Monday, September 21, 2015

शिमला के फोटो ( shimla photos )

17 जुलाई 2015 ! मैं और भूपेन्द्र निकल पड़े श्रीखंड महादेव के लिए ! बड़ी रिसर्च की श्रीखंड के बारे में बड़ी मुश्किल से समिती वालों का नम्बर भी ढूंढ़ा !
     शाम को शिमला पहुंच चुके थे और सुबह रामपुर की बस पकड़नी थी ! सुबह अखबार में पढ़ा कि उस इलाके में बादल फट गया तो वही पे प्रोग्राम कैंसिल कर दिया और एक रात और गुजारकर वापस आ गए ! शिमला के बारे में मैं पहले ही लिख चुका हूं इस पोस्ट में फिर भी आप फोटो तो देखिए !!!




 

 

 

 

 

 

 

Friday, March 6, 2015

ताज महल , आगरा (TAJ MAHAL , AGRA )

प्रस्तुतकर्ता – हरेन्द्र धर्रा

काफी दिन से या यूँ कहिये कि कई वर्षों से इच्छा थी कि एक बार , पूरी दुनिया में भारत को एक अलग पहचान देने वाले , अद्भुत प्रेम की निशानी , दुनिया के सात अजूबों में से एक , बेहतरीन कारीगरी की मिसाल , बेहतरीन वास्तुकला के उदाहरण ताजमहल को प्रत्यक्ष आँखों से देख कर आए | डिस्कवरी या नेशनल ज्योग्राफिक चैनल पर जब कोई प्रोग्राम आता या कोई अपने आगरा के अनुभव बताता या फिर कहीं ताज की तस्वीर दिख जाती तो इच्छा और प्रबल हो जाती | वैसे कई बार योजना बन चुकी थी , लेकिन सिरे कोई नहीं चढ़ पाई थी | वैसे भी हम सलमान खान तो है नहीं के एक बार जो कमेन्टमेंट कर दी फिर अपने आप की भी न सुनु ? सबकी सुननी पड़ती है वो भी कान खोल कर |
                         अबकी बार इच्छा ने पूरा जोर मारा पूरी एडी से चोटी तक , तो फरवरी में जाने की बात हुई | कहीं ये भी योजना ही न रह जाये इसलिए हम ने आरक्षण करा लिया | जाने का भी , आने का भी , ताज की टिकट भी ऑनलाइन करा ली थी | अब तो कैंसिल होने से रहा  प्रोग्राम | मैं और नितीश जाने वाले थे लेकिन नितीश का एक दोस्त भी चलने को तैयार हो गया था | तो तीन लोगो की टिकट हो चुकी थी | हमारी योजना थी कि २१ को शाम को निकलेंगे २२ को सुबह तीन चार बजे पहुँच जाएँगे  ताज देखकर दोपहर साढ़े तीन की ट्रेन है उससे वापस आ जाएँगे | २३ को मैं ट्रेक्टर चला पाउँगा और वो दोनों ऑफिस चले जाएँगे |
                              जाने से कई दिन पहले मेरे भाई का फोन आया की गो आइबिबो वाले एक हजार का कूपन दे रहें हैं साइन अप करने पर | झट से आईडी बनाइ और आगरा में होटल देखा | एक होटल में रूम था एक हजार रुपए में , कर दिया बुक | होटल मुश्किल से 50 मीटर दूर था ताज महल से | वैसे तो हजार रुपए बहुत होते हैं लेकिन हमारी क्या जेब से निकाल रहे थे ? तो अब इन्तजार था २१ तारीख का | हमारी ट्रेन रात को 11 बजे निजामुद्दीन से थी | नितीश और राहुल का ऑफिस पीरागढ़ी था और निजामुद्दीन वाली ट्रेन शकूर बस्ती से शाम को जाती है | तो मैं अपना ट्रेक्टर का काम पूरा करके शाम को शकूर बस्ती पहुँच गया और उधर से वो दोनों ऑफिस से थोडा जल्दी छुट्टी लेकर आ गए | समय से पहले हम निजामुद्दीन पहुँच गए थे | इधर उधर घूम कर ,पुराने किस्से याद करके हमने समय काट लिया |
                                     निरधारित समय पर गाड़ी आ गयी | एक लड़का कोई पंद्रह सोलह साल का पैरों को घसीटता हुआ नीचे फर्श पर आ रहा था और पैसे मांग रहा था , मेरे पास आया तो मैंने मना कर दिया | मैं क्यों की लास्ट वाली सीट पे बैठा था और आगे कोई सीट नहीं थी ,वो खड़ा हुआ , जी हाँ ! वो लड़का जो पैरो से लाचार था खड़ा हुआ और जाकर बहार निकाल गया | बड़ा अच्छा एक्टर था | कुछ रहम दिल वालों को ठग के ले गया था वो | मेरी और नितीश की सीट एक बर्थ में थी और राहुल की दुसरे में | नितीश के पास वाली सीट पर जो लड़का बैठा था हमने उससे कहा की हमारी एक सीट दुसरे डिब्बे में है तो हमारा दोस्त यहाँ बैठ जायेगा आप वहां चले जाइये | उसने कहा की ये मेरी सीट नहीं है | कोई बात नहीं , वहां एक और भी बैठा था हमने उससे भी यही बात की तो बोला के ठीक है | पर थोड़ी देर बाद एक जना और आया और तब पता चला के सीट का असली मालिक तो ये है | हमने उससे बात नहीं की | दो तीन घंटे की तो बात थी | राहुल नितीश एक सीट पर ही बैठ गए | निर्धारित समय पर हम आगरा पहुँच गए |
                                    बाहर आकर ऑटो किया और होटल की तरफ चल पड़े | होटल के पास जाकर ऑटो वाला बोला की आपका रूम बुक है तो ही जाना नहीं तो न तो अभी रूम मिलेगा और बाहर घूमोगे तो पुलिस वाले तंग करेंगे | हमने पूछा की क्यों तो बोला की ताजमहल के बिलकुल पास में रात को किसी को घूमने नहीं देते और आपका होटल बिल्कुल पास में है ताज के | हमने कहा के हमारा रूम बुक है | वो बोला के तब तो ठीक है l हम तीन बजे होटल के बाहर थे | दरवाजा खटखटाया तो एक लड़का बाहर आया | हमने कहा की हमारा कमरा है ,तो उसने कहा की भाई कमरा खाली नहीं है | हमने कहा की नहीं भाई हमने तो पहले से बुक करवा रखा है | तो वो बोला भाई कुछ भी हो रूम नहीं है | काफी देर तक राहुल उससे भिड़ा रहा | लेकिन कोई वो कहता रहा की दस बजे से पहले कोई रूम नहीं है बुक कर रखा है तो जहाँ से किया था वहां जाओ | कोई फायदा नहीं हुआ तो उसने कहा चाहो तो गार्डन में बैठ जाओ | गार्डन में एक छोटा सा रेस्टोरेंट था | कुर्सियां सीधी की और बैठे कर ही मेज पर सो गए l राहुल बार बार हमें दुत्कार रहा था | लेकिन हमारे मन में तो ये था की कम से कम बैठने को तो जगह मिल गयी | फिर जब कुछ रौशनी सी हुई तो एक कपल एक रूम खाली कर के गया | हमने उस लड़के से जो हमें चोकीदार लग रहा था | हमने कहा की भाई अब तो रूम खाली हो गया अब तो दे | उसने कहा की नहीं अभी नहीं दस बजे | लेकिन थोड़ी देर बाद उसने साफ़ करके और चादर बदल कर हमें रूम दे दिया | वैसे भी उनका चेक इन का समय १० बजे था पर उसने हमें ५ बजे रूम दे दिया | मैं सोया नहीं बल्कि फ्रेश होकर बहार निकल गया |
                                            टिकट तो हमारे पास थे ताज के लेकिन ऑनलाइन टिकट में सिर्फ तीन घंटे का समय होता है | हमारा नो से बारह तक था | जबकि काउंटर से ख़रीदे टिकट का समय पूरे दिन का होता है | मैं चाहता था की सूर्योदय हम ताज परिसर में ही देखें  मैं साढ़े पांच बजे जाकर लाइन में लग गया | टिकट मिलने का समय था साढ़े छे बजे का | साढ़े पांच बजे भी मुझसे आगे कई लोग थे | खैर साढ़े छे बजे काउंटर खुला और मेरा नम्बर आया तो मैंने सौ का नोट दिया उसने फेंक कर वापस कर दिया की खुल्ले लाओ | यार जब हैं ही नहीं तो कहाँ से लाऊं खुल्ले ? मैंने कहा चालीस रुपए तू रख पर मुझे टिकट दे | साथ वाली लाइन में जो लड़का था वो हंस पड़ा और सारा मामला गलत करा दिया | वो और भड़क गया शायद बेइज्जती महसूस कर गया जबकि मेरा ऐसा इरादा नहीं था | मुझे मेरा एक घंटा पानी में जाता लग रहा था की एक लड़का साइड से आया और बोला भाई दो टिकट मेरी भी ले दो ना | अब मुझे पांच टिकट मिल गयी | दो उस भाई को दी और उसने मेरा धन्यवाद किया और मैंने उसका |
                                 फिर मैं भाग के होटल गया और नितीश को जगाया | राहुल ने कहा की वो नहा के आएगा | तब तक रिसेप्सन पे वोही लड़का जो हमें चौकीदार लग रहा था नहा धो के बैठा था | असल में वो मनेजर का लड़का था | उसने फार्म भरवाया आईडी प्रूफ की कॉपी लगा के साईन वगरह करवाए | फिर हम दोनों ताजमहल की तरफ चल पड़े | काफी लम्बी लाइन थी | देशी से अधिक विदेशी पर्यटक थे |  लेकिन उनकी लाइन अलग थी | मन में काफी उत्सुकता थी | उस बेहतरीन ईमारत को देखने की जो मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने अपनी तीसरी पत्नी अर्जुमंद बानो जिसका दूसरा नाम मुमजाज अधिक प्रचलित है , की याद में बनवाई थी | अजीब बात है प्रेम की मिसाल माने जाने वाली इस जोड़ी का अजीब सत्य ये भी है की मुमताज शाहजहाँ की तीसरी पत्नी थी परन्तु आखिरी नहीं | क्योंकि मुमताज के बाद भी उसने छे विवाह और भी किये थे | मुमताज शाहजहाँ की सोतेली माँ नूरजहाँ के भाई की लड़की थी | हुई तो एक तरीके से मामा की लड़की ही न | पर छोड़िये हमको उनकी रिश्तेदारी में घुसकर क्या करना है ? चिड़िया की आँख पर फोकस करते है | मुमताज हर लड़ाई में या दौरे पर शाहजहाँ के साथ जाती थी | सन १६३१ में जब शाहजहाँ दक्कन के विद्रोह को दबाने के अभियान पर था | तो रस्ते में बुरहान पुर में अपनी चोहदवीं संतान को जन्म देते समय मुमताज की मृत्यु हो गयी |  उस समय उसे वहीँ दफना दिया गया था बाद में उसके अवशेषों को ताज महल में लाया गया था  | अपनी सबसे प्रिय रानी की याद में दुनिया का सबसे शानदार मकबरा बनाने की चाहत ने ही दुनिया को ये नायाब तोहफा दिया |  सन १६३२ में ताजमहल का निर्माण शुरू हुआ और बीस वर्षों में बीस हजार लोगो की मेहनत ने इस सपने को मूर्त रूप दिया | सन १६५२ में ये बन कर तैयार हुआ था | जब ताज को बनाया गया तो उस समय इसमें चार करोड़ रुपए लगे थे जब सोने का मूल्य पंद्रह रुपए तौला था | तो विचार कर के देखिये की जनता पर टैक्स का कितना बोझ बढ़ा होगा | कहते है शाहजहाँ ने उन सब कारीगरों के हाथ कटवा दिए थे ताकि वे दूसरा ताज न बना सके | मुझे थोडा संदेह है इस बात पर |
                                खैर जो भी हो एक दो घंटे हम पूरा परिसर घूमने और थोड़ी बहुत वाहवाही करने के बाद हम वापस होटल में गए और खाना खाकर वर्ल्ड कप का भारत बनाम दक्षिण अफ्रीका का मैच देखने लगे | मैच ख़तम करके हम निकल पड़े ताज नेचर वाक् की तरफ | काफी बढ़िया जगह है | पेड़ों के बीच से ताज को देखना काफी अच्छा लगा | शाम को हम आगरा छावनी रेलवे स्टेशन पर थे | हमारी ट्रेन का समय तो दोपहर तीन का था पर हमें पता था की वो रोज चार पांच घंटे लेट होती है तो कोई जल्दी नहीं थी हमें | लेकिन आज तो ट्रेन को जैसे हमसे दुश्मनी हो गयी थी |  छे घंटे लेट , आठ घंटे लेट , दस घंटे लेट | राहुल फिर शुरू हो चुका था की यही ट्रेन मिली थी अगेरा वगेरा | मैं तो जा रहा हूँ | जा भाई ! तेरी यात्रा मंगलमय हो | वो दूसरी ट्रेन में चला गया | भगवान कसम इतनी ख़ुशी मुझे ताज देख कर नहीं हुई थी जितनी राहुल के जाने से हुई |
                             ट्रेन को देखा तो एक एक घंटा करके बारह घंटे लेट आई | चलो आ तो गयी | हमारी मंजिल तक पहुँचते पहुँचते ट्रेन सोलह घंटे लेट हो चुकी थी | मैं तो संकल्प कर चुका था की तूफ़ान एक्सप्रेस में कभी नहीं चढूँगा | अगला दिन ट्रेन की भेंट चढ़ चुका था | न मैं काम कर पाया और ना नितीश ऑफिस जा पाया |

 समाप्त : अब कुछ चित्र देखिये  
ताज परिसर का दरवाजा 
ताज परिसर में सूर्योदय 
ताजमहल का एक शानदार नजारा
बेहतरीन ड्रेनेज सिस्टम 
ताज के चबूतरे से चारबाग का नजारा 
ताजमहल का एक चित्र 
ताज नेचर वाक़  से दिखता ताजमहल का बेहतरीन नजारा 

Friday, February 6, 2015

एन सी सी कैंप ( कुफरी,हिमाचल प्रदेश ) जुलाई 2007 भाग -2

प्रस्तुतकर्ता : हरेन्द्र धर्रा

यह वृत्तान्त शुरू से पढने के लिये  क्लिक करे I

गतांक - रात को करीब एक डेढ़ बजे हम कुफरी पहुंचे I कुफरी  शिमला से 13 किमी दूर है l जब तक शीशे बंद थे तब तक फरक था लेकिन जब हम नीचे उतरे तो क्या जबरदस्त ठण्ड लग रही थी I ये मेरी पहली पहाड़ी यात्रा थी I जून में सर्दी के एहसास ने रोमांच भर दिया था I एक पेड़ पर पास ही में कुछ लगा था खट्टा खट्टा सा I हम कहने लगे आडू हैं I आडू का नाम सुनकर किसी ने नहीं खाया I फोजियों ने हमें टेंट दिखा दिए , और हम थके हारे से पड़ते ही सो गए I

अब आगे - सुबह जब हम उठे और फ्रेश होने के बाद बाहर बैठे तो बाहर का नजारा देखा ! बिलकुल स्वर्ग के जैसा I हमारे बैरिक उतराई पे थे थोड़ी सपाट जगह भी थी I नीचे घाटी में बादल मंडरा रहे थे जैसे पहाड़ तैर रहा हो I सूरज निकलने के बाद बादल ऊपर उठ गए I हमने फिर एक फोजी से पूछ लिया की “ उस पेड़ पर वो खट्टे खट्टे क्या लगे है ?” उसने बताया की “सेब !“ I  बस फिर क्या था ,थोड़ी देर में ही सारी सेब साफ़ !

                                             लड़कियों का भी कैंप तो साथ था लेकिन कोई नजर नहीं आई क्योंकि उनके और हम लड़कों के बीच दस फुट की तिरपाल की बाड़ जो बना राखी थी जहाँ सीनियर डिविजन के कैडेट दिन रात पहरा देते थे  I हमें लड़कियां दिखी दसवे दिन ,जिस दिन हम वापस आये I

हमें सुबह छेह बजे तक नहाना पड़ता था अगर कोई रह गया तो रह गया I शाम का बहार बनी टंकी का ठंडा पानी और ठंडी हवाएं और खुले में नहाना I दस दिन में मैं शायद छह या सात बार ही नहाया होंगा I  
नहाने के बाद सात बजे तक नाश्ता कर लेना होता था I कोई रह गया तो रह गया I आठ बजे सब इकट्ठे होते और फिर हमें घुमाने ले जाते अगर थोडा दूर होता तो दोपहर का खाना पैक कर के देते थे I

उस समय लगभग हममें से किसी के पास भी फोन नहीं था और न ही मनोरंजन का कोई और साधन I जिन्दगी में पहली बार डिजिटल कैमरा देख कर हम हैरान रह गए जो एक सीनियर के पास था l बार बार अपने फोटो खिचवा खिचवा कर देख रहे थे उसमे  हमारे बैरिक में रेवाडी  वाले भी थे जिनमे से एक लड़के की आवाज बहुत सुंदर थी I रोज रात को उससे गाने सुने जाते थे बहुत मजा आता था I शाम को वोलिवाल वगरह खेल लेते थे बातें करते रहते थे l काश फोन न बना होता ! अगर बना होता तो सिर्फ कॉल वाला होता I फेसबुक ट्विटर ने दुनिया वाले तो पास ला दिए पर पडोसी ,दोस्त ,परिवार दूर कर दिए l मैं भी कहाँ ,किन बातों में घुस गया , चलिए वापस कुफरी चलते है

कुफरी शिमला की अपेक्षा शांत है I और शायद सुंदर भी I कुफरी में सर्दियों में स्कीइंग होती है I वैसे गर्मियों में भी कम नज़ारे नहीं होते I उन दिनों बारिश भी बहुत हो रही थी I इस पहाड़ पे हो रही है उस पे धूप है उस पे बारिश है यहाँ धुप है  ,कमाल है I  

कुफरी में स्कीइंग 50 के दशक में शुरू हुई थी जब श्रीमती इंद्रा गाँधी ने हिमाचल विंटर स्पोर्ट्स क्लब की स्थापना की थी I तब से कुफरी के दिन पलट गए I यहाँ इंद्रा गाँधी के नाम से एक पार्क भी है जहाँ टिकट लगती है I वैसे हम तो दीवार फांद कर घुस गए I बहार निकलते वक्त हमसे टिकट पूछा गया तो हमने कहा भाई हमने तो फेंक दिया की अब इसकी क्या जुररत है I चलो कोई नहीं हम वापस उठा लेट है I और वापस जाकर फिर दीवार से बहार कूद गए I एक छोटा सा जू भी है कुफरी में I वह भी हरयाणवी मलंगो ने एक टूटे हुए बाड़े से घुस कर देख लिया बिना टिकट के I
कुफरी में बर्फ के ऊँट यानि के याक की सवारी आनंद भी ले सकते हैं आप I अगर आप सवारी करने के साथ साथ खुद के कैमरे से फिल्म बनाते है तो भी सवारी से अलग पैसे देने पड़ेंगे I जब हम महासू पीक पर घूम रहे थे तो ऊपर लाउड स्पीकर पे गाना बज रहा था ‘कभी कभी आस पास चाँद रहता है ‘ I और वो मुझे इतना अच्छा लगा की आज तक मेरा फेवरिट है I

             एक दिन हमें शिमला ले कर गए I शिमला पहले अंग्रेजो के राज में भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करता था I शिमला को पहाड़ों की रानी के नाम से भी जाना जाता है और ये हिमाचल का सबसे महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र है I 2397 मि० की ऊंचाई पर स्थित शिमला का नाम देवी श्यामला के नाम पर पड़ा है I

          शिमला में हम पहले एन सी सी के ऑफिस गए और फिर जाखू मंदिर में I यह मंदिर भगवन हनुमान को समर्पित है I चोटी पर बने मंदिर से शिमला का बड़ा खूबसूरत नजारा दिखता है I मंदिर में दर्शन के बाद हम लोगों को ले जाया गया राज्य संग्राहलय में l यहाँ पर पुरानी एतिहासिक मुर्तिया और पेंटिंग्स के आलावा पुराने ज़माने के हथियार और बंदूके देखी I

           म्यूजियम देखने के बाद हम रवाना हुए राष्ट्रपति निवास के लिए I ये महल भारत के वायसराय के लिए अंग्रेजो ने 19 वीं शताब्दी के अंत में बनाया था I बहुत ही शानदार भवन है ये I इसकी बहुत अच्छी देखभाल के कारन ये बहुत अच्छी हालत में है I अंदर पूरे भवन में लकड़ी का बेहतरीन काम किया गया है I छतों पर पाइपों का जाल सा है जिनमे छेद है जो मोम से बंद है जो आग लगने की स्थिति में बहुत अच्छा काम करेंगे I वाकई बड़े दिमाग का काम है I बहार लॉन में घास के नीचे जाल है जिसमे से बारिश का पानी नीचे बने टैंक में चला जाता है I सिविल इंजीनियरिंग का छात्र होने के नाते आज मैं इतनी अच्छी इंजीनियरिंग के लिए उन इंजिनियरो को साधुवाद देता हूँ  I आज कल इस ईमारत को इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडीज के तौर पर इस्तेमाल करते है l हमें सारी ईमारत दिखने के बाद फोजी ने कहा दस दस रुपए निकालो I दस दस रूपए ? वो किस बात के ?  तो हमें बताया की राष्ट्रपति निवास देखने के लिए टिकट लगती है I तो हमने कहा की पहले क्यूँ नहीं बतया I तो जवाब मिला की पहले बताते तो हमें पता है तुम दस रुपए के लालच में इतनी सुंदर ईमारत नहीं देखते I वैसे सच बात थी हम उस समय दस रुपए में अंदर जाने की बजे कुछ खाना पसंद करते I धन्यवाद उसका जो इतना दिमाग लगाया I  फिर हमको रिज पर ले जाया गया I एक दो घंटे बाद हम वापस कुफरी के लिए रवाना हो गए I

       दस दिन वहां बिताने के बाद घर आने का मन भी नहीं कर रहा था I लेकिन आना तो था ही I दसवे दिन शिमला और कुफरी को फिर आने का वादा करके अपना अपना सामान समेट कर घर  की तरफ हो गए I

समाप्त 
मैं बाये तरफ नीचे बैठा हूँ 

Tuesday, February 3, 2015

एन सी सी कैंप ( कुफरी,हिमाचल प्रदेश ) जुलाई 2007

 प्रस्तुतकर्ता : हरेन्द्र धर्रा
   
   ये यात्रा संसमरण तब का है जब मैं नोवीं क्लास में पढ़ता था |मैंने स्कूल में एन सी सी ( राष्ट्रीय कैडेट कोर ) ले रखी थी जिसके तहत दुसरे वर्ष में एक कैंप अटेण्ड करना होता था जो सबके लिए अनिवार्य होता था | ये कैंप दस दिन का होता था | इसमें सभी कैडेट को जाना होता था | लेकिन इसके आलावा एक और कैंप लगता था जिसमे की परेड या प्रक्टिस नहीं करनी होती थी ये सिर्फ पर्यटन के लिए होता था |
           तो इसमें मेरा नम्बर भी पड़ गया | मेरे आलावा मेरे गाँव से तीन लड़के और दो लडकियों को भी जाना था | लडको के नाम थे - गुलाब,कृष्ण,और तीसरे का नाम पक्का याद नहीं , चलिए अपने पास से अनिल रख लेते है | वैसे हमको नहीं पता था की लडकियां भी जा रही है | 29 जून को निकलना था | हमें सुबह सात बजे तक रोहतक एन सी सी ऑफिस में पहुचने को कहा गया था | हम रोहतक पहले कभी बिना किसी बड़े के साथ नहीं गए थे | फिर भी हम समय से पहले रोहतक पहुँच गए |
            पर रोहतक तो पहुँच गए पर ऑफिस कहाँ है ये कोई नहीं जनता था हमें तो हमारे मास्टर ने बस ये कहा था की डी पार्क पर उतर लेना और वहां पूछ लेना | हमने एक से पूछा तो उसने एक गली की तरफ इशारा कर दिया | हम चल दिए गली की तरफ  काफी दूर जाने पर भी कुछ काम का नहीं मिला तो एक से फिर पूछा उसने कहा वो तो साथ वाली गली में था | सत्यानाश ! वापस आकर दूसरी गली में गए तो वहां भी यही हाल हुआ | वापस डी पार्क पर निराश होकर आ गए | एक पर्ची पर मास्टर जी का नंबर लिखवा कर लाए थे तो एक एस.टी.डी. पर जाकर फोन मिलाया तो सर ने पूछा इस वक़्त तुम कहाँ हो ? तो हमने कहा की सर हम तो डी पार्क पर जो गाँधी की मूर्ति लगी है उसके पिछली तरफ जो एस.टी.डी. है उसमे से बात कर रहे है | तो सर ने कहा के एक दुकान छोड़ कर जो गली है उसमे जाओ ! वहां मोड़ पर ऑफिस है |                                तो इस तरह हम ठिकाने पर पहुंचे | हम तो सोच रहे थे की हम लेट है पर वहां तो कुछ ही बच्चे थे | बाद में सर हमारे स्कूल की उन लडकियों को भी ले कर पहुँच गए | तब हमें पता चला के लड़कियां भी जा रहीं हैं | खैर हमने जून के महीने में जर्सी और गर्म बनियान और मोटे मोटे कम्बल इशू करवाए और दोपहर 11 बजे हम बस में बैठ कर रोहतक से चल पड़े |
जब हम रोहतक से चले थे , तब सारे के सारे गर्मी से बेहाल थे | आधे लड़के तो शर्ट निकाल बनियान में ही बैठे थे | मैं और गुलाब दोनों एक सीट पर बैठे थे क्योंकि एक या दो सीट कम पड़ रही थी | इतना लम्बा रस्ता और एक सीट पे दो लोग ! बड़ी नाइंसाफी थी सो दो तीन घंटो बाद मैं उठा और जो ए.एन.ओ. (मास्टर) हमारे साथ जा रहा था उससे शिकायत की, उसने कहा ड्राईवर वाले कैबिन में जा ! मैं जाकर ड्राईवर वाले कैबिन में गया और ड्राईवर से कहा की उस्ताज मैं तो सोऊंगा ! ड्राईवर अ.एन.ओ. को बोला के जी ये बंदा यहाँ काम नहीं देगा | तभी एक सीनियर डिविजन के लड़के ने कहा के भाई तू मेरी सीट पे आजा हम पीछे बैठ के ताश खेलेंगे | भूखा क्या मांगे ? रोटी ! मैं झट से बैठ गया |
                      करनाल पहुँचने के बाद बस रोकी गयी झिलमिल ढाबे पे | बस नाम का ढाबा था , सारी सुविधाएँ थी | बस रुकी तो इतने सारे कस्टमर देख कर ढाबे वाले भी खुश हुए ,लेकिन ये ख़ुशी क्षणिक ही थी पहले सारे बच्चे बाथरूम में घुसे फ्रेश होकर हाथ मुंह धो कर कुछ तो वापस बस में बैठ गए और कुछ पेप्सी वगरह लेके अपने अपने परांठे निकाल खाने लगे | ढाबे वाले का कम से कम एक दो लीटर खून तो जरूर फूंका होगा हमने |
                     बस फिर चल निकली | अब तक अँधेरा हो चुका था , एक ढाबे पर बस फिर रुकी | पर इस वाले की खूब कमाई करवाई  गयी | वो ढाबा ढलान के पास था और थोड़ी दूर से ट्रेन गयी l जिन्दगी में पहली बार कालका शिमला ट्रेन देखी , पर अँधेरे में क्या खाक देखी | रात को रस्ते में एक शहर चमकता दिख रहा था l सीनियर ने बताया ये शिमला है | रात को करीब एक डेढ़ बजे हम कुफरी पहुंचे | जब तक शीशे बंद थे तब तक फरक था लेकिन जब हम नीचे उतरे तो क्या जबरदस्त ठण्ड लग रही थी | ये मेरी पहली पहाड़ी यात्रा थी | जून में सर्दी के एहसास ने रोमांच भर दिया था | एक पेड़ पर पास ही में कुछ लगा था खट्टा खट्टा सा | हम कहने लगे आडू हैं l आडू का नाम सुनकर किसी ने नहीं खाया |  फोजियों ने हमें टेंट दिखा दिए , और हम थके हारे से पड़ते ही सो गए |
शेष वृत्तान्त अगली पोस्ट में | चित्र न होने का खेद है |
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