Friday, February 6, 2015

एन सी सी कैंप ( कुफरी,हिमाचल प्रदेश ) जुलाई 2007 भाग -2

प्रस्तुतकर्ता : हरेन्द्र धर्रा

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गतांक - रात को करीब एक डेढ़ बजे हम कुफरी पहुंचे I कुफरी  शिमला से 13 किमी दूर है l जब तक शीशे बंद थे तब तक फरक था लेकिन जब हम नीचे उतरे तो क्या जबरदस्त ठण्ड लग रही थी I ये मेरी पहली पहाड़ी यात्रा थी I जून में सर्दी के एहसास ने रोमांच भर दिया था I एक पेड़ पर पास ही में कुछ लगा था खट्टा खट्टा सा I हम कहने लगे आडू हैं I आडू का नाम सुनकर किसी ने नहीं खाया I फोजियों ने हमें टेंट दिखा दिए , और हम थके हारे से पड़ते ही सो गए I

अब आगे - सुबह जब हम उठे और फ्रेश होने के बाद बाहर बैठे तो बाहर का नजारा देखा ! बिलकुल स्वर्ग के जैसा I हमारे बैरिक उतराई पे थे थोड़ी सपाट जगह भी थी I नीचे घाटी में बादल मंडरा रहे थे जैसे पहाड़ तैर रहा हो I सूरज निकलने के बाद बादल ऊपर उठ गए I हमने फिर एक फोजी से पूछ लिया की “ उस पेड़ पर वो खट्टे खट्टे क्या लगे है ?” उसने बताया की “सेब !“ I  बस फिर क्या था ,थोड़ी देर में ही सारी सेब साफ़ !

                                             लड़कियों का भी कैंप तो साथ था लेकिन कोई नजर नहीं आई क्योंकि उनके और हम लड़कों के बीच दस फुट की तिरपाल की बाड़ जो बना राखी थी जहाँ सीनियर डिविजन के कैडेट दिन रात पहरा देते थे  I हमें लड़कियां दिखी दसवे दिन ,जिस दिन हम वापस आये I

हमें सुबह छेह बजे तक नहाना पड़ता था अगर कोई रह गया तो रह गया I शाम का बहार बनी टंकी का ठंडा पानी और ठंडी हवाएं और खुले में नहाना I दस दिन में मैं शायद छह या सात बार ही नहाया होंगा I  
नहाने के बाद सात बजे तक नाश्ता कर लेना होता था I कोई रह गया तो रह गया I आठ बजे सब इकट्ठे होते और फिर हमें घुमाने ले जाते अगर थोडा दूर होता तो दोपहर का खाना पैक कर के देते थे I

उस समय लगभग हममें से किसी के पास भी फोन नहीं था और न ही मनोरंजन का कोई और साधन I जिन्दगी में पहली बार डिजिटल कैमरा देख कर हम हैरान रह गए जो एक सीनियर के पास था l बार बार अपने फोटो खिचवा खिचवा कर देख रहे थे उसमे  हमारे बैरिक में रेवाडी  वाले भी थे जिनमे से एक लड़के की आवाज बहुत सुंदर थी I रोज रात को उससे गाने सुने जाते थे बहुत मजा आता था I शाम को वोलिवाल वगरह खेल लेते थे बातें करते रहते थे l काश फोन न बना होता ! अगर बना होता तो सिर्फ कॉल वाला होता I फेसबुक ट्विटर ने दुनिया वाले तो पास ला दिए पर पडोसी ,दोस्त ,परिवार दूर कर दिए l मैं भी कहाँ ,किन बातों में घुस गया , चलिए वापस कुफरी चलते है

कुफरी शिमला की अपेक्षा शांत है I और शायद सुंदर भी I कुफरी में सर्दियों में स्कीइंग होती है I वैसे गर्मियों में भी कम नज़ारे नहीं होते I उन दिनों बारिश भी बहुत हो रही थी I इस पहाड़ पे हो रही है उस पे धूप है उस पे बारिश है यहाँ धुप है  ,कमाल है I  

कुफरी में स्कीइंग 50 के दशक में शुरू हुई थी जब श्रीमती इंद्रा गाँधी ने हिमाचल विंटर स्पोर्ट्स क्लब की स्थापना की थी I तब से कुफरी के दिन पलट गए I यहाँ इंद्रा गाँधी के नाम से एक पार्क भी है जहाँ टिकट लगती है I वैसे हम तो दीवार फांद कर घुस गए I बहार निकलते वक्त हमसे टिकट पूछा गया तो हमने कहा भाई हमने तो फेंक दिया की अब इसकी क्या जुररत है I चलो कोई नहीं हम वापस उठा लेट है I और वापस जाकर फिर दीवार से बहार कूद गए I एक छोटा सा जू भी है कुफरी में I वह भी हरयाणवी मलंगो ने एक टूटे हुए बाड़े से घुस कर देख लिया बिना टिकट के I
कुफरी में बर्फ के ऊँट यानि के याक की सवारी आनंद भी ले सकते हैं आप I अगर आप सवारी करने के साथ साथ खुद के कैमरे से फिल्म बनाते है तो भी सवारी से अलग पैसे देने पड़ेंगे I जब हम महासू पीक पर घूम रहे थे तो ऊपर लाउड स्पीकर पे गाना बज रहा था ‘कभी कभी आस पास चाँद रहता है ‘ I और वो मुझे इतना अच्छा लगा की आज तक मेरा फेवरिट है I

             एक दिन हमें शिमला ले कर गए I शिमला पहले अंग्रेजो के राज में भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करता था I शिमला को पहाड़ों की रानी के नाम से भी जाना जाता है और ये हिमाचल का सबसे महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र है I 2397 मि० की ऊंचाई पर स्थित शिमला का नाम देवी श्यामला के नाम पर पड़ा है I

          शिमला में हम पहले एन सी सी के ऑफिस गए और फिर जाखू मंदिर में I यह मंदिर भगवन हनुमान को समर्पित है I चोटी पर बने मंदिर से शिमला का बड़ा खूबसूरत नजारा दिखता है I मंदिर में दर्शन के बाद हम लोगों को ले जाया गया राज्य संग्राहलय में l यहाँ पर पुरानी एतिहासिक मुर्तिया और पेंटिंग्स के आलावा पुराने ज़माने के हथियार और बंदूके देखी I

           म्यूजियम देखने के बाद हम रवाना हुए राष्ट्रपति निवास के लिए I ये महल भारत के वायसराय के लिए अंग्रेजो ने 19 वीं शताब्दी के अंत में बनाया था I बहुत ही शानदार भवन है ये I इसकी बहुत अच्छी देखभाल के कारन ये बहुत अच्छी हालत में है I अंदर पूरे भवन में लकड़ी का बेहतरीन काम किया गया है I छतों पर पाइपों का जाल सा है जिनमे छेद है जो मोम से बंद है जो आग लगने की स्थिति में बहुत अच्छा काम करेंगे I वाकई बड़े दिमाग का काम है I बहार लॉन में घास के नीचे जाल है जिसमे से बारिश का पानी नीचे बने टैंक में चला जाता है I सिविल इंजीनियरिंग का छात्र होने के नाते आज मैं इतनी अच्छी इंजीनियरिंग के लिए उन इंजिनियरो को साधुवाद देता हूँ  I आज कल इस ईमारत को इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडीज के तौर पर इस्तेमाल करते है l हमें सारी ईमारत दिखने के बाद फोजी ने कहा दस दस रुपए निकालो I दस दस रूपए ? वो किस बात के ?  तो हमें बताया की राष्ट्रपति निवास देखने के लिए टिकट लगती है I तो हमने कहा की पहले क्यूँ नहीं बतया I तो जवाब मिला की पहले बताते तो हमें पता है तुम दस रुपए के लालच में इतनी सुंदर ईमारत नहीं देखते I वैसे सच बात थी हम उस समय दस रुपए में अंदर जाने की बजे कुछ खाना पसंद करते I धन्यवाद उसका जो इतना दिमाग लगाया I  फिर हमको रिज पर ले जाया गया I एक दो घंटे बाद हम वापस कुफरी के लिए रवाना हो गए I

       दस दिन वहां बिताने के बाद घर आने का मन भी नहीं कर रहा था I लेकिन आना तो था ही I दसवे दिन शिमला और कुफरी को फिर आने का वादा करके अपना अपना सामान समेट कर घर  की तरफ हो गए I

समाप्त 
मैं बाये तरफ नीचे बैठा हूँ 

Tuesday, February 3, 2015

एन सी सी कैंप ( कुफरी,हिमाचल प्रदेश ) जुलाई 2007

 प्रस्तुतकर्ता : हरेन्द्र धर्रा
   
   ये यात्रा संसमरण तब का है जब मैं नोवीं क्लास में पढ़ता था |मैंने स्कूल में एन सी सी ( राष्ट्रीय कैडेट कोर ) ले रखी थी जिसके तहत दुसरे वर्ष में एक कैंप अटेण्ड करना होता था जो सबके लिए अनिवार्य होता था | ये कैंप दस दिन का होता था | इसमें सभी कैडेट को जाना होता था | लेकिन इसके आलावा एक और कैंप लगता था जिसमे की परेड या प्रक्टिस नहीं करनी होती थी ये सिर्फ पर्यटन के लिए होता था |
           तो इसमें मेरा नम्बर भी पड़ गया | मेरे आलावा मेरे गाँव से तीन लड़के और दो लडकियों को भी जाना था | लडको के नाम थे - गुलाब,कृष्ण,और तीसरे का नाम पक्का याद नहीं , चलिए अपने पास से अनिल रख लेते है | वैसे हमको नहीं पता था की लडकियां भी जा रही है | 29 जून को निकलना था | हमें सुबह सात बजे तक रोहतक एन सी सी ऑफिस में पहुचने को कहा गया था | हम रोहतक पहले कभी बिना किसी बड़े के साथ नहीं गए थे | फिर भी हम समय से पहले रोहतक पहुँच गए |
            पर रोहतक तो पहुँच गए पर ऑफिस कहाँ है ये कोई नहीं जनता था हमें तो हमारे मास्टर ने बस ये कहा था की डी पार्क पर उतर लेना और वहां पूछ लेना | हमने एक से पूछा तो उसने एक गली की तरफ इशारा कर दिया | हम चल दिए गली की तरफ  काफी दूर जाने पर भी कुछ काम का नहीं मिला तो एक से फिर पूछा उसने कहा वो तो साथ वाली गली में था | सत्यानाश ! वापस आकर दूसरी गली में गए तो वहां भी यही हाल हुआ | वापस डी पार्क पर निराश होकर आ गए | एक पर्ची पर मास्टर जी का नंबर लिखवा कर लाए थे तो एक एस.टी.डी. पर जाकर फोन मिलाया तो सर ने पूछा इस वक़्त तुम कहाँ हो ? तो हमने कहा की सर हम तो डी पार्क पर जो गाँधी की मूर्ति लगी है उसके पिछली तरफ जो एस.टी.डी. है उसमे से बात कर रहे है | तो सर ने कहा के एक दुकान छोड़ कर जो गली है उसमे जाओ ! वहां मोड़ पर ऑफिस है |                                तो इस तरह हम ठिकाने पर पहुंचे | हम तो सोच रहे थे की हम लेट है पर वहां तो कुछ ही बच्चे थे | बाद में सर हमारे स्कूल की उन लडकियों को भी ले कर पहुँच गए | तब हमें पता चला के लड़कियां भी जा रहीं हैं | खैर हमने जून के महीने में जर्सी और गर्म बनियान और मोटे मोटे कम्बल इशू करवाए और दोपहर 11 बजे हम बस में बैठ कर रोहतक से चल पड़े |
जब हम रोहतक से चले थे , तब सारे के सारे गर्मी से बेहाल थे | आधे लड़के तो शर्ट निकाल बनियान में ही बैठे थे | मैं और गुलाब दोनों एक सीट पर बैठे थे क्योंकि एक या दो सीट कम पड़ रही थी | इतना लम्बा रस्ता और एक सीट पे दो लोग ! बड़ी नाइंसाफी थी सो दो तीन घंटो बाद मैं उठा और जो ए.एन.ओ. (मास्टर) हमारे साथ जा रहा था उससे शिकायत की, उसने कहा ड्राईवर वाले कैबिन में जा ! मैं जाकर ड्राईवर वाले कैबिन में गया और ड्राईवर से कहा की उस्ताज मैं तो सोऊंगा ! ड्राईवर अ.एन.ओ. को बोला के जी ये बंदा यहाँ काम नहीं देगा | तभी एक सीनियर डिविजन के लड़के ने कहा के भाई तू मेरी सीट पे आजा हम पीछे बैठ के ताश खेलेंगे | भूखा क्या मांगे ? रोटी ! मैं झट से बैठ गया |
                      करनाल पहुँचने के बाद बस रोकी गयी झिलमिल ढाबे पे | बस नाम का ढाबा था , सारी सुविधाएँ थी | बस रुकी तो इतने सारे कस्टमर देख कर ढाबे वाले भी खुश हुए ,लेकिन ये ख़ुशी क्षणिक ही थी पहले सारे बच्चे बाथरूम में घुसे फ्रेश होकर हाथ मुंह धो कर कुछ तो वापस बस में बैठ गए और कुछ पेप्सी वगरह लेके अपने अपने परांठे निकाल खाने लगे | ढाबे वाले का कम से कम एक दो लीटर खून तो जरूर फूंका होगा हमने |
                     बस फिर चल निकली | अब तक अँधेरा हो चुका था , एक ढाबे पर बस फिर रुकी | पर इस वाले की खूब कमाई करवाई  गयी | वो ढाबा ढलान के पास था और थोड़ी दूर से ट्रेन गयी l जिन्दगी में पहली बार कालका शिमला ट्रेन देखी , पर अँधेरे में क्या खाक देखी | रात को रस्ते में एक शहर चमकता दिख रहा था l सीनियर ने बताया ये शिमला है | रात को करीब एक डेढ़ बजे हम कुफरी पहुंचे | जब तक शीशे बंद थे तब तक फरक था लेकिन जब हम नीचे उतरे तो क्या जबरदस्त ठण्ड लग रही थी | ये मेरी पहली पहाड़ी यात्रा थी | जून में सर्दी के एहसास ने रोमांच भर दिया था | एक पेड़ पर पास ही में कुछ लगा था खट्टा खट्टा सा | हम कहने लगे आडू हैं l आडू का नाम सुनकर किसी ने नहीं खाया |  फोजियों ने हमें टेंट दिखा दिए , और हम थके हारे से पड़ते ही सो गए |
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