Tuesday, August 21, 2018

देवप्रयाग, ऋषिकेश और कनखल ( devprayag , rishikesh and kankhal )





यहाँ  यात्रा संस्मरण नहीं लिखा गया है सिर्फ हमारी यात्रा के चित्र डाल रहा हूँ -


कनखल 

कनखल यानी भोले की ससुराल । कनखल हरिद्वार से करीब चार किमी दूर बसा है । कनखल आप आसानी से पहुँच सकते हैं । ये सड़क द्वारा मुख्य शहरों से जुड़ा है । नजदीकी रेलवे स्टेशन हरिद्वार है और नजदीकी हवाई अड्डा है देहरादून। कनखल दक्षेश्वर भगवान के मंदिर , गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के लिए प्रसिद्ध है । सभी शक्तिपीठों की रचना यहीं हुए यज्ञ में माता सती के कूदने के कारण ही हुई है । जब भगवान शिव सती के शव को लिए घूम रहे थे । तो भगवान को शोक से बाहर लाने के लिए भगवान विष्णु ने माता सती के शव को सुदर्शन चक्र से काट दिया । माता के शरीर के भाग जहाँ जहाँ गिरे वहीं पर शक्तिपीठों का निर्माण हुआ ।



राजघाट कनखल 

गंगा माता मंदिर कनखल 

कनखल घाट पर बनाई गयी पेंटिंग 

इसी अखाड़े को अर्जुन पंडित फिल्म में हवेली दिखाया है 


 दक्षेश्वर महादेव मंदिर 


ऋषिकेश 

ऋषिकेश हरिद्वार से 25 किलोमीटर दूर बसा है । ऋषिकेश हर तरह के टूरिस्टों के लिए बहुत अच्छी जगह है । चाहे प्रकृति के दीवाने हैं ,एडवेंचर के शौकीन हो या फिर धार्मिक प्रवृत्ति का इंसान हो, योगा के चाहने वाले हो सबके लिए क्या कुछ ना कुछ है । ऋषिकेश सड़क मार्ग रेल मार्ग द्वारा मुख्य शहरों से जुड़ा हुआ है । नजदीकी हवाई अड्डा देहरादून मैं है । ऋषिकेश में गंगा पहाड़ों से उतरकर सबसे पहले मैदानी इलाकों में आती है । पहाड़ों की चंचल बेटी यहां पतित पावनी मां का शांत रूप धर लेती है । ऋषिकेश में लक्ष्मण झूला देखने लायक है जो अंग्रेजों का बनवाया हुआ है । इसे हिलते हुए पुल को पार करते हुए जो अनुभव होता है वह अनूठा होता है ।



ऋषिकेश में राफ्टिंग 

लक्ष्मण झूला 

गंगा 

शिव मंदिर 

बम भोले 

मंदिर की छत से 

एक मेरा भी 

बस एक और 

सारे 













गरुड़  चट्टी झरना 

गरुड़ चट्टी 





देवप्रयाग 

देवप्रयाग उत्तराखंड का एक प्रमुख शहर है । पहला तो यही वो जगह है जहाँ से गंगा असल में शुरू होती है । यहाँ से क्यों ? क्योंकि यहीं पर अलकनंदा और भागीरथी मिलकर गंगा बनती है । दूसरा ये पंचप्रयागों में से एक है । तीजा ये केदारनाथ और बद्रीनाथ जाने वालों का मुख्य पड़ाव है । शायद ही कोई बिना यहाँ रूके आके बढ़ता हो । देप्रयाग आप आसानी से पहुँच सकते हैं । ये सड़क मार्ग से मुख्य शहरों से जुड़ा है । हरिद्वार से इसकी दूरी करीब 95 किमी है ।




भागीरथी 






















देवप्रयाग संगम 






बारिश से बैग बचाने का जुगाड़ 


बहाव तेज हो तो डब्बे से नहाओ 




Tuesday, January 16, 2018

रानी की बावड़ी , नीमराणा ,राजस्थान ( neemrana bawdi , rajsthan )

नितीश और मैं रेवाड़ी से पहले 

दिल्ली से करीब 120 किमी दूर दिल्ली जयपुर हाईवे पर पड़ता है । आजकल इस ऐतिहासिक शहर को इसके इतिहास की बजाय यहाँ बने औद्योगिक क्षेत्र के कारण ज्यादा जाना जाता है । सन् 1470 के दशक  में चौहानों ने अपनी राजधानी यहाँ स्थानांतरित की थी । यहाँ नीमराणा में जो किला है वो भी उसी काल का है । पर हमारा यहाँ जाने का कारण ओद्योगिक क्षेत्र या नीमराणा किला नहीं था बल्कि हम यहाँ आए थे रानी की बावड़ी देखने । अठारवीं सदी में बनी ये बावड़ी ही हमें हमारे घर से 130 किमी दूर खींच लाई थी । यहाँ आने से पहले हमारे कई रविवार निकल गए पर कुछ ना कुछ अटक जाता था । पर इस बार हमने ठान ली थी कि जाना है और जरूर जाना है । मैं तैयार था और संदीप भी । नितीश को बोला तो वो भी तैयार । अब ये बड़ी नाइंसाफी हो गई की वाहन दो सवारी तीन तो कई और मित्रों से पूछा परंतु कोई राजी नहीं ।
 हमें जाना तो था ही तो हम तीनों सुबह नहा धोकर तैयार । मैने और संदीप ने पल्सर ले ली और नितीश अपनी एक्टिवा से चल रहा था । अब ज्यादा दूरी तो थी नहीं और अपने हरियाणा के रोड़ है मस्त तो जल्दी ही रेवाड़ी पहुँच गए । अब रेवाड़ी से हमें दिल्ली - जयपुर हाईवे पकड़ना है । रेवाड़ी में बाईक में तेल डलवाकर और अपने अंदर पानी डालकर हम नीमराणा की तरफ कूच कर गए ।
राजस्थान सीमा प्रारंभ 


 नीमराणा से कुछ पहले टोल है । वहाँ से पहाड़ियाँ दिखाई देनी शुरू हो गई । नीमराणा हाईवे से दो तीन किमी अंदर है । जब हम नीमराणा के पास पहुंचते हैं तो वहां पर है नीमराना का इंडस्ट्रियल एरिया है । नीमराना शहर के सामने हाईवे का अंडरपास है जब हम पुल के नीचे पहुंचे तो वहां पर रुक कर हमने वहां लगी रहडियो पर पहले अपना पेट भरा ₹30 की थाली से जिसमें दो पराठे और आलू की सब्जी मिली ।
 हमको सबसे महत्वपूर्ण काम यही लगता है की पहले पेट पूजा बाकी फिर काम दूजा क्योंकि भरे हुए पेट से ही आदमी को दुनिया खूबसूरत लगती है खाली पेट तो दुनिया भी ऐसे ही खाली खाली लगती है अब यहां पेट पूजा करने के बाद हम निकल पड़े नीमराना शहर की ओर । नीमराना शहर कोई ज्यादा बड़ा शहर नहीं है । शहर के बीच से एक रास्ता नीमराना किले की ओर जाता है हमने तय किया कि पहले हम नीमराना बावड़ी की तरफ जाएंगे और आते हुए हम यहां किले की ओर भी चले जाएंगे । तो गूगल मैप की सहायता से हम शहर को पार करके नीमराना बावड़ी तक पहुंच गए जब हम नीमराना बावड़ी पहुंचे तो एक बार तो बावड़ी की हालत देखकर हमारा मन टूट गया बावड़ी बहुत ही खस्ता हालत में थी । इतिहास की आंखों की वह चमक आज आंसू बनकर गिरने ही वाली है । इतिहास की इस अनुपम धरोहर का आज कोई रखवाला नहीं है , ना तो सरकार और ना ही नीमराना के निवासी । बावड़ी एक किस्म का कूड़ेदान बनी हुई थी देख कर मन विचलित हो गया ।


 ना तो यहां साफ-सफाई थी और ना ही कोई सूचना प्रदान करने वाला बोर्ड ही लगा था । हां ! कुछ बकरियों वाले बावड़ी के अंदर अपनी बकरियों को जरुर चरा रहे थे जब हम वहां गए तो वहां पर उस समय तक कोई नहीं आया था ।

बकरियों का रमला ठमला है यहाँ 
बाहर से दिखती बावड़ी 


 अब वहां पर इन सीढियों के बारे में कोई सूचना तो थी नहीं , तो हमने नीचे उतरते वक्त इन्हें गिनना शुरू कर दिया । कुल मिलाकर 183 सीढ़ियां थी । अगर एक सीढी की चौड़ाई हम डेढ़ फुट मानकर चलें तो यह ढाई सौ फीट से भी लंबी बावड़ी बनती है और गहराई भी इसकी बहुत ही ज्यादा है यह बावड़ी अलग-अलग मंजिलों में बनी है कुल मिलाकर 9 मंजिले हैं । इसकी गहराई का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि जब हम तल पर खड़े थे तो वहां पर सूरज की रोशनी कम जाती है  । जब हम तल में बने रस्ते से कुए के नीचे पहुंचे तो अंदर बहुत ही कम रोशनी थी कुआं बहुत ही गहरा है । कुछ देर वहां रहने के बाद वहां पर कुछ और पर्यटक भी आ गए तब हमें लगा कि चलो आज भी कोई तो इसका देखने वाला है । हम अकेले नहीं हैं । घूमने आए पर्यटकों में से एक वृद्ध जोड़ा वहां उतर तो गया पर चढ़ने में उनको बहुत ही मुश्किल हुई। बार-बार रुक रुक कर बैठ बैठ कर बहुत ही मुश्किल से वह वापस बावड़ी से बाहर आए इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि बावड़ी कितनी गहरी है । जब हम करीब पांचवी मंजिल पर थे तो जो छज्जे वहां से बाहर निकले हैं नीतीश तो वहां से निकल गया पर गहराई देखकर मेरी वहां जाने की हिम्मत नहीं हुई । कम से कम 50 या 60 फुट की गहराई और पकड़ने के लिए कुछ भी नहीं । अब डर तो लगेगा ही ! तो मैंने छज्जे पर जाना कैंसिल कर दिया । अब हिम्मत डर के आगे जवाब दे गई थी लेकिन एक मंजिल और ऊपर जाने के बाद फिर से हिम्मत बंध गई नीतीश और संदीप के बार बार कहने के बाद आखिरकार बिना नीचे देखे मैं भी छज्जा पार कर ही गया । वहां पर काफी समय गुजारने के बाद हम वहां से निकल चले ।

नीचे से ये नज़ारा दीखता है 

कुए के तल से ज़ूम करके लिया गया चित्र 

कुए के तल से बगैर ज़ूम किये 

 अब हमें किले की तरफ जाना था । मुझे पहले से ही जानकारी थी कि यहां पर बहुत ज्यादा महंगाई है किले में इंट्री फीस ही बहुत ज्यादा है । हम इसलिए गए थे कि बाहर से तो देख ही सकते हैं । यह किला 15 वी शताब्दी में बनाया गया था जब चौहानों ने अपनी राजधानी यहां बसाई थी । दो-तीन साल पहले यहां पर इंट्री फीस बहुत ही कम थी पर पिछले साल यह 1500 कर दी गई थी जैसी मुझे जानकारी थी । संदीप ने पूछा तो इस साल यह बढ़ाकर ₹2000 कर दी है । अब इतना तो हमारा तीनों का यहां आने जाने का खर्चा भी नहीं है तो ₹2000 यहां जाने के लिए देना हमारे लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है तो हम बाहर से देख कर ही वापस चल पड़े । अब यहां और कुछ हमारे देखने लायक तो था नहीं इसलिए वहां से गोलगप्पे खाकर हम सीधे घर के लिए निकल पड़े ।

बावड़ी से दूर दिखाई देता किला 

 बावड़ी की हालत पर हमें इतना बुरा नहीं लगा जितना इस बात से लगा कि उसे सुधारने के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा । किले की दिशा रास्ता बताने के लिए बहुत से बोर्ड लगे हैं जबकि बावड़ी के लिए एक भी नहीं । यहाँ बावड़ी बहुत ही उपेक्षित हालत में है और इसके लिए नीमराना वासी भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं । राजस्थान में इतिहास भरा पड़ा है और इस इतिहास में किलो के साथ-साथ बावड़ियों का भी बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है । आशा है कि प्रशासन आने वाले समय में बावड़ी की मरम्मत करवाएगा और इसकी ऐतिहासिक अहमियत समझेगा । अब चलिए पोस्ट खत्म करते हैं और अब कुछ और फोटो देख लीजिए वैसे  किले के फोटो तो कट गए मुझसे तो उसके लिए सॉरी  -