Thursday, December 29, 2016

ओरछा महामिलन ( Orchha Meet 2016 ) भाग -1


२४ और २५ दिसम्बर २०१६ दो अविस्मरणीय दिन थे । करीब एक महिने पहले घुमक्कड़ी दिल से ग्रुप में मुंबई वाले विनोद गुप्ता ने सुझाव दिया की ग्रुप की मीटिंग होनी चाहिए । पूछा कहाँ ? तो उसने कहा कि ओरछा ! विनोद मजाक के मूड में ज्यादा रहता है पर ये बात सब सीरीयसली ले गए । और ना ही किसी ने आपत्ती जताई ओरछा के नाम पे !सब राजी । तो तारीख तय कर ली गई । 24 - 25 दिसम्बर 2016 !
मेरा जाने का कतई मन नहीं था ( वैसे मैं पैसों की कमी के कारण भी हिचक रहा था ) । और मुझे विनोद के आने का भी यकीन नहीं था । मैने भी लिस्ट में अपना नाम कुछ यू जोड़ दिया -
  हरेन्द्र धर्रा ( अगर विनोद ने टिकट दिखा दी तो )
  पर विनोद ने सच में टिकट करा ली । मैं भी एक बार तो घिर गया । फिर भी मना कर दिया मैने । मुझे ज्यादा इकट्ठे लोग पसंद नहीं होते ( अब धारणा कुछ बदल चुकी है ) । एक दिन कौशिक जी को बोला कि दादा मेरा तो मन विचलित हो रहा है ! एक कोना हाँ बोल रहा एक ना बोल रहा है । दादा बोले की करा दूँ टिकट ? मैं बोला करा दियो ।
  बस उसी समय मेरा जाना पक्का हो गया । अब ग्रुप में ध्यान दिया तो देखा बहुत लोग मेरी तरह फंसे हैं हाँ - ना में । सब लोग 23 को निकलने वाले थे पर मैं 22 को निकल कर पहले खजुराहो जाना चाहता था और गया भी पर उसके बारे में बाद में लिखा जाएगा । करीब 35 लोग आने वाले थे ग्रुप से , वो भी 14 राज्यों से । इतने लोगों के ठहरने का इंतजाम करने वाले थे हमारे दरोगा बाबू मुकेश पाँडेय जी ' चंदन' । चंदन जी मूल रूप से बक्सर बिहार से ताल्लुक रखने वाले हैं । अभी वो ओरछा में आबकारी उपनिरिक्षक के पद पर आसीन हैं । और ये हमारे व्हाट्सएप ग्रुप के अघोषित समूह नियंत्रक भी हैं । तो इतने लोगों का इंतजाम के लिए सबने कुछ निर्धारित राशी जमा करा दी । वैसे पार्टी ग्रुप एडमिनों की तरफ से होनी चाहिए थी पर हम सब खुद्दार लोग हैं । कई दिन पहले ही ओरछा का खुमार चढ़ चुका था । मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि रितेश भाई भालसे जी आदि जिनके मैं ब्लॉग कभी से पढ़ता आया हूँ सुशांत जी सबसे मैं साक्षात मिलूँगा। ज्यूँ ज्यूँ जाने की तारिख नजदीक आ रही थी कुछ का प्रोग्राम कैंसिल भी हुआ और कुछ का बना भी ।
     22 तारीख भी आ गई और मैं निकल पड़ा घर से । दिल्ली हजरत निजामुद्दीन से सीधे खजुराहो उ० प्र० सम्पर्क क्रांति से । 23 का पूरा दिन खजुराहो को समर्पित करने के बाद मैं वापस पहुँचा स्टेशन और चल पड़ा मुख्य पड़ाव ओरछा की तरफ । जब मैं महुरानीपुर पहुँचा था तो पाँडेय जी का फोन आया -
     - हरेन्द्र भाई कहाँ पहुँचे ?
     - महु रानीपुर के पास !
     - कब तक पहुँचोगे ?
     - शायद साढ़े ग्यारह बजे के आसपास !
     - मैं आपको लेने आ जाऊँगा ! फोन कर देना ।
पर मैं मुझ अकेले के लिए किसी की रात खराब नहीं करना चाहता था । जब ऑटो चल रहे हैं तो किसी का तेल क्यों फुंकवाया जाए ? वैसे भी सचिन जांगड़ा भी दो ढ़ाई बजे झांसी पहुँचने वाला था । तो साथ ही चले जाऐंगे । महुरानी पुर के पास ट्रेन एक घंटा  लेट थी तो मैने 12 बजे का अलार्म लगाया और सो गया । पर मेरी नींद अलार्म से नहीं बल्कि टीटी की आवाज से खुली मेरी सीट के पास ही चिल्ला रहा था किसी पर । मैने कहा क्या बात है क्यों चिल्ला रहे हो । तो बोला कि यार अभी तक टिकट नहीं कटाई है इसने झांसी आ चुका । झांसी का नाम सुनते ही मेरी कुंभकर्णी नींद गायब । एक दम उठा , कंबल काँख में दबाया और एक ट्रेन से नीचे । शायद वो नहीं झगड़ता को मैं आगे निकल गया होता ।
  नीचे उतर कर मैने समय देखा तो ट्रेन सही समय पर पहुँच गई थी । एक घंटा लेट कवर कर दिया भगा कर ! लगा लो अलार्म ! निकाल लो नींद ? जांगड़ा का इंतजार था अब तो बस मुझे । वेटिंग रूम मैं भयंकर भीड़ तो मैं बाहर बेंच पर ही सो गया कंबल तानकर । जांगड़ा दो - ढाई की बजाय चार बजे पहुँचा । मिलते ही लगा कि - ' कब के बिछड़े हुए हम आज यहाँ आकर मिले' । स्टेशन से बाहर निकल कर चाय पी , जांगड़ा ने ऑमलेट ली । ओरछा के लिए ऑटो बस स्टैंड से मिलते हैं तो पहले बस स्टैंड का ऑटो पकड़ा । बस स्टैंड पहुँचे ही थे कि डॉ० सुमित का फोन आया कि मैं भी झांसी पहुँच गया हूँ । तो डॉ० के आने के बाद हमें टीकमगढ़ वाली बस मिल गई ये ओरछा से ही होकर जानी थी । सुबह का उजाला होने से पहले ही हम ओरछा में थे । स्टैंड पर खड़े होकर पाँडेय जी 
को फोन किया तो बोले की आ रहे हैं । कुछ देर बाद गाड़ी  हाजिर थी ।
   पांडेय जी के साथ सूरज मिश्रा भी आए थे और सबसे स्पेशल पाँडेय जी के दुलारे अनिमेष बाबू । डॉ० साब बोले की इसे क्यूँ उठा लाये ? तो पाँडेय जी ने कहा हम इसे नहीं ये हमें उठाता है । अनिमेष को जांगड़ा के पूरे शरीर पर नजर डालने में ही करीब आधा घंटा लग गया । फिर कहीं हमारी बारी आई । होटल पहुँचने तक होटल खुला नहीं था तो पाँडेय जी ने फोन करके खुलवाया । होटल में पहुँचने वाले शायद हम पहले घुमक्कड़ थे । तो सुबह सुबह फ्रेश होकर हम तीनों नहा लिए । थोड़ी देर बाद बाकी लोग पहुँचने लगे जो शाम तक आते रहे । अब मुझे भूख लग आई और डॉ० साब को भी और जांगड़ा को ईतनी जितनी हम दोनो की मिला दे उससे ज्यादा । तो हम तीनों निकड़ पड़े एक दुकान पर गर्मागर्म जलेबीयाँ , समोसे और ब्रेड पकोड़े तले जा रहे थे । सबसे पहले ब्रेड पकोड़े का आनंद लिया गया । एक टुकड़ा मुँह में जाते ही मन हवा में उड़ने लगा । गजब का स्वाद । फिर समोसे और फिर जैसा सुमित कहता है जल-बेलियाँ । और इन तीन ब्रेड पकोडे तीन समोसे  रायता और पाव जलेबियों का बिल बना मात्र 75 रूपये । पेट प्रसन्न तो आप प्रसन्न । फिर चाय ली गई और हम नाश्ते से निफराम हो गए ( वैसे बाकी लोगों के साथ फिर से लिया गया ) । नाश्ते का इंतजाम होने तक अधिकतर लोग आ चुके थे । सुशांत जी ( ताऊ जी ) आते वक्त ही रस्ते में ही ऊतर लिए थे फोटो लेने के लिए । वो कुछ देर बाद आए थे । अगर उन्हे खाने और फोटोग्राफी में से एक चुनने को बोला जाए तो मैं पक्का कह सकता हूँ वो फोटोग्राफी के साथ ही जाऐंगे ।  
अपने होटल के सामने 

      नाश्ते के बाद सबको ग्रुप के लोगो वाली कैप दी गई । अब ओरछा देखा जाएगा । तो अब आपको ओरछा के बारे में भी कुछ जानकारी दे दें ।
ओरछा को सोहलवी शताब्दी की शुरूआत में बुंदेल राजा  रूद्र प्रताप ने अपनी राजधानी के रूप में बसाया । जैसा कि पांडेय जी ने बताया कि राजा अपने मंत्री के साथ शिकार करने गए थे तो इस जगह किसी शिकार की तरफ इशारा करते हुए शिकारी कुत्तों से कहा  ' ओरछा ' , मतलब कूदो । मंत्री ने इस जगह राजधानी बसाने का सुझाव दिया तो राजा ने नाम सुझाने को भी कहा । मंत्री ने कहा महाराज यहाँ आपके मुँह से  निकला था ओरछा तो क्यूँ ना नगर का नाम ओरछा ही रख दिया जाए ।  वैसे कई जगह मैने ओरछा का अर्थ गुप्त स्थान भी पढ़ा ।  ओरछा स्वयं में सब कुछ समेटे है जो एक घुमक्कड़ को चाहिए - जंगल , नदी , मंदिर , किले , पहाड़ी सब कुछ । धार्मिक , धरोहरों वास्तुशिल्प के पुजारी , फोटोग्राफर्स  कोई ओरछा से रामराजा की कृपा से खाली हाथ नहीं जाता ।
    ओरछा झांसी से करीब 18 किमी दूर मध्यप्रदेश में पड़ता है ।  यहाँ रेलमार्ग से पहुँचने के लिए आप देशभर में कहीं से भी झांसी पहुँच सकते है और फिर या तो पैसेंजर ट्रेन से या टैक्सी से या शेयरिंग ऑटोरिक्शा से पहुँच सकते हैं । अगर आप सड़क मार्ग से आना चाहें तो ओरछा झांसी खजुराहो रूट पर पड़ता है ।  या फिर आप अगर हवाई मार्ग से आएँ तो नजदीकी अवाई अड्डा है खजुराहो ।
      तो 24 तारीख को सब नहा धोकर ( मैं तो नहाया था बाकी की वो जानें ) अपने अपने कैमरे उठाकर निकल पड़े । यहाँ हमारे निर्देशक थे पाँडेय जी । सबसे पहले सामने आया एक प्याले के जैसा पत्थर का बहुत बड़ा बर्तन । पाँडेय जी ने इसका नाम बताया चंदन कटोरा । जब सेना लड़ाई लड़ने जाती थी तो इसी में चंदन घिस कर सबको टीका लगाया जाता था । इसकी खास बात ये थी कि इसको पत्थर मारने पर ये धातु सरीखी आवाज करता है । ये सुन कर मेरा मन भी हुआ कंकड़ उठाने को फिर ध्यान गया कि मुझ जैसों के कारण ही इसके चारों ओर जाल लगा दिया गया है । अब कुछ लोगो नें चंदन कटोरे को पाँडेय जी के नाम से जोड़ने की कोशिश की तो उन्होने बताया की उनके जन्म के समय आई फिल्म नदिया के पार वाले नायक चंदन से प्रभावित होकर उनका नाम रखा गया था चंदन  । जबकी मुकेश उन्होने स्कूल मे खुद लिखवाया था । 
चन्दन कटोरा 

       तो इस कटोरे को छोड़ हम बढ़े हरदौल जी के मंदिर की तरफ । यहाँ  के लोगों में हरदौल जी के लिए बहुत आस्था है । 


हरदौल ओरछा के राजा वीर सिंह के सबसे छौटे पुत्र थे और उनके बड़े भाई थे राजा जुझार सिंह ।  हरदौल नें बुंदेला सेना से अतिरिक्त भी राज्य की सुरक्षा हेतु अपनी एक सेना तैयार कर ली थी । इसी बढ़ते प्रभाव डरते मुगलों ने षडयंत्र के तहत  हरदौल के भाई जुझार सिंह के कान भर दिए कि हरदौल के जुझार सिंह  की रानी के साथ गैरजरूरी संबंध हैं । बस इसी षड़यंत्र में फंस कर जुझार सिंह नें रानी की परिक्षा लेने के लिए हरदौल को विष  पिलाने का आदेश रानी को दिया । अब स्वयं को पवित्र साबित करने के लिए रानी तैयार हो जाती है । इस बात को एक सेवक हरदौल के पास भी ले पहुँचता है । परंतु हरदौल अपनी जान की बजाय अपनी माँ समान भाभी की पवित्रता को अधिक महत्व देता है । हरदौल जानते हुए भी विषपान करता है । हरदौल के विष पीकर गिरते ही रानी विलाप करने लगती है कि मैं हत्यारी हूँ ये मैने क्या किया ? तो हरदौल कहता है कि मैं ये बात जानता था और मैने तुम्हारे सम्मान की रक्षा के लिए ही विष पिया है और अपने हाथों पिया है । आप स्वयं को दोष ना दें और इस प्रकार मात्र 23 साल की उम्र में हरदौल की मृत्यु हो जाती है ।  हरदौल की बहन कुंजावती जब अपनी पुत्री के विवाह में जुझार सिंह को भात का न्योता देने आई तो जुझार उसे यह कहकर दुत्कार देते हैं कि वह तो हरदौल से अधिक स्नेह रखती थी ।इसलिए वह शमशान में उसी से भता माँगे । कुंजावती रोती हुई हरदौल की समाधी पर पहुँचती है और भात माँगती है । कहते हैं हरदौल भात में सशरीर पहुँचते है मृत्यु पश्चात भी ।  

तब से बुंदेलखंड में हरदौल को देव के रूप में पूजा जाने लगा । तब से हर विवाह का पहला निमंत्रण हरदौल को ही दिया जाता है । मंदिर में पाँडेय जी ने बताया कि यहाँ माँगने से विवाह जल्द होता है , तो बस मैं रजत और कई कुवांरे सबके निशाने पर आ गए । मंदिर परिसर में कुछ लोग गाना बजाना भी कर रहे थे । माँगने वाले तो बहुत ही ज्यादा पर हम देने वालों में से कहाँ ? अगली पोस्ट में चलेंगे राम राज मंदिर और चतुर्भुज मंदिर में । नमस्कार .....
      


हरदौल का मंदिर 

हरदौल

भजन पार्टी 

हुड हुड दबंग 

हेमा जी की गुडिया को आकर्षित करते रंग 

खाने है क्या ?


बकरियां फूल खा रही है 
ये पूरा ग्रुप नहीं है

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Thursday, October 6, 2016

भीमेश्वरी देवी बेरी वाली माता ,हरियाणा Bhimeshwari devi temple Beri , Haryana

प्रस्तुतकर्ता - हरेन्द्र धर्रा

पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा था की हम महम चले गए थे ज्ञानी चोर की बावड़ी देखने । उस पोस्ट को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

महम से वापसी में हम बेरी की तरफ मुड़ गए । बेरी कस्बा दिल्ली से करीब 65 किमी दूर हरियाणा के झज्जर जिले में पड़ता है । ये कस्बा भीमेश्वरी देवी या स्थानीय लोग जिसे बेरी वाली माता कहते है के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है । अब हम आपको बताते हैं भीमेश्वरी देवी की पौराणिक कथा और इस कस्बे का नाम बेरी कैसे पड़ा ।

     माना जाता है कि जब कुरूक्षेत्र में महाभारत युद्ध हुआ तो भगवान कृष्ण के सुझाव पर कुंती ने पांडवों को अपनी कुलदेवी का आशिर्वाद लेने के लिए कहा । तो भीम कुलदेवी का आशिर्वाद लेने और उनको युद्ध भूमि लाने के लिए हिंग्लाज पर्वत जो अब पाकिस्तान में है पर पहुँचे ।वहाँ जाकर वे देवी की आराधना करते है भीम के सब बताने के बाद कुलदेवी उनके साथ मूर्तिरूप में चलने के लिए मान जाती है परंतु एक शर्त रखती हैं कि अगर भीम रस्ते में मूर्ति को कहीं नीचे रख देंगे तो वे आगे नहीं जाऐंगी व वहीं स्थापित हो जाऐंगी । भीम सहर्ष मान जाते हैं और मूर्ति को उठाकर चल पड़ते हैं । जब वे आज के बेरी कस्बे के पास पहुँचते हैं तो उनहे लघुशंका होती है और वे माता की मूर्ति को एक बेरी के पेड़ के नीचे रख कर निवृत होने चले जाते है । जब वे नहा धोकर वापस आकर मूर्ति को उठाने लगते हैं तो माता उन्हे शर्त याद दिलाती हैं और चलने से मना कर देती हैं । तो भीम उनकी आशिर्वाद लेकर वापस लौट जाते हैं । उस समय यहाँ जंगल हुआ करता था और यहीं से कुछ दूर दुर्वासा ऋषि निवास करते थे । उनके आग्रह पर माता अपने स्थान से हटने और उनके बनाए आश्रम में सेवा स्वीकार करने को राजी हो जाती हैं । तब हर रोज ऋषि उनकी जगह बदलने लग जाते हैं और रोज उनकी पूजा करते हैं । युद्ध खत्म होने के बाद रानी गांधारी यहाँ मंदिरों का निर्माण कराती हैं । कहते हैं आज भी वहीं आरती गाई जाती है जो ऋषि दुर्वासा गाते थे और उनकी तरह ही आज भी मूर्ति का स्थान रोज बदला जाता है । रात को उन्हे अंदर वाले मंदिर ले जाते हैं और दिन में माता बाहर वाले मंदिर में विराजमान होती है । यहाँ बेरी का वृक्ष होने के कारण इन्हे बेरी वाली माता कहा गया और भीम द्वारा लाने के कारण इनकी नाम पड़ा भीमेश्वरी । समय के साथ साथ यहाँ लोग बसने शुरू हो गए और कस्बे का नाम उसी प्रकार बेरी हो गया ।
                                                       तो हम उस दिन दोपहर को बेरी पहुँच गए । सबसे पहले जूस का गिलास मारकर खाना खाया गया । फिर पार्क में कुछ समय विश्राम के बाद हमने गूगल मैप को मंदिर ले चलने का आदेश दिया । आदेश मानते हुए गूगल बाबा हमें अंदर वाले मंदिर ले गए पतली पतली गलियों से । मंदिर पहुँचने पर हमें अपनी अपेक्षाओं के अनूरूप सुंदर मंदिर नहीं मिला । क्योंकी हम दोनों ही इतने ज्यादा आस्तिक नहीं थे के वहाँ की आध्यात्मिक खूबसूरती को महसूस कर पाते । हम तो बस वास्तुकला के पुजारी थे तो बस अंदर अधिक भीड़ देखकर माता को बाहर से ही प्रणाम करके निकल लिए । प्रसाद वगैरह हमने लिया ही नहीं था। फिर हम पहुँचे माता के बाहरी मंदिर । ये मंदिर बहुत भव्य बन रहा है और अभी काम चल रहा है । ये मंदिर हमारी यात्रा को सार्थक बना रहा था क्योंकी हमारे लिए मंदिर ही मुख्य आकर्षण था । कुछ समय वहाँ गुजारने के बाद हम वापस चल निकलते हैं घर की और । अब आप भी नीचे वाले फोटो देख लिजिए । जय माता दी ।
भैंसों का स्विमिंग पूल 

नारी शक्ति 

मौसम सुहाना है 

सैम्पल 

रोहतक भिवानी 

लघुशंका क्या सिर्फ भीम को हो सकती है 

आधे रोड़ पर कब्ज़ा 

विद्या विनय पहले देती होगी आजकल तो टीचर को मार भी देते है 

इस तक जाने का रस्ता ही नहीं था 

पहले पेट पूजा फिर माता की पूजा 

सैनी साब 

अन्दर वाला मंदिर 

पार्क में हरयाली और रास्ता 

नया बाहरी मंदिर 

बाहरी मंदिर 

मंदिर निर्माणाधीन है 

Tuesday, October 4, 2016

कुरूक्षेत्र ,हरियाणा Kurukshetra ( Haryana )

प्रस्तुतकर्ता - हरेन्द्र धर्रा

 कुरूक्षेत्र को कौन नहीं जानता । धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र , जहाँ अधर्म पर धर्म की विजय हुई थी । यही वो जमीन है जो महाभारत युद्ध में लाखों करोड़ों वीरों के खून से सन गई थी । तो इसी कुरूक्षेत्र को देखने मैं और नितीश निकल पड़े । 21 अगस्त को सुबह पाँच बजे हम बाईक लेकर निकल चुके थे गाँव से । अंधेरा छंटने तक हम जी टी रोड़ पर चल रहे थे । हाईवे पर जाके नितीश बोला कि यार पता नहीं बाईक भाग नहीं रही । क्यूँ नहीं भाग रही ? ध्यान दिया तो देखा की पिछले टायर में हवा कम है । अब सुबह सुबह कोई हवा वाला नहीं । तो एक पेट्रोल पंप के पास दिखा एक । बस उठा ही था मुंह भी नहीं धोया था उसने  । पहले उसने झाडू लगाया । फिर हवा बना कर टायर में भरी । हवा भरते वक्त नितीश बोला कि भाई दूर जाना है ठीक सी कर दियो । अब मेरे हिसाब से तो ठीक सी का मतलब होता है कि जितनी आए उतनी कर दे । मैं मन में सोच रहा की यार कहीं इसने ज्यादा ना कर दी हो । कहीं स्पीड में टायर फट के हम रोड़ पे ना पहुँच जाए । लेकिन मेरे सोचने से क्या होता है । मेरा सोचा होने लगता तो अब तक तो धरती पर कई बार प्रलय आ चुकी होती ।

हवा भरवा रहा है 

सुप्रभात 
  
    पानीपत से कुछ पहले कुछ पहले एक जगह रूके । तो मेरा ध्यान एक मीनार पर गया रोड़ के दूसरी तरफ । पास जाकर देखा तो पता चला की ये शेर शाह सूरी द्वारा बनवाई गई कोस मीनार है जो अभी तक बची हैं । इनको उस समय मार्ग चिन्हित करने के लिए हर कोस पर बनाया गया था । अभी भी कई राज्यों में , बल्कि पाकिस्तान में भी ये बची हुई हैं । हमें कुरूक्षेत्र तक रस्ते में दो तीन और कोस मीनारें नजर आई । एक कोस मीनार दिल्ली चिड़ीयाघर में भी है । पुरातत्व विभाग अब इनका संरक्षण करता है ।




    करीब आठ बजे हम कुरूक्षेत्र पहुँचे । कुरूक्षेत्र का नाम राजा कुरू पर पड़ा । एक पौराणिक कथा के अनुसार राजा कुरू नें इस जमीन को बार बार जोता । इंद्र द्वारा इस परिश्रम का कारण पूछने पर कुरू नें कहा की जो भी यहाँ मरेगा वो पुण्य लोक जाएगा । पर इंद्र ने उनका परिहास कर ये बात और देवताओं को भी बताई तो सब देवताओं ने कहा की कुरू को अपने अनुरूप किजिए वरना लोग बिना हमारा भाग दिए यज्ञ करते सीधे स्वर्ग लोग चले जाएँगे । तब इंद्र ने कहा कि हे राजन आप व्यर्थ ही परिश्रम करते हैं । इस भूमि पर जो भी अन्न त्याग कर या युद्ध में प्राणों का त्याग करेगा वह स्वर्ग लोक का वास करेगा ।
                 तो हम सबसे पहले ब्रह्म सरोवर की तरफ चले । ब्रह्म सरोवर से कुछ पहले नवीन जिंदल द्वारा स्थापित भगवान कृष्ण की बहुत सुंदर प्रतिमा है । इसको रूक कर देखे बिना किसी का निकल जाना संभव नहीं । पार्किंग में बाईक खड़ी कर हम सरोवर पर पहुँचे । ब्रह्मसरोवर कुरूक्षेत्र में थानेसर में पड़ता है । थानेसर जगह का नाम भगवान शिव की वजह से पड़ा है । यहाँ भगवान शिव को स्थाणु कहा गया है । यहाँ स्थापित होने के कारण इस जगह का नाम स्थाणेश्वर पड़ा जो बाद में अपभ्रंश होकर थोनेसर हो गया ।ब्रह्म सरोवर 1800 गुणा 1400 फुट में फैला है । सरोवर को बीच में से रस्ता बनीकर दो भागों में बांटा गया है जो पुल के नीचे से जुड़े हुए हैं । ब्रह्म सरोवर कुरूक्षेत्र का मुख्य आकर्षण है । इस सरोवर का जल व घाट बहुत साफ सुथरे थे । महिलाओं के लिए बंद घाट बनाए गए हैं । सरोवर के बीच में पार्क भी है । पार्क में गीतोपदेश देते कृष्ण व अर्जुन की बहुत बड़ी मूर्ति भी बनाई गई है जो रथ पर सवार हैं । उसके दूसरी तरफ श्याम जी का मंदिर और चंद्रकूप भी है । यहीं पर बर्बरीक का कटा सर रखा गया था । और यहीं पर द्रोपदी ने अपने केश रक्त से धोकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की थी । ब्रह्म सरोवर में स्नान करने से अश्वमेघ यज्ञ जितना पुण्य मिलता है ऐसा माना जाता है । पर हम दोनों ने फल की चिंता न करते हुए स्नान किया और चल निकले सन्निहित सरोवर की तरफ ।
नविन जिंदल द्वारा लगवाई गयी मूर्ति 


साफ़ पानी और घाट 

सैनी साब 

यहीं पर द्रोपदी ने प्रतिज्ञा पूरी की थी 




घाट 








ये पार्क सरोवर के बीच में है 



  सन्निहित सरोवर ब्रह्म सरोवर से आकार में छोटा है । परंतु उससे अधिक पवित्र मान जाता है । विश्वास है कि ब्रह्म सरोवर भी पहले सन्निहित सरोवर का ही अंग था । इस तीर्थ पर सभी देवी देवताओं के मंदिर हैं । जिनमें लक्षमी नारायण मंदिर प्रमुख है । महाभारत में इसका वर्णन इस प्रकार है -
                     'मासि मासि नरव्याघ्र संनिहत्यां न संशयः तीर्थसंनिहनादेव संनिहत्येति विश्रुता।


 अर्थात् हर महिने की अमावस्या को पूरी पृथ्वी के तीर्थ इस सरोवर में सन्निहित होते हैं । और इसी लिए इस सरोवर का नाम सन्निहित सरोवर पड़ा । महाभारत युद्ध के पश्चात पांडवो नें यहीं पर अपने प्रियजनों का पिंड दान किया था ।
      सन्निहित सरोवर के पास ही श्री कृष्ण  संग्राहलय  और विज्ञान संग्रहालय भी है । यहाँ से हम सीधे वहीं पहुँचे । पूरी कुरूक्षेत्र यात्रा में सबसे अधिक आनंद मुझे तो इन  संग्राहलय  में ही आया । विज्ञान केंद्र में विज्ञान से संबंधित चीजें है । अन्य जगहों की तरह सिर्फ देखने के लिए नहीं बल्की यहाँ देखने के साथ कुछ चीजें आप करके भी देख सकते हैं । कृष्ण संग्राहलय केवल भगवान  कृष्ण को समर्पित है । यहाँ फोटो नहीं खींचने दे रहे थे । लेकिन टिकट  से अधिक  पैसे वसूल हो जाते हैं यहाँ भी । यहाँ तीन तल हैं पहले में पुरानी मूर्तियाँ शिलालेख हैं  । दूसरे पर पेंटिंग्स हैं और तीसरे पर मल्टिमीडीया गैलरी है ।




सन्निहित सरोवर 




विज्ञानं केंद्र के बाहर 

हड़प्पा काल के खिलोने 

हड़प्पा काल के खिलोने 

मोहर 

दोनों लोहार हैं 

सुश्रुत के औजर 







फोटो लेने वाला गायब 

नितीश का सर प्लेट में 


    यहाँ से निकलने के बाद हमने रुख किया भीष्म कुंड का । भीष्म कुंड ब्रह्मसरोवर से करीब छह किमी दूर नरकाटारी नाम के गाँव में पड़ता है । यहीं पर अर्जुन ने तीर मारकर धारा निकाली थी और भीष्मपिता की प्यास बुझाई थी । यहाँ एक छोटा सा तालाब और एक मंदिर है । यहाँ के बाद हमारा लक्ष्य था भोर सैंयदा नाम का गाँव जो करीब बीस किमी दूर था । यहाँ हमारे लिए आकर्षण का केंद्र था क्रोकोडाईल फार्म । तो हम सीधे ऊधर ही निकल लिए । छोटी छोटी सड़कों गाँवो से निकलते हुए हम वहाँ पहुँचे । पर ये क्या यहाँ ना तो बंदा था कोई और ना मगरमच्छ की जात । बल्कि बोर्ड और लगा था कि अंदर आना मना है । और ये कोई चिड़ियाघर नहीं है । हम अंदर घुसे फिर भी । पर कोई मगरमच्छ नहीं दिखा । खामाखाह चालीस किमी की घुमाई हुई । तो वापस कुरूक्षेत्र की तरफ रोड़ पर चढ़ लिए । रास्ते में ज्योतिसर पड़ता है । ज्योतिसर ही वो जगह है जहाँ भगवान कृष्ण ने गीता उपदेश दिया था । ज्योतिसर में भी एक छोटा सा सरोवर है । एक प्राचीन शिव मंदिर भी है । यहाँ अभी भी उस बड़ वृक्ष के उपवृक्ष (पेड़ की दाढ़ी से बने ) हैं जिसके नीचे गीता उपदेश दिया गया था ।



भीष्म कुंड 

कोई मगरमच्छ नहीं 



ज्योतिसर 
ज्योतिसर में 
                                  
और सबसे आखिर में हम पहुँचे शेख चिल्ली के मकबरे पर । ये एक किले की तरह ही है । शेख चिल्ली शाह जहाँ के बेटे दारा शिकोह का धर्मगुरू था । शेख चिल्ली शेखी बघारने के लिए भी मशहूर था। मकबरे के बीच में उद्यान भी है । मकबरे के पीछे ही राजा हर्षवर्धन का टीला भी है जहाँ सीधे मकबरे से ही जा सकते हैं । मकबरे की शिल्प भी बहुत अच्छा है । यह कुछ कुछ ताजमहल की तरह भी है ।  इसका उद्यान भी ताजमहल के उद्यान की तरह ही है ।यहाँ पर भी एक  संग्राहलय  यह मकबरा काफी बड़े एरिये में फैला है और हमें वापस भी चलना था तो बिना ज्यादा समय लिए हम वापस निकल पड़े गाँव की ओर ।  ये पोस्ट बहुत जल्दी खत्म करनी पड़ी जैसे जल्दी जल्दी यात्रा की थी । इस बात के लिए माफी चाहूँगा ।  





पीछे हर्ष का टीला है 

दो प्रेमी तो यहाँ अभी भी घुसे गप्प मर रहे थे 










                                धन्यवाद