Tuesday, October 4, 2016

कुरूक्षेत्र ,हरियाणा Kurukshetra ( Haryana )

प्रस्तुतकर्ता - हरेन्द्र धर्रा

 कुरूक्षेत्र को कौन नहीं जानता । धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र , जहाँ अधर्म पर धर्म की विजय हुई थी । यही वो जमीन है जो महाभारत युद्ध में लाखों करोड़ों वीरों के खून से सन गई थी । तो इसी कुरूक्षेत्र को देखने मैं और नितीश निकल पड़े । 21 अगस्त को सुबह पाँच बजे हम बाईक लेकर निकल चुके थे गाँव से । अंधेरा छंटने तक हम जी टी रोड़ पर चल रहे थे । हाईवे पर जाके नितीश बोला कि यार पता नहीं बाईक भाग नहीं रही । क्यूँ नहीं भाग रही ? ध्यान दिया तो देखा की पिछले टायर में हवा कम है । अब सुबह सुबह कोई हवा वाला नहीं । तो एक पेट्रोल पंप के पास दिखा एक । बस उठा ही था मुंह भी नहीं धोया था उसने  । पहले उसने झाडू लगाया । फिर हवा बना कर टायर में भरी । हवा भरते वक्त नितीश बोला कि भाई दूर जाना है ठीक सी कर दियो । अब मेरे हिसाब से तो ठीक सी का मतलब होता है कि जितनी आए उतनी कर दे । मैं मन में सोच रहा की यार कहीं इसने ज्यादा ना कर दी हो । कहीं स्पीड में टायर फट के हम रोड़ पे ना पहुँच जाए । लेकिन मेरे सोचने से क्या होता है । मेरा सोचा होने लगता तो अब तक तो धरती पर कई बार प्रलय आ चुकी होती ।

हवा भरवा रहा है 

सुप्रभात 
  
    पानीपत से कुछ पहले कुछ पहले एक जगह रूके । तो मेरा ध्यान एक मीनार पर गया रोड़ के दूसरी तरफ । पास जाकर देखा तो पता चला की ये शेर शाह सूरी द्वारा बनवाई गई कोस मीनार है जो अभी तक बची हैं । इनको उस समय मार्ग चिन्हित करने के लिए हर कोस पर बनाया गया था । अभी भी कई राज्यों में , बल्कि पाकिस्तान में भी ये बची हुई हैं । हमें कुरूक्षेत्र तक रस्ते में दो तीन और कोस मीनारें नजर आई । एक कोस मीनार दिल्ली चिड़ीयाघर में भी है । पुरातत्व विभाग अब इनका संरक्षण करता है ।




    करीब आठ बजे हम कुरूक्षेत्र पहुँचे । कुरूक्षेत्र का नाम राजा कुरू पर पड़ा । एक पौराणिक कथा के अनुसार राजा कुरू नें इस जमीन को बार बार जोता । इंद्र द्वारा इस परिश्रम का कारण पूछने पर कुरू नें कहा की जो भी यहाँ मरेगा वो पुण्य लोक जाएगा । पर इंद्र ने उनका परिहास कर ये बात और देवताओं को भी बताई तो सब देवताओं ने कहा की कुरू को अपने अनुरूप किजिए वरना लोग बिना हमारा भाग दिए यज्ञ करते सीधे स्वर्ग लोग चले जाएँगे । तब इंद्र ने कहा कि हे राजन आप व्यर्थ ही परिश्रम करते हैं । इस भूमि पर जो भी अन्न त्याग कर या युद्ध में प्राणों का त्याग करेगा वह स्वर्ग लोक का वास करेगा ।
                 तो हम सबसे पहले ब्रह्म सरोवर की तरफ चले । ब्रह्म सरोवर से कुछ पहले नवीन जिंदल द्वारा स्थापित भगवान कृष्ण की बहुत सुंदर प्रतिमा है । इसको रूक कर देखे बिना किसी का निकल जाना संभव नहीं । पार्किंग में बाईक खड़ी कर हम सरोवर पर पहुँचे । ब्रह्मसरोवर कुरूक्षेत्र में थानेसर में पड़ता है । थानेसर जगह का नाम भगवान शिव की वजह से पड़ा है । यहाँ भगवान शिव को स्थाणु कहा गया है । यहाँ स्थापित होने के कारण इस जगह का नाम स्थाणेश्वर पड़ा जो बाद में अपभ्रंश होकर थोनेसर हो गया ।ब्रह्म सरोवर 1800 गुणा 1400 फुट में फैला है । सरोवर को बीच में से रस्ता बनीकर दो भागों में बांटा गया है जो पुल के नीचे से जुड़े हुए हैं । ब्रह्म सरोवर कुरूक्षेत्र का मुख्य आकर्षण है । इस सरोवर का जल व घाट बहुत साफ सुथरे थे । महिलाओं के लिए बंद घाट बनाए गए हैं । सरोवर के बीच में पार्क भी है । पार्क में गीतोपदेश देते कृष्ण व अर्जुन की बहुत बड़ी मूर्ति भी बनाई गई है जो रथ पर सवार हैं । उसके दूसरी तरफ श्याम जी का मंदिर और चंद्रकूप भी है । यहीं पर बर्बरीक का कटा सर रखा गया था । और यहीं पर द्रोपदी ने अपने केश रक्त से धोकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की थी । ब्रह्म सरोवर में स्नान करने से अश्वमेघ यज्ञ जितना पुण्य मिलता है ऐसा माना जाता है । पर हम दोनों ने फल की चिंता न करते हुए स्नान किया और चल निकले सन्निहित सरोवर की तरफ ।
नविन जिंदल द्वारा लगवाई गयी मूर्ति 


साफ़ पानी और घाट 

सैनी साब 

यहीं पर द्रोपदी ने प्रतिज्ञा पूरी की थी 




घाट 








ये पार्क सरोवर के बीच में है 



  सन्निहित सरोवर ब्रह्म सरोवर से आकार में छोटा है । परंतु उससे अधिक पवित्र मान जाता है । विश्वास है कि ब्रह्म सरोवर भी पहले सन्निहित सरोवर का ही अंग था । इस तीर्थ पर सभी देवी देवताओं के मंदिर हैं । जिनमें लक्षमी नारायण मंदिर प्रमुख है । महाभारत में इसका वर्णन इस प्रकार है -
                     'मासि मासि नरव्याघ्र संनिहत्यां न संशयः तीर्थसंनिहनादेव संनिहत्येति विश्रुता।


 अर्थात् हर महिने की अमावस्या को पूरी पृथ्वी के तीर्थ इस सरोवर में सन्निहित होते हैं । और इसी लिए इस सरोवर का नाम सन्निहित सरोवर पड़ा । महाभारत युद्ध के पश्चात पांडवो नें यहीं पर अपने प्रियजनों का पिंड दान किया था ।
      सन्निहित सरोवर के पास ही श्री कृष्ण  संग्राहलय  और विज्ञान संग्रहालय भी है । यहाँ से हम सीधे वहीं पहुँचे । पूरी कुरूक्षेत्र यात्रा में सबसे अधिक आनंद मुझे तो इन  संग्राहलय  में ही आया । विज्ञान केंद्र में विज्ञान से संबंधित चीजें है । अन्य जगहों की तरह सिर्फ देखने के लिए नहीं बल्की यहाँ देखने के साथ कुछ चीजें आप करके भी देख सकते हैं । कृष्ण संग्राहलय केवल भगवान  कृष्ण को समर्पित है । यहाँ फोटो नहीं खींचने दे रहे थे । लेकिन टिकट  से अधिक  पैसे वसूल हो जाते हैं यहाँ भी । यहाँ तीन तल हैं पहले में पुरानी मूर्तियाँ शिलालेख हैं  । दूसरे पर पेंटिंग्स हैं और तीसरे पर मल्टिमीडीया गैलरी है ।




सन्निहित सरोवर 




विज्ञानं केंद्र के बाहर 

हड़प्पा काल के खिलोने 

हड़प्पा काल के खिलोने 

मोहर 

दोनों लोहार हैं 

सुश्रुत के औजर 







फोटो लेने वाला गायब 

नितीश का सर प्लेट में 


    यहाँ से निकलने के बाद हमने रुख किया भीष्म कुंड का । भीष्म कुंड ब्रह्मसरोवर से करीब छह किमी दूर नरकाटारी नाम के गाँव में पड़ता है । यहीं पर अर्जुन ने तीर मारकर धारा निकाली थी और भीष्मपिता की प्यास बुझाई थी । यहाँ एक छोटा सा तालाब और एक मंदिर है । यहाँ के बाद हमारा लक्ष्य था भोर सैंयदा नाम का गाँव जो करीब बीस किमी दूर था । यहाँ हमारे लिए आकर्षण का केंद्र था क्रोकोडाईल फार्म । तो हम सीधे ऊधर ही निकल लिए । छोटी छोटी सड़कों गाँवो से निकलते हुए हम वहाँ पहुँचे । पर ये क्या यहाँ ना तो बंदा था कोई और ना मगरमच्छ की जात । बल्कि बोर्ड और लगा था कि अंदर आना मना है । और ये कोई चिड़ियाघर नहीं है । हम अंदर घुसे फिर भी । पर कोई मगरमच्छ नहीं दिखा । खामाखाह चालीस किमी की घुमाई हुई । तो वापस कुरूक्षेत्र की तरफ रोड़ पर चढ़ लिए । रास्ते में ज्योतिसर पड़ता है । ज्योतिसर ही वो जगह है जहाँ भगवान कृष्ण ने गीता उपदेश दिया था । ज्योतिसर में भी एक छोटा सा सरोवर है । एक प्राचीन शिव मंदिर भी है । यहाँ अभी भी उस बड़ वृक्ष के उपवृक्ष (पेड़ की दाढ़ी से बने ) हैं जिसके नीचे गीता उपदेश दिया गया था ।



भीष्म कुंड 

कोई मगरमच्छ नहीं 



ज्योतिसर 
ज्योतिसर में 
                                  
और सबसे आखिर में हम पहुँचे शेख चिल्ली के मकबरे पर । ये एक किले की तरह ही है । शेख चिल्ली शाह जहाँ के बेटे दारा शिकोह का धर्मगुरू था । शेख चिल्ली शेखी बघारने के लिए भी मशहूर था। मकबरे के बीच में उद्यान भी है । मकबरे के पीछे ही राजा हर्षवर्धन का टीला भी है जहाँ सीधे मकबरे से ही जा सकते हैं । मकबरे की शिल्प भी बहुत अच्छा है । यह कुछ कुछ ताजमहल की तरह भी है ।  इसका उद्यान भी ताजमहल के उद्यान की तरह ही है ।यहाँ पर भी एक  संग्राहलय  यह मकबरा काफी बड़े एरिये में फैला है और हमें वापस भी चलना था तो बिना ज्यादा समय लिए हम वापस निकल पड़े गाँव की ओर ।  ये पोस्ट बहुत जल्दी खत्म करनी पड़ी जैसे जल्दी जल्दी यात्रा की थी । इस बात के लिए माफी चाहूँगा ।  





पीछे हर्ष का टीला है 

दो प्रेमी तो यहाँ अभी भी घुसे गप्प मर रहे थे 










                                धन्यवाद 







        
                   
      

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