Sunday, June 19, 2016

भीमबेटका और भोपाल ( Bheembetka and Bhopal )

प्रस्तुतकर्ता - हरेन्द्र धर्रा

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अभी तक आपने पढ़ा था कि हम आठ तारिख को उज्जैन में घूमकर रात को ललित शर्मा जी से मुलाकात के बाद वापस भोपाल वाली ट्रेन पकड़ चुके थे अब आगे -

अगली सुबह यानी के नौ मई को हम भोपाल में उतरे | ललित जी से संपर्क किया तो पता चला कि स्टेशन पर ही बैठे हैं | फिर क्या था हम तीनों ( मैं , सचिन, संजय ) बाकी सब को चाय की दुकान पर छोड़ कर ललित जी से मिलने पहुँच गए स्टेशन पर | वो प्लेटफार्म एक पर ही थे | वहा काफी बाते हुई उनसे और छोटी सी मुलाकात में काफी ज्ञानपरक बाते भी बताई उन्होंने | उनके साथ उनके एक साथी भी थे वे नहाने गए थे | उनके आने के बाद उन्होने चाय पिलाई हमें फिर फोटो लेने के बाद उनसे विदा हुए , क्योंकी हमें आज भोपाल देखना था |
                                                    पहले सांची स्तूप और भीमबेटका की गुफाएँ देखने जाने के बारे में सहमति बनी | हम तीनों ही जा रहे थे बाकियों नें होटल में दो कमरे ले लिए थे तो वे वहीं आराम करने वाले थे | ऑटो वालों से बात की शहर घुमाने की तो वो बोला की भीमबेटका जाऐंगे तो जाने जाने के आठ सौ रूपये ! उड़ी बाबा आठ सौ ? नहीं हम तो बस से हो आऐंगे बाकी शहर ऑटो से घूम लेंगे |  नहा धोकर बस स्टैंड को निकल लिए क्योंकी ऑटो वाला तो ज्यादा पैसे मांग रहा था | वहाँ जाकर पता लगा की ये दोनों जगह सांची स्तूप और भीमबेटका तो अलग अलग डायरेक्शन में है तो सांची स्तूप कैंसल और चल निकले भीमबेटका की ओर | सभी बसें निजी थी स्टेट ट्रांसपोर्ट की बसे थी ही नहीं | भीमबेटका वहाँ से शायद चालीस किमी के करीब था |
                                                  शहर से निकलते ही राजमार्ग में भी गड्ढे | वो तो हमारा हरियाणा ही है कि एक घर के लिए भी स्पेशल पक्की गली बना देते हैं टूटे रोड़ तो मिलेंगे ही नहीं | खैर बस ने हमें भीमबेटका के मोड़ पर उतार दिया मेन हाईवे पर | ये गुफाएँ मेन रोड से तीन किमी दूर पहाड़ी पर हैं दूर से ही पहाड़ी पर इनके अजीब आकार दिखने लगते हैं || रोड के साथ में ही रेलवे लाईन है वहाँ फाटक पर दो लड़के थे बाईक लेकर खड़े थे उनसे बात की तो काफी मोल भाव करने के बाद वो साठ रूपये में छोड़ने को तैयार हो गया | धूप तेज थी और हमें पता भी नहीं था कि कितना चढ़ना पड़ेगा तो हम साठ में तैयार थे | वो बैठाने लगा तो सचिन के बाद संजय जी बैठ गए ! मेरी तो जगह बची ही नहीं | फिर वो पहले सचिन को लेके गया और फिर हमको लेने आया | वहाँ जाने के बाद वो अस्सी रूपये मांगने लगा | हमारे पास खुल्ले नहीं थे और ना ही उसके पास तो मंदिर के पुजारी से खुल्ले करा के काफी ना नुकर के बाद उसको सत्तर रूपये दिए | टिकट सचिन ले ही चुका था | फिर हम बढ़े गुफाओं की और |
         भीमबेटका अपनी गुफाओं और उनमें आदिमानव द्वारा बनाए गए भित्ती चित्रों के लिए प्रसिद्ध है | यहाँ करीब साढ़े सात सौ गुफाएँ है जिनमें से करीब पाँच सौ में भित्ती चित्र पाए गए हैं | आम लोगों के लिए बारह गुफाएँ ही खोली गई हैं जिनमें सबसे पुराने चित्र करीब 15000 साल पुराने हैं | हाँलाकी सब चित्रों का काल एक ही नहीं है |  खास बात यह भी है कि यहाँ कुछ चित्रों में लाल सफेद के साथ साथ पीले और हरे रंग का भी प्रयोग किया गया है | लाल रंग के लिए उन लोगों ने गेरूआ पत्थर जो हमारे यहाँ गेरू कहते है जो आज भी जब दिवारों पर कुछ चित्र बनाते हैं किसी त्योहार या फिर शादी में अब भी इस्तेमाल होता है ! सफेद रंग के लिए चूना पत्थर का इस्तेमाल किया गया है | इनको जानवरों की चर्बी या पेड़ों के बीजों का तेल मिल कर  रंग तैयार किया गया | इन चित्रों में मानव को शिकार करते हुए , घोड़े - हाथी की सवारी करते हुए भी दिखाया गया है | कुछ चित्रों में सामूहिक नृत्य के चित्र भी हैं | ये भारत में पाए गए प्राचीनतम मानव चिन्ह हैं | भीमबेटका का जिक्र पहली बार भारतीय पुरातात्विक रिकॉर्ड में 1888 में एक बुद्धिस्ट साइट के तौर पर आया था | फिर भारतीय पुरूतात्विद विष्णु एस. वाकंकर ने एक बार ट्रेन से भोपाल जाते हुए पहाड़ियों का ये आकार देखा तो वे 1957 में अपने और साथियों के साथ वापस आए और इन गुफाओं का अध्ययन किया और इन्हे सबके सामने लाए |  सन 1990 में भारतीय पुरूतात्विक विभाग ने राष्ट्रीय महत्व में भीमबेटका को शामिल किया | और सन् 2003 में इसे यूनेस्को विश्व विरासत स्थलों में शामिल किया गया |
                                              अब हम गुफाओं की ओर बढ़े | ये गुफाएँ वैसी नहीं है जो की काट कर बनाई गई हों | ये प्राकृतिक हैं और काफी तो आर पार खुली हैं | गुफाओं में जिनमें चित्र हैं उनके आगे रेलिंग लगाई गई है | हम जब वहाँ थे तो ज्यादा लोग नहीं थे | एक तो गर्मी का मौसम , एक दोपहर का समय | कोई सिक्योरिटी गार्ड भी नहीं था | तो मैं एक फोटो लेने के लिए रेलिंग कूदा की तभी आवाज आई | मैने उस तरफ देखा तो एक सिक्योरिटी गार्ड छाँव में बैठा था ओट में | आवाज ना लगाता तो पता ही नहीं चलता की वहाँ कोई है | वहाँ से बाहर निकलना पड़ा | उसके बाद कोई रेलिंग क्रॉस नहीं की | इतने सालों तक इन चित्रों का बचा रहना भी कमाल है लगता ही नहीं की इतने पुराने हैं | कुछ चित्रों में मानव को हाथी और घोड़ों की सवारी करते भी दिखाया गया है जबकी मैं तो सोच रहा की बस जानवरों के चित्र होंगे क्योंकि आदिमानव का नाम जहन में आते ही एक ही तस्वीर दिमाग में आती है कि नंग धडंग गुफाओं में रहने वाला | मारा खाया और सो गया ! बस ये ही काम करने वाला | पर चित्रों को देखने पर वैसा कुछ नहीं लगता |  यहाँ तो मानव घोड़े पर घूम रहा है हाथी की सवारी कर रहा है | एक चित्र में फूल और गमला है | मुझे लगा कि ये बाद में बनाया गया है  क्योंकि मुझे नहीं लगा कि गुफामानव गुफा में गमला सजाता होगा पर उन दोनों ने तो इसे गमला मानने से ही इंकार कर दिया |  गुफाओं को जल्दी ही निबटा कर हम वापस चल पड़े क्योंकी हम ललित शर्मा तो हैं नहीं जिनके पास आते ही पत्थर भी अपनी कहानी बयां करने लगते हैं हम जहाँ पर देखना बंद करते हैं वो वहाँ से शुरू होते हैं |
                                              तो आते वक्त पैदल ही आए | क्योंकी अब पता था कि कितना चलना है और चढ़ाई नहीं थी अब तो उतराई थी | अगर ये बारिश का मौसम होता सब हरा भरा होता गर्मी ना होती तो इस जगह की सौंदर्यता अलग ही होती | रस्ते में एक नलका मिला | संजय जी ने कहा चेक कर पानी ! मैने पानी की एक छोटी सी घूंट मुंह में ली और इतना आनंद आया की वापस थूक दिया ! बिल्कुल खारा खारा कसैला सा पानी था |  कुछ दूर पर टिकट काऊंटर था तो वहाँ  मैं और संजय रूके क्योंकी सचिन आराम आराम से चल रहा था ,वहाँ से कुछ पानी लिया क्योंकी हमारी बोतल खाली हो चुकी थी | मेन रोड पर आए तो भूख लग आई थी | सुबह बस पोहा ही तो खाया था | वहीं पर मध्यप्रदेश टूरिज्म वालों का रेस्टोरैंट है |  वहाँ गए तो बस रेटलिस्ट देखकर ही पेट भर गया | बस पानी पीकर बाहर निकल गए और एक दुकान से कोक और पेटीज़ ले ली | फिर कुछ समय इंतजार के बाद भोपाल की बस भी मिल गई | पर बस वाले ने शहर से बाहर ही दूसरा बस अड्डा था वहीं उतार दिये |
                                   बस में मेरी हालत पतली हो जाती है | तो एक गिलास चटपटा नींबू पानी गटका दिया संजय जी ने आम पन्ना लिया | पहले रेट पूछा तो दस बताया था पर बाद में संजय जी वाला पच्चीस या शायद तीस का कहने लगा | सारे ही ऐसे हैं क्या ? पहले चाय वाला और अब ये | अब वहीं से ऑटो पकड़ के शहर देखना था | एक ऑटो करके हम निकल पड़े | कुछ ही देर में बारिश आ गयी वरना हमारे बाकी साथी दूसरे ऑटो में आने थे | अब वो नहीं आए | कुछ देर में बारिश रूक गयी | बिरला मंदिर देखने पहुँचे तो वो बंद मिला | खुलने का इंतजार करने का टाईम नहीं था तो आगे बढ़ चले | फिर ऑटो वाला इमारतों के नाम बताता रहा ,दिखाता रहा | ये राजभवन हैै, ये पुलिस हैडक्वार्टर है , ये फलाना ये धिनका , एक कॉलोनी दिखाई उसने रस्ते से ' प्रोफैसर्स कॉलोनी ' सब की नेम प्लेट पे डॉ० लगा हुआ नाम के आगे | ऐसे ही एक रोड़ पर सिर्फ मैडिकल स्टोर्स और क्लीनिक थे | फिर हमे वो छोटी लेक पर ले गया , भोपाल में दो लेक हैं | छोटी लेक पर एक प्वाइंट था सुसाईड प्वाइंट | वहाँ से झील का बड़ा सुंदर नजारा दिख रहा था पता नहीं यहाँ आकर भी लोगों का मरने का मन कैसे करता होगा ?
                                  खैर हमारा मरने का कोई प्लॉन नहीं था तो थोड़ी देर बाद फोटो वगैरह लेकर वहाँ से चल पड़े | थोड़ी आगे जब हम दूसरे रोड़ पर चढ़ रहे थे तो सीएम का काफिला आ रहा था तो हमे कुछ देर रोका गया | हालांकी रोड़ बिल्कुल खाली पड़ा था | हमारे यहाँ तो ऐसा नहीं करते | फिर वो हमें लेके गया बड़ी झील पर | यहाँ एक शुरूआती भाप का ईंजन भी रखा है नेरो गेज का | उसके पास काफी फोटो भी लगे हैं पुराने भोपाल शहर के | कुल मिला कर झीलों को बढ़िया तरह रखा गया है आखिर ये है भी तो झीलों का शहर | इस झील के दूसरी तरफ राजा भोज की ऊँची प्रतिमा भी स्थापित की गई है | हम उसके बाद वहीं गये | वहाँ से चलने के बाद संजय जी ने मुझसे कहा

“तू आगे बैठा है गोलगप्पे वाला कोई दिखे तो बताना !”
 ( मेरी पसंदीदा सीट होती है ऑटो में ड्राईवर के पास वाली ! और मैं वही बैठा था )

 मैने कहा - “ के कौशिक जी ! बाजीराव की तलवार और हरेन्द्र की नजर पे संदेह मत करियों बाज की तरह तेज है |”

वे बोले कोई संदेह नहीं बस तू नजर रखना | पर एक जगह मेरा ध्यान लस्सी वाले ने खींच लिया और उन लोगों की नजर गोलगप्पे वाले पे पड़ गई | हरेन्द्र की नजर की ईज्जत का सत्यानाश हो गया | गोलगप्पे खाने के बाद नजर दूसरी चीज पर पड़ी दाल के बड़े | वहाँ से निमटे तो आलू बड़ा ( वाकई में बड़ा भी था ) और रेट सिर्फ पाँच रूपये ! और चलते चलते फिर जलेबी भी लेली | मन तृप्त हो गया | वहाँ से थोड़ी आगे चले तो ऑटो वाले ने एक मस्जिद की तरफ ईशारा किया कि इसका नाम ताज- उल है , ये एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद है | होगी भाई हमारी जानकारी में तो दिल्ली की जामा मस्जिद है देश की सबसे बड़ी मस्जिद | उस मस्जिद के पीछे एक तालाब था तो ड्राईवर ( ऑटो का ) बोला कि भाई अगर बुरा ना माने तो एक ब्रैड का पैकेट लेकर मछलियों को खिला दो अगर आपका मन करे तो | उसने एक दुकान की तरफ ईशारा किया कि ये दुकान सिर्फ ब्रैड बेचकर गुजारा करती है | तो हमने ये काम भी कर दिया | अंधेरा होने लगा था और हमें आज रात को अपनी ट्रेन भी पकड़नी थी , इसलिए वापसी हो लिए होटल की तरफ |
                                           शाम को सब स्टेशन के लिए निकल लिए | खाना पैक करा लिया और डोसा इडली भी ले लिया वहीं खाने के लिए | उस होटल के सभी कर्मचारी ऐसे लग रहे थे जैसे की सुल्फा पिये हैं ! साईड वाली टेबल पर एक साहब बोतल खोल कर बैठै थे | जैसा पूर्वाभास था कुछ ही देर में उनकी कहासुनी भी हो गई | हम तो निकल गए वहाँ से | प्लेटफार्म पर बहुत ज्यादा भीड़ देख कर एक बार तो पसीने छूट गए की कहीं उज्जैन जाते वक्त जैसा हाल ना हो जाए आरक्षित सीटों पर |अपनी दिल्ली वाली ट्रेन भी लेट आई और आते ही हम भी अपनी अपनी सीट पकड़ते ही लेट गए कि गाड़ी चलने के बाद बैठ जाएंगे तब तक फुल कब्जा | खैर डिब्बे में ज्यादा भीड़ हुई नहीं | गाड़ी चलने पर खाना खाकर बैठे | थोड़ी देर बाद सचिन ने शुभ समाचार दिया की भाई ट्रेन के टायलेट्स में पानी नहीं है बिल्कुल भी | पर थोड़ी देर बाद मैने चेक किया तो सब ठीक था | खामा खा की टैंशन दे रहा था | मैं रात को सचिन के फोन से फोटो ले रह था शेयरइट से पर उसका फोन सेंड ही नहीं कर रहा था | तब याद आया अपना पुराना साथी ब्लूटूथ ! महाशय जी ने सौ फोटो भेजने में पौना घंटा लिया पर काम कर दिया | कभी ब्लयूटूथ भी कमाल की चीज लगती थी  | सुबह हम निजामुद्दीन पहुँच चुके थे | जिसका जितना खर्चा हिस्से आया था सबने चुकाया सबको राम राम की और अपने अपने रूट पकड़ लिए | संजय जी ड्यूटी पर जाने वाले थे | तो मैने सचिन से कहा यार चल चाय पीते हैं हमको कौन सी किसी की नौकरी करनी है | चाय के बाद मैने मैट्रो पकड़ी और सचिन बस पे सवार हो लिया |
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तो इतनी सी थी ये कहानी |
7 मई शाम से 10 मई सुबह दिल्ली से दिल्ली !
मेरे हिस्से आया खर्च 1500 रूपये दिल्ली से
मेन रोड़ पर 


रेट दिखा के पेट भर देते हैं यहाँ 


गुफाओं की और 


गुफाओं का प्रवेश द्वार 


मंदिर 


आदिमानव 


गुफा के अन्दर गुफा 


भित्तिचित्र


घुमक्कड़ 


भित्तिचित्र 






कछुए जैसी चट्टान 


दो मानव 


एक मानव यहाँ भी 









आदिमानव नहीं अब चमगादड़ रहते हैं यहाँ 


अब आप ही बताओ ये गमला नहीं है क्या 




बिरला मंदिर 


पत्थरों को भी कितना सुन्दर बना दिया है 


छोटी झील में फिशिंग 






राजा भोज 


खाते जाओ 
खाते जाओ 


खाते जाओ 


ताज उल मस्जिद 






पैसे खत्म हो जाए तो सचिन ये कम शुरू कर देता है मैं सवारियों को आवाज मारता हूँ 

3 comments:

  1. भाई रे
    धुम्मा ठा दिया कति फोटुवां में तो आर लिखण में तोड़ बिठा दिया

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  2. भाई रे
    धुम्मा ठा दिया कति फोटुवां में तो आर लिखण में तोड़ बिठा दिया

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    1. देख लियो कदे यो धूम्मा आपके फोन मैं उठता हो !

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