Monday, August 12, 2019

उदयगिरी और खंडगिरी गुफाएँ , भुवनेश्वर -2

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गतांक से आगे -
ॐ  शांति 

कुछ देर बाद हम उदयगिरी पहुंच गए । ऑटो वाले ने कहा कि यही काउंटर से आप टिकट ले लीजिए तब तक मैं पार्किंग में ऑटो लगा लेता हूं । हम टिकट लेते हैं और ऑटो वाले का नं० भी ले लेते हैं । हमने कहा कि भाई जब पूरा कवर हो जाएगा तो फोन कर देंगे ।

हम टिकट काउँटर पर टिकट ले कर खंडगिरी की ओर चलते हैं । उदय गिरी सड़क के एक ओर बसा है और खंडगिरी दूसरी ओर । हम खंडगिरी की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे । सीढ़ियों के साथ बनी पूरी दिवार पर हरी काई का कब्जा था । मुझे ये बहुत पसंद है ।










उपर पहाड़ी पर पत्थर में कटाई करके गुफाएँ बनाई गई हैं । इसके बिल्कुल सामने वाली पहाड़ी पर उदयगिरी गुफाओँ का नजारा बहुत अच्छा दिखता है । खंडगिरि गुफा कम एरिया में फैली हुई हैं जबकि उदयगिरी काफी जगह में फैली हुई है ,और वे बड़ी भी है । उदयगिरी गुफा में दो मंजिला गुफाएं भी हैं । इन गुफाओं को बनाने का का समय ईसा से 200 साल पहले का है । इतनी पुरानी संरचनाओं को देखना ही अपने आप में एक बहुत बेहतरीन अनुभव होता है । यह गुफाएं जैन और बौद्ध भिक्षु अपने रहने के लिए इस्तेमाल करते थे । वैसे तो गुफाएं इतनी बड़ी नहीं है कि इनमें अंदर सीधा खड़ा हुआ जा सके लेकिन यह वास्तव में आराम करने के लिए या फिर ध्यान लगाने के लिए बनाई गई थी । कई गुफाओं में हमने देखा कि सिरहाने भी पत्थर की कटाई करके ही बनाए गए थे । कुछ गुफाओं में अंदर से पानी भी रिस रहा था । उस पानी की निकासी के लिए भी कई जगह बहुत ही अच्छे ढंग से नालियां बनाई गई थी । काफी गुफाओं के सामने बरामदे भी बनाए गए थे । एक गुफा को तो एक बड़ी चट्टान को खोखला कर के भी बनाया गया था , अब इसको हम पत्थर का कमरा कहे या गुफा कहें मुझे नहीं पता । हम वहां पर काफी समय ठहरे उसके बाद हमने सोचा कि चलो अब होटल की तरफ चलते हैं ।




कितना सुंदर है न 









हमने ऑटो वाले को फोन कर दिया तो थोड़ी देर बाद वो आ गया । हमने उसे होटल की बजाय लिंगराज लस्सी की तरफ चलने को कहा । मैंने लिंगराज लस्सी के बारे में यूट्यूब पर देखा था उनकी लस्सी वहां काफी पॉपुलर हैं थोड़ी देर बाद उसने हमें लिंगराज लस्सी के बाहर उतार दिया । हम जब वहां पहुंचे तो वहां पर हम ही थे ना कि यूट्यूब में दिखाई उस वीडियो की तरह भीड़ थी । मैंने दो गिलास बनाने के लिए कह दिया शायद 45 रुपए का एक गिलास था पर मुझे उस लस्सी का टेस्ट पसंद नहीं आया पता नहीं क्यों । लस्सी के अंदर करीम वगैरह भी डाल रखी थी कोकोनट भी डाल रखा था कई चीजें थी उसका स्वाद मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था । मन में कहावत याद आई ऊंची दुकान फीका पकवान । वैसे हो सकता है यहाँ वालों को ऐसा टेस्ट ज्यादा पसंद हो ।

दोपहर का टाइम हो चुका था अब हमें होटल भी जाना था गूगल मैप पर देखा तो होटल करीब दो ढाई किलो मीटर था । हम लोग चल पड़े । मुझे भूख नहीं थी पर संदीप ने कहा कि भूख लगने लगी है । पास ही एक आलू बड़े वाला था जैसे हमारे यहां दही बड़ा वहां पर आलू बड़ा । यहां पर दही डालते हैं मसाला डालते हैं वहां पर वह भिगाए हुए बड़े में आलू की सब्जी डाल रहा था । संदीप ने एक प्लेट खा कर कहा चल अब चलते हैं । मुझे भूख नहीं थी तो मैंने नहीं लिया था । काफी टाइम गलियों में से घूमने के बाद हम होटल पहुंच गए । शहर के केन्द्र से होटल काफी दूर था पर हमें यह गोइबिबो की वजह से कुल ₹35 में पड़ा था तो पैसे बचाने के लिए अगर ढाई तीन किलोमीटर ज्यादा चलना भी पड़े तो क्या नुकसान है ? हम दोपहर में होटल पर पहुंचे । यहाँ हमारा रूम बुक था तो जाते ही सबसे पहले हमारा काम था नहाना । हालांकि हम सुबह भी नहाए थे पर सुबह से हम सड़कों पर ही घूम रहे थे तो धूल मिट्टी में फिर से नहाने का मन कर रहा था । नहाने के बाद हम थोड़ी देर आराम करने के लिए सो गए । शाम को उठकर हमने सोचा चलो भुवनेश्वर में घूम लेते हैं । जब मैंने नेट पर लिंगराज लस्सी के बारे में देखा था तो मुझे एक दुकान के बारे में और पता चला था 'नीमापारा स्वीट्स' । हम उसी तरफ हो लिए वह हमारे होटल से करीब साढे चार किलोमीटर दूर था हम पैदल ही हो लिए । हालांकि गूगल मैप पर हम देख रहे थे पर फिर भी हम उसके आगे से निकल गए । आगे जाकर वापस आना पड़ा थोड़ी सी आगे एक औरत कुछ बेच रही थी संदीप ने कहा चल यार देखते हैं यह क्या बेच रही है मैंने कहा चलो ठीक है देखते हैं । पास जाकर देखा तो वह झींगा को पका रही थी । उसके बाद हमने नीमापारा तक किसी भी ठेले वगैरह की तरफ नहीं देखा । नीमापारा मतलब मीठे के शौकीनों के लिए स्वर्ग । यहां पर काफी तरह की मिठाइयां थी हमने छेना पोड़ा , छेना झीली और किसी तरह का रसगुल्ला लिया । तीन-तीन पीस खाने पर ही हम मीठे से फुल हो चुके थे । अंधेरा हो चुका था तो हमने फोटो की तरफ चलना ठीक समझा मीठे से वैसे पेट फुल हो चुका था । लेकिन भूख तो लगी ही थी असल में मीठे से पेट नहीं भरा था मीठा खाने की नियत भर गई थी । तो रास्ते में हमने एक रेस्टोरेंट देखा जिसका नाम था 'जुगाड़ जंक्शन' हमने सोचा यह भी भला कैसा नाम है ? पर थोड़ी ही देर में पता चल गया कि इसका नाम जुगाड़ जंक्शन क्यों है । टायर लटका कर उनमें पौधे उगाए गए थे , कहीं साइकिल का रिम टंगा हुआ था , मेजों पर ताश के पत्ते चिपकाए गए थे । जहां देखो उधर ही जुगाड़ ! यहां तक कि पानी भी उन्होंने किसी दारू की खाली बोतलों में भरकर फ्रिज में रखा था । हमने वहां से आलू के परांठे , धनिए की चटनी , दो सब्जी और रायता पैक करा लिया । कमरे पर आकर हमने भोजन किया । यकीन मानिए होटलों पर इतना स्वादिष्ट खाना कम ही मिलता है जितना ये था । रात को खाना खाकर संदीप बाहर टहलने चला गया । मैं सुबह का देखने लगा कि कहाँ जाना है ।


















Friday, May 31, 2019

मंदिरों का शहर भुवनेश्वर






पूर्व का काशी कहा जाने वाला भुवनेश्वर उड़ीसा राज्य की राजधानी है । इसे भारत के सबसे हरे भरे नगरों में शामिल किए जाने का सौभाग्य भी प्राप्त है (असल में ये है भी बहुत हरा भरा ) और हमें सौभाग्य मिला इस शहर को दो दिन जीने का ।

भुवनेश्वर का संधि विच्छेद है भुवन + ईश्वर
भुवन यानी संसार और ईश्वर यानी स्वामी और संसार के स्वामी है भगवान स्वयंभू भोलेनाथ और भगवान भोलेनाथ भुवनेश्वर में स्थापित हैं भगवान लिंगराज के रूप में ।
दस अगस्त को सुबह चार बजे मैं और संदीप भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन पर उतरे । स्टेशन पर बहुत ही ज्यादा भीड़ थी क्योंकि भुवनेश्वर में रेलवे ए एल पी का एग्जाम था । खुद हमारे डब्बे में भी बहुत लड़के बिहार तक के एग्जाम देने आए थे । स्टेशन से बाहर भी हर तरफ एग्जाम वाले ही थे । मैने गूगल मैप पर सुलभ सर्च किया तो आप पास कई दिखे पर हमने भीड़ को देखते हुए करीब ढ़ाई किमी दूर वाले को चुना । हम स्टेशन से बाहर निकले तो चाय वालों के ठेले थे तो हमने चाय बनवा ली । एक किलो मैदे की मट्ठी मैं घर से लेकर आया था । अब हम सुलभ की और निकल पड़े पैदल । मेन रोड़ पर आए तो रोड़ के दोनों ओर बहुत ही ज्यादा पेड़ थे । पहली नजर में ही इस शहर से प्यार हो गया । सुलभ पहुँच कर हम नहाधोकर फ्रेश हो गए और अब उजाला भी हो गया था। यहाँ से कुछ ही दूर पर सब्जी मंडी भी लगी थी तो संदीप कहता है

"चल यहाँ की सब्जियाँ देखते हैं !"

पर मैं मना कर देता हूँ । अब संदीप कहता है

" अब कहाँ चलना है ? "
"और कहाँ चलो बाबा लिंगराज के मंदिर चलते हैं ।"


मैप पर दूरी करीब छह किमी । हम पैदल ही मंदिर की तरफ चल देते हैं । सुबह की मीठी सी ठंडक है हरे भरे पेड़ों से भरी सड़क है और साथ में संदीप के जियोफोन में पुराने गाने बज रहे हैं और क्या चहिए ? कुछ दूर चलकर एक मोड़ पर हमें कुछ कांवड़िए मिले । आज भी काँवड़ ? मन में सवाल उठता है । हमारे हरियाणा में तो कांवड़ सिर्फ शिवरात्री के दिन ही चढ़ाई जाती है । ना उससे पहले और ना उसके बाद । मैने एक कांवड़िए से पूछा कि

"भाईसाब कब तक कांवड़ चढ़ाते हैं ?"

" पूरा सावन चढ़ती है भैया । "

"कहाँ से लाते हैं जल ?"

"नदी से "

"कितनी दूर से ?"

"आठ किमी से ।"

" विश्राम नहीं करते बीच में ? "

वो बोला ही नहीं । मैने सोचा कि भाई परेशान हो गया तो मैने पूछना ही छोड़ दिया । एक बार तो सोचा कि इन कांवड़ियों के साथ ही चलते हैं पर वो तो बहुत तेजी से जा रहे थे और हमें कोई जल्दी थी नहीं । कुछ देर बाद थोड़ी सी भूख महसूस होने लगी थी । एक केले की रहड़ी लगी थी तो सोचा केले ही लपेट दें । संदीप ने मोलभाव किया तो वो तीस रूपये के आठ केले देने को रेहड़ी वाला राजी हो गया बोहनी के लिए क्योंकी अभी वो केले जमा ही रहा था । तभी हमने एक चीज़ देखी जो मेरे वहाँ नहीं दिखती आमतौर पर । उस केले वाले ने चप्पलें निकाली और आठ केले हाथ में लेकर लिंगराज मंदिर की और नमस्कार किया । फिर पैसे लेकर भी उसने यही प्रक्रिया दोहराई । ये एक किस्म से मेरे लिए तो भक्ति का ओवरडोज़ ही थी । पर मेरा एक फंडा है कि मैं इन चक्करों में ज्यादा नहीं पड़ता और ना ही पड़ने वालों के बीच टांग अड़ाता हूँ । मैं भी खुश और सामने वाला भी । केले खाते हुए हम आगे चल पड़े । केले क्या थे बिल्कुल छोटे छोटे । एक केले से दो बाईट ही बनती थी जैसे पाँच रूपये वाली बार वन चॉकलेट ।


धीरे धीरे मंजिल पास आ रही थी । एक जगह देखा दो चार कुत्ते किसी चीज को घेरे खड़े थे । ध्यान दिया तो कोने में एक बिल्ली का बच्चा सहमा बैठा था । संदीप नें कुत्तों को भगाया और बिलूटने को एक सुरक्षित स्थान पर बैठा दिया । कुछ देर हम वहीं रूके रहे । जब ये निश्चित हो गया कि कुत्ते दूर जा चुके हैं तो हम फिर चल पड़े । मेन रोड़ से एक दो गली मुड़ने के बाद मंदिर नजर आने लगा । मंदिर से पहले एक झील थी 'बिंदु सागर' । हम उसके साथ ही सीढ़ियों पर बैठ गए । तभी संदीप ने कहा

"देख रै कछुआ ।"
"कड़ै?"
"झील मैं नहीं ! अड़ै देख इस तलाब मैं ।"
"डट आऊँ हूँ कैमरा लेकै "


मैं कैमरा लेकर पहुँचा तो देखा 'गोदाबरी तीर्थ' नाम के इस छोटे से तालाब में कई कछुए थे । तभी कुछ मछलियाँ भी दिखीं । काफी बड़ी रंग बिरंगी मछलियाँ थी और काफी संख्या में भी । काफी देर तक हम इशारे कर करके मछलियों को देखते रहे । मैं मन ही मन सोच रहा था कि लोग सोच रहे होंगे कि कैसे बच्चों कि तरह कर रहे हैं । यहाँ के लोग तो रोज ही देखते हैं ना ( और खाते भी हैं 😁) ।














काफी देर मछलियों को देखने के बाद हम बिंदुसागर झील के साथ बने एक चबूतरे पर बैठे बैठे काफी समय झील के कमलों को निहारते हुए गुजार गए । दूर से ही झील के पार से लिंगराज मंदिर अपनी भव्यता और विशालता की गवाही दे रहा था । कुछ समय बाद हम मंदिर की तरफ चल पड़े । झील के साथ साथ ही रस्ते में पंडे पुजारी बैठे थे अपनी अपनी छतरी खोल के । कुछ अनुष्ठानों में व्यस्त थे तो कुछ ग्राहकी के इंतजार में । हमें भी कईयों ने टोका पर हम इस टाईप के हैं नहीं😁 ।

कुछ देर में ही हम मंदिर के सामने खड़े थे । सामने से मंदिर अधिक विशाल नहीं दिखता क्योंकि इसकी चारदिवारी बहुत उँची है । जितना दूर से देखेंगे मंदिर साफ नज़र आएगा । मेन गेट के सामने बेरिकेटिंग कर रखी थी दो चार सिपाही भी खड़े थे । पर आश्चर्य कि बात थी वहाँ भीड़ नहीं थी 🤔। मंदिर के सामने भी आपको पूजा कराने वाले मिल जाऐंगे । भगवान के तथाकथित ऐजेंट लोग आपको हर तरह से एक आध पॉलिसी लेने के लिए मनाने की कोशिश करते ही हैं । मंदिर के बगल में ही कुछ लोग सामान रखने का काम कर रहे थे । हमने अपना बैग और कैमरा जमा करा दिया , जूते भी वहीं दे दिए । फोन भी रखना पड़ा क्योंकि अब फोन ले कर जाना भी प्रतिबंधित कर दिया गया है । सब कुछ मना है ले जाना तो ये लोग बटुआ भी प्रतिबंधित क्यूँ नहीं कर देते 💰?
खैर हमने समान रखा और टोकन लेकर मंदिर में जाने के लिए पहुँचे प्रवेशद्वार पर । कोई लाईन नहीं कोई भीड़ नहीं । अंदर जाते ही बाएँ हाथ को एक मूर्ति के सामने एक मेज पर बढ़िया लाल कपड़ा बिछा हुआ और उस पर काफी सिक्के ( बहुत ज्यादा ) डले हुए थे । पहले मन में आया कि सुबह सुबह इतने सिक्के कौन चढ़ा गया ? अगर कल के हैं तो इन्होने उठाए क्यों नहीं ? फिर मन में विचार आया कि भई मार्केटिंग भी कोई चीज होती है ।
हमसे भी पैसे चढ़ाने के लिए कहा गया । पर हम लोग भगवान से लेने वाले हैं भगवान को देने की हमारी औकात कहाँ ?
मंदिर प्रांगण में बहुत सारे छोटे छोटे मंदिर बने हुए हैं मुख्य मंदिर के चारों और । हम सारे प्रांगण में घूमे । वहाँ कई सारे बिल्ली के बच्चे दिखे 🐈🐈। प्रांगण में टहलने के बाद हम मुख्य मंदिर में गए । वहाँ हमें फिर से दान के लिए टोका गया । गर्भगृह में पूजा चल रही थी सुबह की । हमने दूर से ही प्रणाम किया मालिक को और बाहर निकल आए 🕉 । यहाँ लगा पुजारियों का ध्यान पूजा से अधिक दान पर है ।
इससे आपका तो पता नहीं पर मुझे ये अच्छा नहीं लगता ।










सुबह का ही समय था पर गर्मी हो गई थी 🌞। तो मंदिर से बाहर निकलकर फ्रूटी गटक ली ठंडी ठंडी ।
संदीप ने कहा

" ईब कड़ै चाल्लां ?"

"पहल्या अडे तै लिकड़ ले भाई । जित भगवान कि इच्छा होगी पहुँच जाएँगे ।"

"फेर भी देख मैप । "

" उदयगिरी चलते हैं नौ किमी दूर है । होटल रूम में भी तो चेक इन का टाईम है दोपहर के दो बजे तो समय भी निकल जाएगा । "

"घणा है कोए ऑटो देख ले । पर पहल्या मंदिर के आगे तो फोटो लेले । "

मंदिर के आगे खड़े होकर फोटो लेने से फायदा था नहीं क्योंकि दीवार इतनी उँची थी कि मंदिर आ ही नहीं रहा था फोटो में । तो हम कुछ दूर गए तो मंदिर दिखने लगा । वहाँ दो फोटो लिए और चल पड़े ऑटो देखते हुए । करीब एक डेढ किमी तो हम वैसे ही पैदल कवर कर गए । टी शर्ट भी पसीने से तर थी । एक नारियल वाला देखते ही रूक गए । नारियल पानी मुझे पसंद नहीं पर ले लिया मैने भी । पर जैसा मैने कहा मुझे पसंद नहीं तो दो घूट पीते ही संदीप को पकड़ा दिया । संदीप ने ही पिए दोनों और उनकी मलाई भी उसने ही खाई । जब तक वो नारियल से निपटा तभी एक ऑटो वाला दिख गया । पूछा -

"भाई उदयगिरी चलेगा ? "


" पाँच सौ "

"आठ नौ किमी तो है ही "

"नहीं ज्यादा है "

"300 ले लो भाई इससे ज्यादा नहीं देंगे ! चलना है तो बोलो । "


" अरे भाई वापस भी तो लाऊँगा ! आप समय भी लगाओगे । "

" भाई हम तो इतने ही देंगे चलना है तो बता नहीं तो पैदल चले जाऐंगे घूमते हुए । "

" चलो बैठो ! इतने ही दे देना पर वहाँ ज्यादा टाईम मत लगाना । "






इब हम जा रहे थे उदयगिरी खंडगिरी की तरफ । ऑटो में बैठे थे तो मैने एक स्थानीय जानकार को मैसेज किया कि हम तो तेरे शहर में हैं । जवाब आया कि अपना फोन नं० दे । मैने लिखा की नहीं दूँगा । उसने कहा कि मिलना नहीं है तो मैं तुम्हे डायरेक्ट तो कर सकता हूँ कि कहाँ जाना है ।
मैं ये कहकर बात खत्म करता हूँ कि जो मजा भटकने में है वो तो फिर खत्म हो जाएगा ना 😁😁😁।


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