेरा जाना पक्का हो गया । अब ग्रुप में ध्यान दिया तो देखा बहुत लोग मेरी तरह फंसे हैं हाँ - ना में । सब लोग 23 को निकलने वाले थे पर मैं 22 को निकल कर पहले खजुराहो जाना चाहता था और गया भी पर उसके बारे में बाद में लिखा जाएगा । करीब 35 लोग आने वाले थे ग्रुप से , वो भी 14 राज्यों से । इतने लोगों के ठहरने का इंतजाम करने वाले थे हमारे दरोगा बाबू मुकेश पाँडेय जी ' चंदन' । चंदन जी मूल रूप से बक्सर बिहार से ताल्लुक रखने वाले हैं । अभी वो ओरछा में आबकारी उपनिरिक्षक के पद पर आसीन हैं । और ये हमारे व्हाट्सएप ग्रुप के अघोषित समूह नियंत्रक भी हैं । तो इतने लोगों का इंतजाम के लिए सबने कुछ निर्धारित राशी जमा करा दी । वैसे पार्टी ग्रुप एडमिनों की तरफ से होनी चाहिए थी पर हम सब खुद्दार लोग हैं । कई दिन पहले ही ओरछा का खुमार चढ़ चुका था । मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि रितेश भाई भालसे जी आदि जिनके मैं ब्लॉग कभी से पढ़ता आया हूँ सुशांत जी सबसे मैं साक्षात मिलूँगा। ज्यूँ ज्यूँ जाने की तारिख नजदीक आ रही थी कुछ का प्रोग्राम कैंसिल भी हुआ और कुछ का बना भी ।
     22 तारीख भी आ गई और मैं निकल पड़ा घर से । दिल्ली हजरत निजामुद्दीन से सीधे खजुराहो उ० प्र० सम्पर्क क्रांति से । 23 का पूरा दिन खजुराहो को समर्पित करने के बाद मैं वापस पहुँचा स्टेशन और चल पड़ा मुख्य पड़ाव ओरछा की तरफ । जब मैं महुरानीपुर पहुँचा था तो पाँडेय जी का फोन आया -
     - हरेन्द्र भाई कहाँ पहुँचे ?
     - महु रानीपुर के पास !
     - कब तक पहुँचोगे ?
     - शायद साढ़े ग्यारह बजे के आसपास !
     - मैं आपको लेने आ जाऊँगा ! फोन कर देना ।
पर मैं मुझ अकेले के लिए किसी की रात खराब नहीं करना चाहता था । जब ऑटो चल रहे हैं तो किसी का तेल क्यों फुंकवाया जाए ? वैसे भी सचिन जांगड़ा भी दो ढ़ाई बजे झांसी पहुँचने वाला था । तो साथ ही चले जाऐंगे । महुरानी पुर के पास ट्रेन एक घंटा  लेट थी तो मैने 12 बजे का अलार्म लगाया और सो गया । पर मेरी नींद अलार्म से नहीं बल्कि टीटी की आवाज से खुली मेरी सीट के पास ही चिल्ला रहा था किसी पर । मैने कहा क्या बात है क्यों चिल्ला रहे हो । तो बोला कि यार अभी तक टिकट नहीं कटाई है इसने झांसी आ चुका । झांसी का नाम सुनते ही मेरी कुंभकर्णी नींद गायब । एक दम उठा , कंबल काँख में दबाया और एक ट्रेन से नीचे । शायद वो नहीं झगड़ता को मैं आगे निकल गया होता ।
  नीचे उतर कर मैने समय देखा तो ट्रेन सही समय पर पहुँच गई थी । एक घंटा लेट कवर कर दिया भगा कर ! लगा लो अलार्म ! निकाल लो नींद ? जांगड़ा का इंतजार था अब तो बस मुझे । वेटिंग रूम मैं भयंकर भीड़ तो मैं बाहर बेंच पर ही सो गया कंबल तानकर । जांगड़ा दो - ढाई की बजाय चार बजे पहुँचा । मिलते ही लगा कि - ' कब के बिछड़े हुए हम आज यहाँ आकर मिले' । स्टेशन से बाहर निकल कर चाय पी , जांगड़ा ने ऑमलेट ली । ओरछा के लिए ऑटो बस स्टैंड से मिलते हैं तो पहले बस स्टैंड का ऑटो पकड़ा । बस स्टैंड पहुँचे ही थे कि डॉ० सुमित का फोन आया कि मैं भी झांसी पहुँच गया हूँ । तो डॉ० के आने के बाद हमें टीकमगढ़ वाली बस मिल गई ये ओरछा से ही होकर जानी थी । सुबह का उजाला होने से पहले ही हम ओरछा में थे । स्टैंड पर खड़े होकर पाँडेय जी 
को फोन किया तो बोले की आ रहे हैं । कुछ देर बाद गाड़ी  हाजिर थी ।
   पांडेय जी के साथ सूरज मिश्रा भी आए थे और सबसे स्पेशल पाँडेय जी के दुलारे अनिमेष बाबू । डॉ० साब बोले की इसे क्यूँ उठा लाये ? तो पाँडेय जी ने कहा हम इसे नहीं ये हमें उठाता है । अनिमेष को जांगड़ा के पूरे शरीर पर नजर डालने में ही करीब आधा घंटा लग गया । फिर कहीं हमारी बारी आई । होटल पहुँचने तक होटल खुला नहीं था तो पाँडेय जी ने फोन करके खुलवाया । होटल में पहुँचने वाले शायद हम पहले घुमक्कड़ थे । तो सुबह सुबह फ्रेश होकर हम तीनों नहा लिए । थोड़ी देर बाद बाकी लोग पहुँचने लगे जो शाम तक आते रहे । अब मुझे भूख लग आई और डॉ० साब को भी और जांगड़ा को ईतनी जितनी हम दोनो की मिला दे उससे ज्यादा । तो हम तीनों निकड़ पड़े एक दुकान पर गर्मागर्म जलेबीयाँ , समोसे और ब्रेड पकोड़े तले जा रहे थे । सबसे पहले ब्रेड पकोड़े का आनंद लिया गया । एक टुकड़ा मुँह में जाते ही मन हवा में उड़ने लगा । गजब का स्वाद । फिर समोसे और फिर जैसा सुमित कहता है जल-बेलियाँ । और इन तीन ब्रेड पकोडे तीन समोसे  रायता और पाव जलेबियों का बिल बना मात्र 75 रूपये । पेट प्रसन्न तो आप प्रसन्न । फिर चाय ली गई और हम नाश्ते से निफराम हो गए ( वैसे बाकी लोगों के साथ फिर से लिया गया ) । नाश्ते का इंतजाम होने तक अधिकतर लोग आ चुके थे । सुशांत जी ( ताऊ जी ) आते वक्त ही रस्ते में ही ऊतर लिए थे फोटो लेने के लिए । वो कुछ देर बाद आए थे । अगर उन्हे खाने और फोटोग्राफी में से एक चुनने को बोला जाए तो मैं पक्का कह सकता हूँ वो फोटोग्राफी के साथ ही जाऐंगे ।  
अपने होटल के सामने 

      नाश्ते के बाद सबको ग्रुप के लोगो वाली कैप दी गई । अब ओरछा देखा जाएगा । तो अब आपको ओरछा के बारे में भी कुछ जानकारी दे दें ।
ओरछा को सोहलवी शताब्दी की शुरूआत में बुंदेल राजा  रूद्र प्रताप ने अपनी राजधानी के रूप में बसाया । जैसा कि पांडेय जी ने बताया कि राजा अपने मंत्री के साथ शिकार करने गए थे तो इस जगह किसी शिकार की तरफ इशारा करते हुए शिकारी कुत्तों से कहा  ' ओरछा ' , मतलब कूदो । मंत्री ने इस जगह राजधानी बसाने का सुझाव दिया तो राजा ने नाम सुझाने को भी कहा । मंत्री ने कहा महाराज यहाँ आपके मुँह से  निकला था ओरछा तो क्यूँ ना नगर का नाम ओरछा ही रख दिया जाए ।  वैसे कई जगह मैने ओरछा का अर्थ गुप्त स्थान भी पढ़ा ।  ओरछा स्वयं में सब कुछ समेटे है जो एक घुमक्कड़ को चाहिए - जंगल , नदी , मंदिर , किले , पहाड़ी सब कुछ । धार्मिक , धरोहरों वास्तुशिल्प के पुजारी , फोटोग्राफर्स  कोई ओरछा से रामराजा की कृपा से खाली हाथ नहीं जाता ।
    ओरछा झांसी से करीब 18 किमी दूर मध्यप्रदेश में पड़ता है ।  यहाँ रेलमार्ग से पहुँचने के लिए आप देशभर में कहीं से भी झांसी पहुँच सकते है और फिर या तो पैसेंजर ट्रेन से या टैक्सी से या शेयरिंग ऑटोरिक्शा से पहुँच सकते हैं । अगर आप सड़क मार्ग से आना चाहें तो ओरछा झांसी खजुराहो रूट पर पड़ता है ।  या फिर आप अगर हवाई मार्ग से आएँ तो नजदीकी अवाई अड्डा है खजुराहो ।
      तो 24 तारीख को सब नहा धोकर ( मैं तो नहाया था बाकी की वो जानें ) अपने अपने कैमरे उठाकर निकल पड़े । यहाँ हमारे निर्देशक थे पाँडेय जी । सबसे पहले सामने आया एक प्याले के जैसा पत्थर का बहुत बड़ा बर्तन । पाँडेय जी ने इसका नाम बताया चंदन कटोरा । जब सेना लड़ाई लड़ने जाती थी तो इसी में चंदन घिस कर सबको टीका लगाया जाता था । इसकी खास बात ये थी कि इसको पत्थर मारने पर ये धातु सरीखी आवाज करता है । ये सुन कर मेरा मन भी हुआ कंकड़ उठाने को फिर ध्यान गया कि मुझ जैसों के कारण ही इसके चारों ओर जाल लगा दिया गया है । अब कुछ लोगो नें चंदन कटोरे को पाँडेय जी के नाम से जोड़ने की कोशिश की तो उन्होने बताया की उनके जन्म के समय आई फिल्म नदिया के पार वाले नायक चंदन से प्रभावित होकर उनका नाम रखा गया था चंदन  । जबकी मुकेश उन्होने स्कूल मे खुद लिखवाया था । 
चन्दन कटोरा 

       तो इस कटोरे को छोड़ हम बढ़े हरदौल जी के मंदिर की तरफ । यहाँ  के लोगों में हरदौल जी के लिए बहुत आस्था है । 


हरदौल ओरछा के राजा वीर सिंह के सबसे छौटे पुत्र थे और उनके बड़े भाई थे राजा जुझार सिंह ।  हरदौल नें बुंदेला सेना से अतिरिक्त भी राज्य की सुरक्षा हेतु अपनी एक सेना तैयार कर ली थी । इसी बढ़ते प्रभाव डरते मुगलों ने षडयंत्र के तहत  हरदौल के भाई जुझार सिंह के कान भर दिए कि हरदौल के जुझार सिंह  की रानी के साथ गैरजरूरी संबंध हैं । बस इसी षड़यंत्र में फंस कर जुझार सिंह नें रानी की परिक्षा लेने के लिए हरदौल को विष  पिलाने का आदेश रानी को दिया । अब स्वयं को पवित्र साबित करने के लिए रानी तैयार हो जाती है । इस बात को एक सेवक हरदौल के पास भी ले पहुँचता है । परंतु हरदौल अपनी जान की बजाय अपनी माँ समान भाभी की पवित्रता को अधिक महत्व देता है । हरदौल जानते हुए भी विषपान करता है । हरदौल के विष पीकर गिरते ही रानी विलाप करने लगती है कि मैं हत्यारी हूँ ये मैने क्या किया ? तो हरदौल कहता है कि मैं ये बात जानता था और मैने तुम्हारे सम्मान की रक्षा के लिए ही विष पिया है और अपने हाथों पिया है । आप स्वयं को दोष ना दें और इस प्रकार मात्र 23 साल की उम्र में हरदौल की मृत्यु हो जाती है ।  हरदौल की बहन कुंजावती जब अपनी पुत्री के विवाह में जुझार सिंह को भात का न्योता देने आई तो जुझार उसे यह कहकर दुत्कार देते हैं कि वह तो हरदौल से अधिक स्नेह रखती थी ।इसलिए वह शमशान में उसी से भता माँगे । कुंजावती रोती हुई हरदौल की समाधी पर पहुँचती है और भात माँगती है । कहते हैं हरदौल भात में सशरीर पहुँचते है मृत्यु पश्चात भी ।  

तब से बुंदेलखंड में हरदौल को देव के रूप में पूजा जाने लगा । तब से हर विवाह का पहला निमंत्रण हरदौल को ही दिया जाता है । मंदिर में पाँडेय जी ने बताया कि यहाँ माँगने से विवाह जल्द होता है , तो बस मैं रजत और कई कुवांरे सबके निशाने पर आ गए । मंदिर परिसर में कुछ लोग गाना बजाना भी कर रहे थे । माँगने वाले तो बहुत ही ज्यादा पर हम देने वालों में से कहाँ ? अगली पोस्ट में चलेंगे राम राज मंदिर और चतुर्भुज मंदिर में । नमस्कार .....
      


हरदौल का मंदिर 

हरदौल

भजन पार्टी 

हुड हुड दबंग 

हेमा जी की गुडिया को आकर्षित करते रंग 

खाने है क्या ?


बकरियां फूल खा रही है 
ये पूरा ग्रुप नहीं है

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