Thursday, May 22, 2014

माता वैष्णों देवी यात्रा ( vashno devi yatra )

 प्रस्तुतकर्ता : हरेन्द्र धर्रा
जम्मू के रियासी जिले के कटरा में स्थित माता वैष्णो का मंदिर करोड़ो लोगो की आस्था का केन्द्र है |
   इस साल की शुरूआत में हमनें भी माता की शरण में जाने का निर्णय किया | 12 जनवरी को जाना तय हुआ क्योंकी एक तो नववर्ष पर भीड़ ज्यादा होती है ,और दूसरा बर्फबारी तकरीबन हर साल 5-7 जनवरी के बाद ही होती है | परन्तु वहाँ नया साल मनाकर आए दोस्तों से पता चला की बहुत बर्फ गिरी है तो रूका नहीं गया 5 तारीख को ही निकल पड़े |
 हम चार लोग थे  | मैं (हरेन्द्र धर्रा ) ,सोमबीर ( लाला ) ,रमेश वर्मा ( गैंडा ) , गुलाब ( मोटर साईकल मिस्त्री )
हम लोग शाम को सोनीपत पहुंचे तो देखा उत्तर सम्पर्क क्रांति यहाँ नहीं रूकती | खैर पानीपत पहुँचे | गाड़ी का समय था 10:10 रात को | थोड़ा समय था तो चाय पीने लगे | देखा तो गाड़ी डेढ़ घण्टा लेट थी सोचा चलो एक चाय और लग जाएगी पर चाय लग गई दो दो तीन- तीन और साथ में ट्रेन में खाने के लिए लाए गए परांठे भी खत्म कर दिए गए | ट्रेन आई पौना एक, साढ़े बारह बजे | चढ़ लिए |  
                                                                                             अन्दर नजारा देखने लायक था बैठना तो दूर खड़े होने की जगह भी ना थी | जैसे तैसे करके कोई किसी के बैग पर कोई सीट के कोने पर बैठ ही गया |
भला हो एक सरदार जी का परिवार (छोटा सा दस पंद्रह आदमीयों का ) अम्बाला उतर गया और हमें सीट मिल गई | पठानकोट तक सोते हुए गए | सुबह 7 बजे जम्मू पहुंच गए | चाय पीकर बस की तरफ बढ़े ,60-60, रुपये किराया तय करके चढ़ और हम कटरा पहुंचे |
                                                                      घर से सोच के आए थे सब कुछ सफेद मिलेगा , पर यहाँ देखा तो लगा जैसे धोखा हो गया था | ना तो कुछ सफेद था ना गर्मियों की तरह हरा |
                                                                                                                   चलो कोई बात नहीं | हमने रजिस्ट्रेशन पर्ची ली जिसमे सबका फोटो खिंचवाना पड़ा ( पहले फोटो नहीं खिंचता था और ना ही सबको जाना पड़ता था ) | ईस पर्ची को लेकर छह घण्टे के अन्दर बाणगंगा चैकपोस्ट कोपार करना होता नहीं तो रजिस्ट्रेशन निरस्त हो जाता है | 
                                 हमने माता की जय बोली और चढ़ाई का शुभारम्भ किया | ये चढ़ाई 13 किमी की पैदल करनी होती है | बाणगंगा पर पहुँचे , कुछ लोग हाथ मुँह धो रहे थे | पर हम घर पे चाहे सर्दियों मे एकाध दिन छोड़ भी दें लेकिन यहाँ जरूर नहाना था | कपड़े उतार पानी में घुसे तो मानों धड़कन रूक सी गई ,पानी बहुत ठण्डा था | 
         नहाने के बाद थकान सी उतर गई | हमने आगे चढ़ना शुरू किया | मैं और रमेश कुछ धीरे धीरे चढ़ रहे थे ,गुलाब और सोमबीर आगे थे | भाई हम तो आराम तै आवैंगे माता भाज कै थोड़ी जा सै | वैसे पहले जाके उन्हे मिला भी क्या ? हम तो मस्ती से उनसे एक घण्टा बाद अर्धकवारी पर पहुंचे | हमने पर्ची कटाई , खाना खाकर एक और पर्ची कटाई ताकी पहला नम्बर निकलने की सूरत में ये काम आ जाए | 
                                                                                                          हमने फिर कम्बल लिए जो कि सौ रूपये प्रति कम्बल के हिसाब से मिलते है और कम्बल वापस करने पर रूपये वापस मिल जाते हैं | एक और बात हमने देखी कि नोट भी वही वापस दिया जाता है उस पर सीरियल नं डाल देते हैं तो ये मत सोचियेगा कि फटा पुराना नोट यहाँ चला दूँ | वैसे इस बात के पक्का होने का दावा मैं नही करता |
                                                                                मुझे नींद नहीं आ रही थी पर रमेश ने कहा तू भी सो जा मैने मना किया तो वो बोला कि लेट तो जा | मेरी भी लेटने के बाद आँख लग गई | रात को गुलाब ने जगाया - 'अरे नम्बर निकल गया जल्दी उठो नहीं तो दूसरा भी निकल जाएगा ' | हम तीनों नींद के दुखिया बोले निकलता है तो निकलने दे कल दर्शन कर लेंगे | उसने हमें जगा ही लिया तो यहाँ हमारा दो पर्चियों का आईडिया सुपर हिट निकला | 
                     हमनें दर्शन करके भवन की ओर प्रस्थान किया | सुबह वहाँ पहुँचे तो आरती चल रही थी हमनें तब तक नहाना उचित समझा | पर ये स्नान उम्र जिंदगी भर याद रहेगा | इतना ठण्डा पानी कि बर्फ से ठण्डा ,और उपर से हवा खाल छील रही थी | करीब एक घण्टे तक हाथ पैरों की उँगली दर्द करती रही |
              हमनें भेंट खरीदी और दर्शन के लिए लाईन पर पहुंचे पर लाईन तो थी ही नहीं क्योकीं ठण्ड में भीड़ कम होती है | आराम से दर्शन हुए | फिर हम निकल पड़े भैरव बाबा से मिलने ,माना जाता है इनके दर्शन बिना यात्रा निष्फल होती है | कटरा से भवन की चढ़ाई एक तरफ ओर भैरव की चढ़ाई एक तरफ बराबर है चाहे दूरी कम क्यूँ ना हो |
       भैरव के रस्ते में कुछ बर्फ दिखी जो उपर पहुंचते पहुंचते ज्यादा होती चली गई | भैरव दर्शन के बाद हम सांझी छत के रस्ते नीचे आने लगे जबकी चढ़ाई हमने हिमकुटी मार्ग से की थी जो अपेक्षाकृत कम चढ़ाई वाला है|
      भैरव से आने के बाद हम अर्धकुवारी पहुँचे ,खाना हम उपर खा चुके थे | आते ही थकान के कारण चादर तान कर सो गए | शरीर गरम था तो लेटते ही नींद आ गई | कुछ देर बाद उठे ,शरीर सिमटे हुए थे ,दांत बज रहे थे बोला भी नहीं जा रहा था | हिम्मत मारकर रमेश और सोमबीर कम्बल लाए | कुछ गर्मी आने के बाद खाना खाया और सो गए |
          सुबह उठे ,नित्यकर्म किया और नीचे चल पड़े | नीचे आकर बाणगंगा पर फिर स्नान किया | यहाँ सोमबीर नही नहाया | 
           कटरा पहुंचकर हमने प्रशाद खरीदा और जम्मू की बस में बैठ लिए | रस्ते मे एक बस खाई में गिरी थी , चोट लगी थी पर कोई जान का नुक्सान नहीं हुआ था | उससे कुछ आगे हमारी बस भी खराब हो गई | दो तीन गाड़ी बदलकर जम्मू पहुंचे | ट्रेन रात  को सही समय पर आई | सुबह पानीपत उतरे और सोनीपत होते हुए घर पहुंचे |     
            यात्रा के दिन :   चार
         यात्रा का प्रतिव्यक्ति खर्च - दो हजार से बाईस सौ रूपये


जम्मू से कटरा के रस्ते में विश्राम
कटरा से पहले
कटरा में
पैदल यात्रा का प्रवेश द्वार
बाणगंगा पर स्नान
चरण पादुका
अर्धकुवारी पर
क्या नजारा है
भवन की और प्रस्थान
माता के भवन के सामनें
डट भी जाओ यार
छोरा जँचै है भाई
असली लंगूर को पहचानें
भोले के चरणों में चारों 
वापसी में दोबारा बाणगंगा में स्नान
आते समय सोमबीर नहीं नहाया
जम्मू रेलवे स्टेशन पर ठिठुरते हुए

12 comments:

  1. ये पोस्ट मोबाईल से डाली गई है | त्रुटियाँ हो सकती है | चित्र भी मोबाईल से खिंचे गए हैं |

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  2. ना इतनी बुरी भी ना है... कुछ तो घणी चोखी है

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  3. जय माता दी, मेरी भी शुरू की पोस्ट मोबाईल से ही लिखी व पब्लिश की हुई है।

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    1. भाई ! मोबाईल में ज्यादा कंफर्टेबल फील होता है ! मैने तो सारी पोस्ट मोबाईल से डाली है !

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  4. जय माता दी बढ़िया यात्रा रही हरेंदर जी।कम लिखा है लेकिन अच्छा लिखा।

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    1. धन्यवाद रूपेश भाई !

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  5. ओत्रि !
    आप तो बिलागर भी निकले ।
    जय माता दी

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    1. मैने ये ब्लॉग बनाया था सिर्फ अपने लिए ताकी अपनी यादें संभाल कर रख सकूँ ! काफी दिन तक तो मैने दोस्तों को भी नहीं बताया था !

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