Wednesday, July 30, 2014

हरिद्वार आटो यात्रा : कनखल ( haridwar auto yatra - 3 )

प्रस्तुतकर्ता : हरेन्द्र धर्रा
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हरिद्वार जानें के बजाय हम लोग भोले की ससुराल यानी के कनखल पहुंचे जो हरिद्वार से तीन चार कि मी है  | काँवड़ के मौसम में हरिद्वार में बहुत भीड़ होती है जबकी कनखल में बहुत शांति होति है |
                 हमारे गाँव से आई चार और गाड़ियां भी कनखल में ही थी हमनें भी आटो उन्ही के पास कनखल के राजघाट पर स्थित पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन जिसे बड़ा अखाड़ा भी बोलते हैं के सामनें रोक दिया |
                  यही वो हवेली है जहाँ अर्जुन पंडित फिल्म की शूटिंग हुई थी |
                  दोस्तों से मेल मिलाप के बाद हम नहाने के लिए चल दिये | गंगा के ठंडे पानी में नहाने के बाद सारे सफर की थकावट उतर जाती है | तरोताजा होकर भोजन की तैयारी कर दी गई | पेटपूजा के बाद दोपहर को राजघाट पर मंदिर की छांव में दो गद्दे डालकर नींद निकाली गई | थोड़ी देर बाद कुछ दोस्तों का शोर सुनकर नींद टूटी तो पता चला की अभी अभी हमारे पास से नागदेवता निकले थे | भाग कर पुल से दूसरी तरफ जाकर नागदेवता के दर्शन किये | वाह भोले ! पहले दिन ही दर्शन दे दिये |
                पूरा दिन आराम किया गया |
बारी अगली पोस्ट में .................. .....  .  .       .
गंगाजी की गोद में
कनखल राजघाट पर आरामकनखल का डाकघर  ( हालत देखकर लगता है २०० साल पुराना है )

बड़ा अखाड़ा जिसे अर्जुन पंडित फिल्म में हवेली दिखाया गया है |



Sunday, July 27, 2014

हरिद्वार आटो यात्रा : हसनगढ़ से हरिद्वार ( haridwar auto yatra -2 )

प्रस्तुतकर्ता : हरेन्द्र धर्रा 
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अगले दिन हमनें तैयारी शुरू कर दी | सबसे पहले एक आटो का इन्तजाम किया गया | तेल और चार सौ रूपये रोज के तय हुए | दोपहर को नितीश को फोन लगाया तो वो बोला उसे छुट्टी मिल गई है , चार पाँच बजे तक आ जाएगा | अब पाँचो का जाना तय था |
                           आटो पीछे से खुल्ला था दिल्ली के आटो की तरह बंद नहीं क्योंकी हरियाणा में चार सवारी पीछे भी तो बैठाते है | हमने आटो की पीछली सीट उतार दी ताकी लेटने का इन्तजाम हो जाए | पीछे मैट दरी डालकर उपर एक गद्दा डाल दिया |
                              व्रत के सीजन में वहाँ खाना ना तो बढ़िया मिलता है और ना ही किफायती | आटो में एक सिलैंडर चूल्हा और बर्तन रख लिए और खाना बनाने का सामान भी रख लिया |
                 शाम को तीर्थ यात्रा का बैनर लगा कर हम निकल पड़े | भोले का बैनर एक तरह के लाईसैंस का काम करता है कही भी कोई रोकटोक नहीं होती | भोले के भक्तो के सामने सब सिस्टम फेल हो जाते हैं |
                  हमारे गांव यानी हसनगढ़ से हरिद्वार की दूरी 205 कि मी है लेकिन जाते वक्त जाम ना लगे और काँवड़ियों की सुरक्षा के मद्देनजर घुमा फिरा के 100 कि मी ज्यादा लम्बाई बढ़ा देते है |
                    सोनीपत के बाद हमें दिल्ली हरिद्वार रोड पर भेज दिया | ये हाईवे सिर्फ काँवड़ियों के लिए खुला था | पूरे रस्ते में काँवड़ियों की भीड़ मिली | कुछ कुछ दूरी पर शिविर लगे थे | इन शिविरों में काफी बढ़िया इन्तजाम थे | हम मेरठ के पास पहुँच कर एक शिविर में डांस देखने लगे कुछ देर बाद खाना खाया | परांठे हम लेकर गए थे सब्जी होटल से ले ली थी |
              पेट पूजा के बाद हम फिर निकल पड़े | घण्टे भर बाद सोने के लिए रूके और कुछ नींद निकाल कर फिर चल दिए |
                 उ• प्र• के रोड भी बड़े अजीब होते है , मान लिजिये हरिद्वार 154 कि मी है आध पौन घन्टा चलने के बाद ये दूरी 165 कि मी भी हो सकती है | 
                   सुबह एक गांव में रूककर चाय पी | फ्रैश होकर आम के बगीचे दिखे | कुछ आम तोड़ कर खाए | वाह ! पेड़ पर पके फल का तो स्वाद ही कुछ और ही होता है |
                  सुबह सात आठ बजे हम हरिद्वार पहुंच चुके थे |
                  बाकी अगली पोस्ट में |
                   फिलहाल कुछ चित्र |
रस्ते में हवा के लिए हम छत पर बैठ गए
सुबह आटो रोककर चाय पी
सूर्यनारायण के दर्शन
जाम का नजारा
रूड़की कुछ कि मी आगे



Friday, July 25, 2014

हरिद्वार आटो यात्रा : कैसे बनी योजना ? ( haridwar auto yatra -1 )

प्रस्तुत कर्ता : हरेन्द्र धर्रा
नमस्कार मित्रों !
सावन का महिना तो महादेव का होता है काँवड़ियों के जयकारे और समां बांध देते हैं हाईवे स्पेशल काँवड़ियों के लिए खुलते है ना रोकटोक ना टोलटैक्स भोले बाबा के भक्तों के लिए सब कुछ खत्म |
                      20 जुलाई शाम को तीन चार दोस्तों के साथ घर  के बाहर बैठा था | सामने कुछ और दोस्त डाक काँवड़ लाने हरिद्वार जाने की तैयारी कर रहे थे | शाम को वे लोग निकल गए तो हम भी चहलकदमी करते हुए पार्क की तरफ निकल पड़े | रस्ते में चाउमीन ली और आगे जाकर हमने चाऊमीन पर धावा बोला |
                                    चाऊमीन खत्म होते होते हमारा भी प्रोग्राम बन चुका था हरिद्वार जाने का | तय हुआ आटो में जाया जाएगा | सभी सहमत हो गए |
                                      मै हरेन्द्र , पीयूष, सोमबीर, विक्रम का पक्का प्रोग्राम था लेकिन नितीश को आफिस से छुट्टी मिलेगी या नही पक्का नही था | उसकी छुट्टी की कामना करके आगे की तैयारी अगले दिन पर छोड़ दी |
      चित्र अगली पोस्ट में |
हर की पौड़ी