Thursday, May 12, 2016

सिंहस्थ2016 , उज्जैन Simhasth 2016 ujjain

प्रस्तुतकर्ता : हरेन्द्र धर्रा 
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कई दिन पहले व्हाट्सएप पर घुमक्कड़ी दिल से ग्रुप में कुंभ के बारे में चर्चा चल रही थी | संजय कौशिक जी , सचिन जांगड़ा भाई , रमेश जी के जाने की प्रोग्राम था | वहाँ पर आगे इंदौर से डॉ० सुमित , और भालसे जी , मुंबई से विनोद गुप्ता आने वाले थे ! 'आम' की पेटी लेकर | मेरा भी मन हो रहा था | एक दिन संजय जी ने पूछा हैरी ( ग्रुप में यही कहते हैं ) एक टिकट ज्यादा है चलेगा क्या ? बस भूखे को रोटी मिलेगी तो वो मना करेगा क्या ? मैने घर बात की और हाँ कर दी |
                  तो सात तारीख को जाना था दिल्ली से भोपाल और फिर वहाँ से उज्जैन के लिए रिजर्वेशन थी | सीधी दिल्ली से उज्जैन की सीटें खाली नहीं थी | और जो आदमी घूमने का शौकीन होगा वो यही तो चाहेगा कि उसकी सफर थोड़े लम्बे रस्ते से हो ,ज्यादा कुछ देख पाऊँ ! जाने से दो दिन पहले ललित शर्मा जी की पोस्ट देखी , उन्होने उज्जैन का फोटू डाल रखा था | तो लगा की मुलाकात होगी | दरअसल कुँभ से ज्यादा मुझे इन सब से मिलने में ज्यादा दिलचस्पी थी | और ललित जी से मिलने का संपोला तो मन में पहले से ही मौजूद था | यहाँ संभावना ज्यादा लग रही थी तो वो संपोला एकदम से ऐनाकोंडा बन चुका था !
                       7 मई की शाम को नई दिल्ली से तेलंगाना एक्सप्रैस पकड़नी थी | फिर भोपाल से एक पैसेंजर में उज्जैन के लिए आरक्षण था | ( आरक्षण सुनते ही जाट दिमाग में उठ आते हैं ) तो मैं सात को दोपहर डेढ़ बजे के आस पास निकल पड़ा |  साँपला से पुरानी दिल्ली ट्रेन से फिर वहाँ से मेट्रो पकड़ कर नई दिल्ली पहुँचा | कौशिक जी और सचिन पहले ही वहाँ पहुँच चुके थे | कौशिक जी के साथ सात लोग और थे | मुझे पता था कि उनके साथ और लोग भी आऐंगे पर ये नहीं पता था कि इतनी उम्र के लोग होंगे | लेकिन पूरी यात्रा में उन लोगों ने उम्र के फर्क का एहसास नहीं होने दिया |  खैर निर्धारित समय पर गाड़ी चल पड़ी | कुछ समय बाद उनके द्वारा लाए गए खीर और हलवे के डब्बे खुल गए ! मज्जानी लाईफ ! सब लोगों का व्यवहार बहुत बढ़िया था | खाना खाते वक्त मैं और सचिन अलग सीट पर बैठे थे पर उन्होने बार बार कहकर हमें भी बुला लिया | भोजन उपरांत उन लोगों ने भजन शुरू कर दिए | बड़ी बढ़िया ताल लगा रहे थे | कुछ और सहयात्री भी साथ साथ लय बनाने की कोशिश कर रहे थे | उपर वाले का नाम लेने के बाद सब सोने के लिए सीटों पर जाने लगे | मुझे नींद की एक झपकी लगी थी , कि आँख खुली मेरी सीट पर एक आदमी बैठा था दारू पीके | पर सबने धमकाकर उसे भगा दिया | बस उसके बाद नींद नहीं आई | फोन चार्जिंग पे लगा के मुगल-ए- आज़म देखने लगा | कमाल की फिल्म है और कलर में देखने पर पता भी नहीं लगता कि ये पहले श्वेत- श्याम बनी होगी | आगरा तो पहले ही जा चुका था ! रितेश गुप्ता जी नहीं आ पाए | झाँसी भी निकल गया पर रात के बारह बजे कौन आएगा मिलने ? मुकेश पाण्डेय जी को इसी लिए सूचित नहीं किया था | गाड़ी के साथ समय भी अपनी निशचित रफ्तार पर था | साढ़े तीन बजे भोपाल उतर गए |
                         अब उज्जैन की ट्रेन में काफी समय था | तो स्टेशन से बाहर निकल कर चाय पीने चले गए सब | सचिन 'जरूरी' काम से चला गया | हमने चाय बनवा ली | चाय पीकर पैसे पूछे तो ग्यारह चाय के बताए एक सौ पचपन ! ' ये कौन सा रेट ? दो घूँट चाय और पंद्रह रूपये ? ( एक सौ पचपन के हिसाब से तो पंद्रह नहीं बनते पता नहीं कैसे हिसाब लगाया भाई ने  ) | हम चाय पीकर स्टेशन पर आ गए | सचिन बाद में आया चाय पीकर और साथ में पोहा खाकर उसी दुकान पे | रेट पूछा तो बताया कि पंद्रह रूपये , दोनो के | मतलब जो पोहा हमने खाया नहीं था उसके रूपये भी ले लिए थे हमसे, वाह महाराज ! वापस गए तो सचिन आगे गया और एक चाय और मांगी और पाँच रूपये दे दिए | मतलब रेट पाँच ही था | दुकान वाले से कहा तो एक बार तो बोला कि मैने तो पैसे काटे ही नहीं ज्यादा कहने पर बोला आपकी तो ' गोल्डन' चाय थी | ' गोल्डन चाय ' कमाल है ! अबे वही ग्लास वही केतनी वही चायदानी ! पर वो गोल्डन कैसे हो गई ? ज्यादा कहने से पचास रूपये वापस मिले | भागते चोर की लंगोटी सही |
                          हमारी गाड़ी आई ! प्लेटफार्म पर भयंकर भीड़ | और ये हाल तब जब कई मेला स्पेशल चल रही थी | खैर डिब्बे में पहुँचे | कौशिक जी पहले ही सीट पकड़ चुके थे | सब पहुँच गए | लोग स्लीपर में भी जनरल की तरह घुसे जा रहे थे | उज्जैन तक स्लीपर क्लास का हाल जनरल से भी बदतर हो चुका था | मैने जिंदगी में ट्रेन के डिब्बे में इतनी भीड़ नहीं देखी थी | पाँच घंटे लगा दिए उज्जैन पहुँचने में | डेढ़ बजे उज्जैन पहुँचे | सीधे रामघाट को निकल पड़े  | रस्ते में एक जगह दो जने दूसरे रस्ते पर पहुँच गए | काफी टाईम फोन करने से वापस आए | सामान रखने को ना कहीं क्लॉक रूम मिला और ना ही रूम | रामघाट पहुँचे |  फिर क्षिप्रा माँ के मंदिर के सामने नहाने को चल दिए | पानी में घुसते ही क्या कमाल की अनूभूति हुई ! सारी थकान फुर्र | सचिन का फोन वाटरप्रूफ है तो पानी में घुसे घुसे बहुत फोटो लिए | बाहर खड़े होकर फोटो खींच रहे लोग मन ही मन धुँआ हो रहे होंगे |
                        डॉ० साब का फोन पहले ही आ चुका था कि वो पहुँचने वाले होंगे तब तक बाबा महाकाल के दर्शन कर लेना | मंदिर घाट से कुछ दूरी पर है |  महाकालेश्वर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है | यह मंदिर स्वयंभू मतलब स्वयं प्रकट होने वाला और दक्षिणमुखी होने के कारण भी विशेष महत्व रखता है | मुझे पूरी जानकारी तो नहीं पर सुना है कि उज्जैन में रोज एक मृत्यु अवश्य होती है | और चिता की राख से ही बाबा की भस्मारती होती है | आम दिनों में काफी ज्यादा सुरक्षा होती है यहाँ परंतु भीड़ की वजह से ना हमारी कोई चेकिंग हुई और ना ही बैग वगरह वाहर रखवाए गए | कई घंटो में होने वाले दर्शन बीस मिनट में ही हो गए | दर्शन के बाद डॉ० से सम्पर्क किया तो उन्होने विक्रमादित्य की मूर्ति के पास आने को कहा | ये मूर्ति विक्रम टीला नाम की जगह पर है जो मंदिर से कुछ दूर ही है | यहीं पर राजा भोज को विक्रमादित्य का सिंहासन बत्तीसी मिला था | यहीं पर उन पुलतियों की मूर्तियाँ भी है जिन्होने राजा भोज को विक्रमादित्य के बत्तीस गुण बताए थे | खैर हम तो डॉ० साब को खोज रहे थे | वो आए मिले और बैग से कुछ निकाला | ये एक बैनर था जिस पर एक साधू का चित्र था और नीचे लिखा था ' घुमक्कड़ी ..दिल से ' !
                       उसे देखते ही बस मन खिल उठा | बाद में ये बैनर कई दिन मित्रों के बीच छाया रहा | उसके बाद डॉ० साब चल पड़े हमें नागा साधू दर्शन कराने | वहाँ एक साधू पत्थर का टुकड़ा लिए खड़े थे | डॉ० साब के भाई ने कहा कि इनका फोटो मत खिंचना | पर सबको कौन बताता ? एक लड़का मोबाईल से उनका फोटो ले रहा था कि पत्थर मोबाईल पर आकर लगा | हम वहाँ से आगे निकले तो आराम करने की डिमांड सहयात्रीयों की तरफ से आई | तो डॉ० साब हमें कनकेश्वरीवधाम की तरफ ले चले | वहाँ जाकर भंडारे में पेट पूजा की गई | हमें पता था कि ललित जी वहीं है उनसे संपर्क किया तो उन्होने अपना ठिकाना बताया |  भंडारे मे पेट पूजा करके निकले ही थे कि एक नं० करने की डिमांड आई | अब पंडाल में पेशाब करने की जगह नहीं ! कहाँ जाऊँ ? सचिन बोला के तू बाहर जा के देख ले कहीं जगह | मैं रोड पे आया तो सब जगह चमाचम लाईट जल रही लोग आ जा रहे | मन में कहा हे महाकाल मदद कर कि तभी बूंद गिरनी शुरू हो गई लाईट चली गई | बड़ा काम बना ! अब ये दिक्कत हो गई की उन लोगों को कहाँ ढूंढू ? मोबाईल में नेटवक नहीं पर थोड़ी देर बाद संजय जी नजर आ गए और बाकी सब भी | बाकी लोग पंडाल में सोना चाहते थे जबकी मैं सचिन डॉ० साब रामघाट की तरफ या ललित जी की तरफ जाने के समर्थन में थे काफी टाईम मान मनौवल करने के बाद तय हुआ की हम ललित जी  के पास जाऐंगे|  बाकी सीधे रामघाट पर मिलेंगे | हम ललित जी के पास पहुँचे तो नेटवर्क नहीं था फोन नहीं लग रहा था | पर थोड़ी दूर छत्तीसगढ़ पैवेलियन दिख रहा रहा था हमें लगा वो वहीं मिलेंगे | हम वहाँ पहुँचे तो उनका फोन भी लग गया | उन्होने कहा कि बाहर आ रहे हैं | कुछ समय बाद ललित शर्मा जी बाहर आए | बस उनसे मिलना भी एक अलग ही अनुभव था | वो हमें अंदर ले गए और काफी समय तक बातें हुई | वो उसी दिन वहाँ से भोपाल जा रहे थे रात को ही | और हमारा भी प्रोग्राम कुछ ऐसा ही था | करीब ग्यारह बजे हम भी ललित जी से विदा होकर चल पड़े रामघाट की ओर | पर जब लगभग पहुँच चुके थे तो रास्ते बंद कर दिेए गए |
                         रामघाट को शाही स्नान के लिए खाली कराया जा रहा था | बाकी तो स्नान कर चुके थे पर कौशिक जी रह गए , मेरा और सचिन का मन बिल्कुल नहीं था नहाने का चाहे उस समय नहानें से आदमी अमर ही क्यों ना हो ! हमारा विचार था कि सीधे स्टेशन चले पर कौशिक जी को तो स्नान करना था बारह बजे पश्चात क्योंकि नौ तारिख को शाही स्नान था | परंतु हकीकत में जो देशी तिथीयाँ होती हैं वो रात के बारह बजे नहीं सुबह चार बजे बदलती हैं | तो मेरे हिसाब से तो कौशिक जी उस दिन शाही स्नान नहीं कर पाए | रामघाट बंद होने के बाद कौशिक जी ने दूसरे घाट की डिमांड की डॉ० साब से | हमारे पैर चिल्ला रहे थे कि बस भाई स्टेशन चलो पर भई अब कौशिक जी को स्नान करना है तो जाना पड़ेगा ना | खैर किसी दूसरे घाट ( नाम याद नहीं है ) पर पहुँचे और कौशिक जी ने स्नान किया | टाईम काफी कम रह गया था ट्रेन का बाकी लोग जा चुके थे स्टेशन और हम  अभी घाट पर ही थे | सचिन भाई ने बताया कि स्टेशन चार किमी दूर है पर हम मानने को तैयार नहीं | निकल पड़े ये सोचते की कोई रिक्शा रेहड़ी मिली तो उसमें बैठ लेंगे | पर किस्मत खराब कि कुछ नहीं मिला ( या यूँ भी कह सकते हैं कि हमें पैसे ज्यादा लगे ) | पैदल ही आना पडा स्टेशन  | शुक्र कि ट्रेन लेट थी हमारे पहुँचने के कुछ समय बाद ही आई | आते ही सीट कब्जा ली गई | सुबह हम वापस भोपाल में थे |
                        भोपाल और भीमबेटका के बारे में अगली पोस्ट में बताया जाएगा | 
                                 
खीर हलवा खाओ मौज उडाओ 


भोपाल की ओर

भोपाल स्टेशन 

ये एक स्लीपर क्लास है 

फंदा फांसी वाला नहीं 

जबडी तोड़ दूंगा  - इस गाँव में तो ये नहीं कहते होंगे 

देखा है कभी कला पीपल 

खजूर बहुत हैं 

पहुँच गए 

ए रामू चल सलाम ठोक

जय माता दी 


राम घाट पर 

राम घाट 

वाटर प्रूफ फोन के मजे 

बहुत सुन्दर मंदिर है 

जय हो महाकाल की ओर रस्ते में 

जय महाकाल 

मुख्य मंदिर 


मंदिर में ही 

महादेव के त्रिशूल के पीछे छीपा सूर्य 

विक्रम टीले का रस्ता 

विक्रमादित्य की मूर्ति 

सिंहासन के चिन्ह 

ऐसी बत्तीस मूर्तियाँ हैं 

घुमक्कड़ी दिल से 

पुरे दिन मसाला रगड़ते रहो 

झूले वाले बाबा 

काली माई 

ललित शर्मा जी के साथ

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