Saturday, August 23, 2014

हरिद्वार आटो यात्रा : चण्डी देवी और वापसी ( haridwar auto yatra -5 )

प्रस्तुतकर्ता : हरेन्द्र धर्रा
अगली सुबह उठकर नित्यकर्म कर हमने चायपानी पी और मैं और नितीश निकल पड़े माता चण्डी के दर्शन के लिए | बाकी किसी की ईच्छा नहीं थी |                                 आज 24 तारीख थी 25 का वर्त था इसलिए हमें आज ही निकलना था | हम दोनों को दर्शन को जल्दी जाकर दोपहर तक लौटना था तब तक वे चारो आटो की सफाई करके ,उसे धोकर सजाकर उसे जाम से निकालकर दिल्ली रोड पर लाने वाले थे |
कनखल से हरिद्वार तक जाम था | हर तरफ भगवा ही भगवा भोले ही भोले नजर आ रहे थे | हर कि पौड़ी पर नहाने के बाद हम दोनो माँ चण्डी की तरफ निकल पड़े |                        जब  हम लोग गंगा पर पुल पार कर रहे थे जो की मुख्य धारा पर है , गंगा का अथाह विस्तार व प्रवाह देखकर दंग रह गए | कुछ समय बाद हम पहुंचे पैदल चढ़ाई मार्ग पर | किंतु हमें मनसा देवी वाली कसर पूरीकरनी थी तो उडन खटोले के लिए हम आगे बढ़ चले जो आधा पौना कि मी आगे है |
सोचा कहीं यहां भी भीड़ ना मिले पर हम तो निश्चय कर चुके थे | काउंटर पर गए तो भीड़ बिल्कुल नहीं थी ,मन प्रसन्न हो गया | कुछ समय बाद हम उडन खटोले में था | पहले मुझे संदेह था की पता नहीं कैसा महसूस होगा क्योंकी ज्यादा उंचाई , पानी में बहने से ,बिजली से मुझे बहुत डर लगता है परन्तु बड़ा बढ़िया अनुभव रहा | उपर जाकर मां चण्डी के दर्शन किए | वैसे एक बात और यहां उपर से हरिद्वार और गंगा का बड़ा अद्भुत नजारा दिखता है | मेरे पास  कैमरा तो है नही परन्तु फोन से चित्र अवश्य खींचें मगर वो बात नहीं थी कैमरे वाली |आंखो के कैमरे से विडियो बनाकर उसे मन की हार्ड डिस्क में सेव करने के बाद हमने वापसी के लिए यू टर्न मार लिया और उडन खटोले से ही वापस आ हए | क्योंकी टिकट आनेजाने का होता है | मन तो हम दोनों का कर रहा था कि एक चक्कर और मारें इसमें पर समय और धन और समय दोनों की कमी थी तो हम वापस हर की पौड़ी की तरफ चल दिए  उसके बाद हमनें डुबकी लगाई गंगाजल भरा ,प्रशाद खरीदकर हम लोग वापस आटो में पहुंचे | 
                             सुबह से हमारा आटो सिर्फ एक डेढ़ किमी सरका था | मैं ,पियूष और नितीश वापस वही नहाने चल दिए जहां हम ठहरे थे | ये एक भूल साबित हुई | नहा कर हम जब वापस आ रहे थे तो फोन पर पता लगा थोड़ा आगे आ चुका है आटो | हमने उस "थोड़ा आगे " को कुछ ज्यादा समझ लिया | हमें वे दिखाई ना दिए | हम दिल्ली वाले रोड़ तक आ गए थे | ईतना पैदल चले वो भी पन्द्रह लिटर जल के साथ जो हमने कनखल से भरा था | वैसे भी सुबह से चलने पर थे ,पैर बिल्कुल टूट चूके थे | फिर फोन पर भी बात नहींहो पा रही थी हम वापस भी गए पर वे दिखाई ना दिए | हम बैठ भी नही रहे थे कि क्या पता कब निकल जाए ? घण्टों खड़े रहे बारिश आ गई पर हम ना हिले शाम पांच-छह को देवताओं के दर्शन हुए और हम अपने जहाज में सवार हुए | सच बताऊं तो बड़ा सुकून मिला | 
              रात को एक होटल पर रूके | होटल क्या होटल था ? वाह ! क्या सर्विस थी ? मैंतो उसे दस में से 0.00000000001 नम्बर भी ना दूं | बिना पेट फुल हुए ही निकल पड़े | पूरे रस्ते कांवड़ो की भीड़ मिली |
वाह ! क्या अद्भुत अनुभव होता महाशिवरात्री पर हरिद्वार का ! सुबह हम हसनगढ़ में थे | वैसे तो ऐसे अनुभव शब्दों में बयां नहीं हो सकते लेकिन जितना मुझसे हो सका मैने किया | आपने अपना समय दिया उसके लिए आभार |
फिलहाल कुछ चित्र |
फिर मिलेंगे नई जगह नई पोस्ट में |
भीड़
गंगा का अथाह विस्तार
शायद इन लहरों मे नजर खो गई
उडन खटोले से
चण्डी देवी से
उडन खटोले की टिकट
डैक का तार लूज है 
कनखल दक्ष मंदिर से एक विहंगम दृश्य
वापसी में 
दिस इज ए स्लीपर कोच


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